महावीर मंदिर में हर पूर्णिमा पर होगी विशिष्ट शिखर ध्वज-पूजा, 29 जुलाई से शुरू होगी नई परंपरा

महावीर मंदिर

राजधानी पटना स्थित प्रसिद्ध महावीर मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। अब मंदिर में प्रत्येक पूर्णिमा के अवसर पर विशिष्ट "शिखर ध्वज-पूजा" का आयोजन किया जाएगा।

पटना: राजधानी पटना स्थित प्रसिद्ध महावीर मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। अब मंदिर में प्रत्येक पूर्णिमा के अवसर पर विशिष्ट “शिखर ध्वज-पूजा” का आयोजन किया जाएगा। इस नई परंपरा की शुरुआत इस वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा, 29 जुलाई से होगी और इसके बाद हर पूर्णिमा के दिन यह विशेष पूजा नियमित रूप से संपन्न की जाएगी।

मंदिर प्रशासन के अनुसार यह पूजा मंदिर परिसर में स्थित मुख्य ध्वज के निकट वैदिक विधि-विधान से की जाएगी और इसकी अवधि लगभग दो घंटे होगी। श्रद्धालु इस विशिष्ट पूजा में भाग लेकर धार्मिक अनुष्ठान का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।

श्रद्धालुओं की मांग पर लिया गया निर्णय

श्री महावीर स्थान न्यास समिति के सचिव सायण कुणाल ने बताया कि लंबे समय से अनेक श्रद्धालु यह इच्छा व्यक्त कर रहे थे कि मंदिर के मुख्य शिखर पर स्थापित ध्वज की विशेष पूजा केवल रामनवमी और हनुमान जयंती तक सीमित न रहे, बल्कि पूर्णिमा और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर भी की जाए।

उन्होंने कहा कि देश के कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में ध्वज की विशेष पूजा और परिवर्तन की परंपरा पहले से प्रचलित है। ऐसे में महावीर मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए प्रत्येक पूर्णिमा पर विशिष्ट ध्वज-पूजा और ध्वज परिवर्तन की व्यवस्था शुरू करने का निर्णय लिया है।

29 जुलाई से होगी शुरुआत

मंदिर प्रशासन के अनुसार नई व्यवस्था की शुरुआत 29 जुलाई को पड़ने वाली आषाढ़ पूर्णिमा से की जाएगी। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद मुख्य शिखर पर नया ध्वज चढ़ाया जाएगा।

मंदिर की ओर से बताया गया है कि जिन श्रद्धालुओं ने इस विशेष पूजा के लिए निर्धारित शुल्क जमा किया होगा, उनके नाम और गोत्र का सार्वजनिक रूप से संकल्प लिया जाएगा तथा पूजा उनके नाम से संपन्न कराई जाएगी।

इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

साल में दो बार होती थी विशेष ध्वज-पूजा

सायण कुणाल ने बताया कि वर्तमान में महावीर मंदिर में साल में दो प्रमुख अवसरों पर विशिष्ट ध्वज-पूजा की परंपरा है। पहला अवसर रामनवमी और दूसरा हनुमान जयंती (कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी) का होता है।

इन दोनों पर्वों पर मंदिर परिसर में स्थापित चारों ध्वजों को विधिवत पूजा-अर्चना के बाद बदला जाता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

अब इसी प्रकार की विशेष पूजा हर पूर्णिमा के दिन भी आयोजित की जाएगी, जिससे श्रद्धालुओं को नियमित रूप से इस धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने का अवसर मिलेगा।

ध्वज को माना जाता है आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र

महावीर मंदिर प्रशासन का मानना है कि किसी भी मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा उसके शिखर पर स्थापित ध्वज में केंद्रित होती है। इसी कारण ध्वज का दर्शन और पूजन विशेष धार्मिक महत्व रखता है।

सायण कुणाल के अनुसार शिखर पर लगे ध्वज का दर्शन और पूजा करने से मंदिर में स्थापित सभी देवी-देवताओं की सामूहिक उपासना का पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि ध्वज-पूजा को हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान दिया गया है।

उन्होंने कहा कि मंदिर का ध्वज केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिक चेतना का भी केंद्र माना जाता है।

पहले से मौजूद है ध्वज परिवर्तन की परंपरा

महावीर मंदिर में प्रत्येक पूर्णिमा के दिन ध्वज परिवर्तन की परंपरा पहले से प्रचलित रही है। हालांकि अब इसे और अधिक व्यवस्थित तथा भव्य स्वरूप दिया जा रहा है।

वर्तमान व्यवस्था के तहत मंदिर के पुरोहित श्रद्धालुओं के नाम और गोत्र का उच्चारण करते हुए ध्वज-पूजन का संकल्प लेते हैं। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के साथ ध्वज को अभिमंत्रित किया जाता है और मध्याह्न के समय मंदिर के मुख्य शिखर पर स्थापित किया जाता है।

नई व्यवस्था के लागू होने के बाद यह पूरा कार्यक्रम विशिष्ट पूजा के रूप में आयोजित किया जाएगा।

श्रद्धालुओं में उत्साह

महावीर मंदिर के इस निर्णय का श्रद्धालुओं ने स्वागत किया है। धार्मिक मान्यताओं से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रत्येक पूर्णिमा पर विशेष ध्वज-पूजा होने से भक्तों को नियमित रूप से मंदिर की आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर मिलेगा।

माना जा रहा है कि इस पहल से न केवल मंदिर की धार्मिक गतिविधियों का विस्तार होगा, बल्कि देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में भी वृद्धि हो सकती है।

महावीर मंदिर प्रशासन का यह निर्णय श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक परंपराओं को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

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