IGIMS MBBS परीक्षा घोटाला: सेकेंड सेमेस्टर 2025 एग्जाम रद्द, जांच रिपोर्ट पर उठे गंभीर सवाल
पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) एक बड़े विवाद में घिर गया है। एमबीबीएस सेकेंड सेमेस्टर 2025 की परीक्षा में गड़बड़ी की पुष्टि होने के बाद संस्थान प्रशासन ने परीक्षा रद्द कर दी है।
IGIMS प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी नजर
पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) एक बड़े विवाद में घिर गया है। एमबीबीएस सेकेंड सेमेस्टर 2025 की परीक्षा में गड़बड़ी की पुष्टि होने के बाद संस्थान प्रशासन ने परीक्षा रद्द कर दी है। हालांकि इस कार्रवाई के बावजूद मामला शांत नहीं हुआ है, क्योंकि छात्रों और शिक्षकों ने जांच प्रक्रिया और रिपोर्ट की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
मामले की शुरुआत 13 मार्च को एक अज्ञात ई-मेल से हुई, जिसमें परीक्षा के पेपर लीक और पैसों के लेन-देन के आरोप लगाए गए थे। शुरुआत में इस शिकायत को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया गया, लेकिन जब मीडिया में खबर सामने आई, तब संस्थान प्रशासन हरकत में आया।

इसके बाद पहले एक आंतरिक जांच कमेटी गठित की गई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. ओम ने की। बाद में एक नई तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई, जिसमें पीएसएम विभागाध्यक्ष डॉ. संजय कुमार को अध्यक्ष और डॉ. ज्ञान भास्कर व डॉ. अश्विनी को सदस्य बनाया गया।
जांच में क्या सामने आया?
जांच रिपोर्ट में परीक्षा में गड़बड़ी की पुष्टि की गई है। रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने कई कदम उठाए:
- एमबीबीएस सेकेंड सेमेस्टर 2025 परीक्षा रद्द
- डीन एग्जामिनेशन सेक्शन से जुड़े कर्मियों और कुछ छात्रों को कारण बताओ नोटिस
- परीक्षा समिति में बड़े स्तर पर फेरबदल
- परीक्षा शाखा से जुड़े कई कर्मचारियों का तबादला
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में पेपर लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर के लिए 5 से 8 लाख रुपये तक की डील की गई थी। पेपर और आंसर शीट की कीमत अलग-अलग तय की गई थी।
CCTV और कॉपी में गड़बड़ी के संकेत
शुरुआती जांच में परीक्षा शाखा के सीसीटीवी फुटेज में संदिग्ध लोगों की आवाजाही देखी गई। इसके अलावा उत्तर पुस्तिकाओं पर साइन और मूल्यांकन से जुड़ी कई अनियमितताएं भी सामने आईं। इससे यह संकेत मिलता है कि मामला केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।
छात्रों और शिक्षकों का आरोप
हालांकि प्रशासन ने कार्रवाई की है, लेकिन छात्र और कुछ शिक्षक इस जांच से संतुष्ट नहीं हैं। उनका आरोप है कि:
- जांच रिपोर्ट में लीपापोती की गई है
- मुख्य आरोपियों को बचाने की कोशिश हुई है
- जिन पर सबसे ज्यादा आरोप थे, उन्हें और अधिक जिम्मेदारी दे दी गई
छात्रों का कहना है कि यह केवल एक-दो लोगों का मामला नहीं है, बल्कि इसमें कई लोग शामिल हैं। इसलिए निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है।
परीक्षा शाखा में बदलाव
संस्थान प्रशासन ने परीक्षा शाखा में बदलाव करते हुए डॉ. अंजू सिंह, डॉ. विनोद कुमार और डॉ. सरिता मिश्रा को सब डीन (एग्जाम) का अतिरिक्त प्रभार दिया है। साथ ही कई कर्मचारियों को इस विभाग से हटाया जा रहा है।
जांच प्रक्रिया पर भी सवाल
इस पूरे मामले में जांच प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं:
- जांच रिपोर्ट सौंपने में तय समय (7 दिन) से ज्यादा, लगभग एक महीना लग गया
- कॉलेज के प्रिंसिपल को जांच प्रक्रिया से दूर रखा गया
- जांच समिति को परीक्षा की कॉपियां उपलब्ध नहीं कराई गईं
इन बिंदुओं ने जांच की पारदर्शिता पर संदेह और गहरा कर दिया है।
छात्रों में बढ़ता आक्रोश
इस मामले के सामने आने के बाद छात्रों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर समय रहते सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मेडिकल शिक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर असर डालेगा।
आगे क्या?
अब सभी की नजर संस्थान प्रशासन पर टिकी है कि वह आगे क्या कदम उठाता है। क्या इस मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी? क्या दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह दबा दिया जाएगा?
IGIMS का यह मामला केवल एक परीक्षा गड़बड़ी नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल संस्थान की साख पर असर डालेगा, बल्कि भविष्य के डॉक्टरों की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में परीक्षा प्रणाली को और मजबूत और पारदर्शी बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
