पत्नी के अफेयर पर अब नही मिलेगा तलाक! पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, जानें पूरा मामला
पत्नी के अफेयर के आरोप पर पटना हाईकोर्ट का अहम फैसला
निष्कर्ष भारत संवाददाता पटना। हाईकोर्ट तलाक फैसला वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में सामने आया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ कथित आपत्तिजनक स्थिति में देखना मात्र व्यभिचार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए स्पष्ट और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। केवल संभावना, संदेह या पति के एकतरफा बयान के आधार पर पत्नी के खिलाफ व्यभिचार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने संजय कुमार झा की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने पति की तलाक संबंधी अपील खारिज कर दी और मधुबनी फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें तलाक की याचिका पहले ही खारिज की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट में क्यों पहुंचा वैवाहिक विवाद?
मामले के अनुसार, पति और पत्नी की शादी 2 जुलाई 2006 को हुई थी। वर्ष 2010 में दोनों के एक पुत्र का जन्म हुआ। पति ने आरोप लगाया कि बच्चे के जन्म के बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया और उसने उसके साथ क्रूरता की।
पति ने अपनी पत्नी पर अपनी बड़ी बहन के पति के साथ कथित अवैध संबंध का भी आरोप लगाया। उसका दावा था कि उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देखा था। इसी आरोप को आधार बनाकर उसने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) और 13(1)(ia) के तहत तलाक की मांग की।
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पति के अनुसार, 30 मार्च 2013 को पत्नी के पिता कुछ लोगों के साथ उसे ससुराल से अपने साथ ले गए। इसके बाद से दोनों अलग-अलग रह रहे थे। पति ने इसी घटनाक्रम और कथित संबंध को वैवाहिक विवाद का प्रमुख आधार बनाया।
पत्नी ने आरोपों को बताया झूठा
मामले में पत्नी ने पति के सभी आरोपों को खारिज किया। उसने कथित अवैध संबंध के आरोप को झूठा और मनगढ़ंत बताया। पत्नी का कहना था कि उसके चरित्र पर इस तरह का आरोप लगाना स्वयं मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
पत्नी ने पति पर गंभीर आरोप भी लगाए। उसका कहना था कि पति ने उसे जहर देकर मारने की कोशिश की थी। इस तरह दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए, जिसके बाद मामला पारिवारिक अदालत से होते हुए हाईकोर्ट तक पहुंचा।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों को क्यों माना अहम?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का आपत्तिजनक स्थिति में पाया जाना और उसके यौन संबंध होना एक ही बात नहीं है। कोर्ट ने इस अंतर को मामले में महत्वपूर्ण माना।
खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि कथित घटना के बाद पति ने पुलिस में कोई शिकायत नहीं की थी। न ही इस संबंध में कोई सनहा दर्ज कराया गया। इसके अलावा उसने अपने ससुराल पक्ष या अन्य रिश्तेदारों के सामने भी तत्काल इस कथित घटना को नहीं उठाया था।
कोर्ट के अनुसार, केवल ऐसी परिस्थितियों के आधार पर व्यभिचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, जब तक उपलब्ध साक्ष्य आरोप को स्पष्ट रूप से साबित न करें।
व्यभिचार साबित करने के लिए क्या जरूरी?
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से जुड़े कानूनी सिद्धांत पर भी चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि व्यभिचार कई मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर साबित किया जा सकता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए जिनसे आरोप के अलावा किसी दूसरे निष्कर्ष की गुंजाइश न बचे।

इस मामले में खंडपीठ ने पाया कि पति की ओर से लगाए गए आरोप उस स्तर तक नहीं पहुंचते, जहां कथित अवैध संबंध को प्रमाणित माना जा सके। पति का केवल यह कहना कि उसने पत्नी को दूसरे व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखा था, पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना गया।
पटना हाईकोर्ट ने पति की अपील की खारिज
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पति अपनी पत्नी के दूसरे व्यक्ति के साथ यौन संबंध होने के आरोप को साबित करने में असफल रहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि क्रूरता से जुड़े आरोप भी मुख्य रूप से कथित अवैध संबंध के इर्द-गिर्द घूमते हैं।
खंडपीठ के मुताबिक, क्रूरता के संबंध में लगाए गए आरोप भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं थे और सामान्य प्रकृति के थे। ऐसे में पति द्वारा तलाक की मांग को स्वीकार करने का आधार नहीं बनता था।
इसके बाद हाईकोर्ट ने पति की अपील को खारिज कर दिया और मधुबनी फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस फैसले के साथ वैवाहिक विवाद में लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्यों की अहमियत एक बार फिर सामने आई।
फैसले का मतलब क्या है?
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का सीधा अर्थ यह नहीं है कि वैवाहिक संबंध में व्यभिचार कभी तलाक का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने इस विशेष मामले में कहा कि आरोप को पर्याप्त साक्ष्यों के जरिए साबित करना जरूरी है।
यानी पति या पत्नी की ओर से लगाया गया कोई गंभीर आरोप अपने आप कानूनी तथ्य नहीं बन जाता। अदालत मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और दोनों पक्षों के बयानों का परीक्षण करती है। यदि आरोप केवल संदेह या अनुमान पर आधारित हो और उसे पुष्ट करने वाला पर्याप्त साक्ष्य मौजूद न हो, तो उसके आधार पर तलाक की मांग स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है।
अदालत ने इसी मामले में कथित आपत्तिजनक स्थिति और यौन संबंध के बीच अंतर को महत्वपूर्ण माना। साथ ही, घटना के बाद शिकायत नहीं किए जाने जैसे तथ्यों को भी समग्र परिस्थितियों के आकलन में शामिल किया।
तलाक के मामलों में साक्ष्य की अहमियत
यह मामला एक बार फिर बताता है कि वैवाहिक विवादों में लगाए गए आरोपों को अदालत के सामने प्रमाणित करना महत्वपूर्ण होता है। विशेष रूप से जब तलाक की मांग क्रूरता या व्यभिचार जैसे गंभीर आधारों पर की जाती है, तब अदालत उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का बारीकी से परीक्षण करती है।

इस मामले में पति की ओर से कथित अवैध संबंध का आरोप लगाया गया, लेकिन हाईकोर्ट ने माना कि उसे साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं। इसलिए निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया गया। पटना हाईकोर्ट का यह फैसला किसी भी वैवाहिक मामले में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल संदेह, संभावना या एकतरफा बयान के आधार पर व्यभिचार साबित नहीं माना जा सकता। इस मामले में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव में पति को तलाक की राहत नहीं मिली।
राज कुमार की रिपोर्ट
