मुकेश सहनी का तीखा हमला, कहा- अगर 1 खून माफ़ हो तो……ज्ञानेश कुमार को गोली मार देंगे

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मुकेश सहनी का ज्ञानेश कुमार पर विवादित बयान, चुनाव आयोग पर हमला

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर बेहद तीखा और विवादित बयान दिया है। गुरुवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान सहनी ने कहा कि अगर उन्हें एक हत्या की माफी मिल जाए तो वह सबसे पहले ज्ञानेश कुमार को गोली मारेंगे। हालांकि, इसी बयान के दौरान उन्होंने खुद को संविधान और कानून में विश्वास रखने वाला नागरिक भी बताया।

सहनी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच राजनीतिक बहस चल रही है। सहनी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और दावा किया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उनके इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

सहनी ने ज्ञानेश कुमार पर क्यों साधा निशाना?

मुकेश सहनी ने अपने बयान में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की गतिविधियों को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

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सहनी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सीधे निशाने पर लेते हुए उनके खिलाफ बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। उनका गोली मारने वाला बयान एक राजनीतिक बयान के तौर पर सामने आया है। उन्होंने इसके साथ यह भी कहा कि वह कानून और संविधान में विश्वास रखते हैं।

सहनी ने 2029 को लेकर भी किया दावा

मुकेश सहनी ने केवल वर्तमान चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि 2029 के आम चुनाव के बाद की राजनीतिक स्थिति को लेकर भी दावा किया। उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष सत्ता में आता है तो मौजूदा व्यवस्था से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

सहनी ने दावा किया कि ज्ञानेश कुमार उन लोगों में शामिल होंगे जिनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी राजनीतिक कार्रवाई की संभावना जताई। ये सभी बातें सहनी के राजनीतिक दावे हैं और भविष्य से जुड़े उनके अनुमान हैं, जिन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

SIR को लेकर क्यों गरम है बहस?

मुकेश सहनी के बयान की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद भी अहम है। चुनाव आयोग की मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से बहस चल रही है।

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23 सितंबर को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटाबेस के प्रबंधन जैसे मुद्दों से था।

सहनी ने इसी रिपोर्ट का हवाला देकर चुनाव आयोग पर निशाना साधा। हालांकि रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों और सहनी द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोपों के बीच अंतर रखना जरूरी है। आपत्तियां दर्ज होने की रिपोर्ट एक अलग तथ्य है, जबकि इससे चुनाव आयोग द्वारा पक्षपात किए जाने का निष्कर्ष स्वतः साबित नहीं होता।

सहनी ने चुनाव आयोग पर लगाए गंभीर आरोप

सहनी ने चुनाव आयोग पर पक्षपात करने का आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया।

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इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं हुई है। इसलिए इन्हें सहनी के राजनीतिक आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। चुनाव आयोग की ओर से भी आंतरिक प्रक्रियाओं और निर्णय लेने की व्यवस्था को लेकर स्पष्टीकरण सामने आया है।

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों का विवरण सामने आने के बाद आयोग की कार्यप्रणाली पर चर्चा तेज हुई। रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। इनमें मतदाता पंजीकरण और मतदाता सूची से जुड़े तकनीकी एवं प्रशासनिक मुद्दे शामिल थे।

चुनाव आयोग ने अपनी सामान्य कार्यप्रणाली का हवाला देते हुए कहा है कि लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का पक्ष यह है कि उसके आधिकारिक निर्णयों को कानूनी मान्यता प्राप्त है और अंतिम निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।

इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं

चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को लेकर रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। कुछ विपक्षी नेताओं ने आयोग की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है।

वहीं, सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से चुनाव आयोग की आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया का बचाव किया गया है। ऐसे में मामला केवल मुकेश सहनी के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मतदाता सूची की प्रक्रिया और SIR से जुड़े व्यापक राजनीतिक विवाद का हिस्सा बन गया है।

मुकेश सहनी के बयान से बढ़ी सियासी हलचल

मुकेश सहनी के बयान ने इस पूरे विवाद को एक नया राजनीतिक आयाम दे दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को लेकर हिंसा की बात करने वाला बयान सामने आने के बाद राजनीतिक बहस और तीखी हो गई है।

हालांकि सहनी ने अपने बयान में खुद को कानून और संविधान में विश्वास रखने वाला नागरिक बताया, लेकिन उनका बयान सार्वजनिक और राजनीतिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। बयान के राजनीतिक और कानूनी प्रभाव को लेकर आगे क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी नजर रहेगी।

फिलहाल चुनाव आयोग से जुड़े विवाद में एक तरफ SIR, मतदाता सूची और आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आयोग अपने निर्णयों और संस्थागत प्रक्रियाओं का बचाव कर रहा है। इसी बीच मुकेश सहनी के बयान ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। इस मामले में आगे की स्थिति चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और संबंधित संस्थाओं की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होगी।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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