बिहार में मां दुर्गा की विदाई, नम आंखों से हुआ विसर्जन, सिंदूर खेला में भावुक हुईं महिलाएं
बिहार में मां दुर्गा की विदाई पर पटना, गया और मुजफ्फरपुर में सिंदूर खेला हुआ। बक्सर में कंधों पर प्रतिमाएं ले गए श्रद्धालु, घाटों पर सुरक्षा।
निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। बिहार में नौ दिनों तक चले शारदीय नवरात्र के समापन के साथ बुधवार को मां दुर्गा की विदाई का सिलसिला शुरू हो गया। बिहार में पटना से लेकर गया, मुजफ्फरपुर और लखीसराय तक पूजा पंडालों में श्रद्धा, उल्लास और भावुकता का अनूठा संगम देखने को मिला। कहीं सुहागिन महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सिंदूर खेला की परंपरा निभाई, तो कहीं श्रद्धालु नम आंखों से मां को विदाई देते नजर आए। बक्सर में दशकों पुरानी परंपरा के अनुसार भक्तों ने मां की प्रतिमा को कंधों पर उठाकर विसर्जन स्थल तक पहुंचाया।
बिहार में नौ दिनों तक पूजा-अर्चना, आरती और धार्मिक आयोजनों से गुलजार रहे पंडालों में अब विदाई की रस्में निभाई जा रही हैं। श्रद्धालु मां दुर्गा से परिवार की खुशहाली, सुख-समृद्धि और मंगल जीवन की कामना कर रहे हैं। भक्तों के मन में एक ओर मां के विदा होने की उदासी है, तो दूसरी ओर अगले वर्ष उनके फिर आगमन की उम्मीद भी है।
बिहार में सिंदूर खेला के साथ मां दुर्गा की विदाई
बिहार के कई शहरों में बंगाली समुदाय की पारंपरिक सिंदूर खेला रस्म आकर्षण का केंद्र बनी। इस परंपरा में सुहागिन महिलाएं पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं।
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पटना के बंगाली अखाड़ा और बंगाली टोला में महिलाओं के साथ किन्नर समुदाय के लोगों ने भी इस रस्म में हिस्सा लिया। मां दुर्गा की प्रतिमा को सिंदूर लगाने के बाद महिलाओं और किन्नरों ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाया। पूरे परिसर में भक्ति और उत्सव का माहौल रहा। हालांकि, विदाई के क्षण में कई महिलाएं भावुक भी नजर आईं।
बिहार में यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है। महिलाएं एक-दूसरे के साथ खुशियां साझा करती हैं और मां दुर्गा से परिवार के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।
पटना में बेटी के रूप में मां दुर्गा की विदाई
पटना के बंगाली अखाड़ा पहुंचीं किन्नर अनुप्रिया सिंह ने कहा कि बंगाली परंपरा में मां दुर्गा को बेटी के स्वरूप में देखा जाता है। मान्यता है कि मां हर वर्ष अपने मायके आती हैं और पूजा के बाद विदा होकर लौट जाती हैं। इसी भाव के साथ सिंदूर खेला की रस्म निभाई जाती है।
पटना के बंगाली टोला में मौजूद रेणुका ने भी विदाई के इस क्षण को भावुक बताया। उन्होंने कहा कि मां दुर्गा को बेटी मानकर उनकी विदाई की जाती है, इसलिए मन में उदासी रहती है। इसके बावजूद श्रद्धालु इस पर्व को खुशी और उत्साह के साथ मनाते हैं। उन्हें विश्वास है कि मां अगले वर्ष फिर आएंगी और भक्तों को अपना आशीर्वाद देंगी।
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बंगाली परंपरा में मां दुर्गा की विदाई का यह भाव पूजा को परिवार और रिश्तों से जोड़ता है। इसी कारण विसर्जन के दौरान भक्तों की आंखें नम होती हैं, लेकिन अगले वर्ष मां के आगमन की उम्मीद उत्सव को फिर से खुशी से भर देती है।
मुजफ्फरपुर और लखीसराय में भी सिंदूर खेला
बिहार में मुजफ्फरपुर के बंगाली टोला में महिलाओं ने सिंदूर खेला की रस्म निभाकर मां दुर्गा को विदाई दी। महिलाओं ने देवी को सिंदूर अर्पित किया और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना की। पूजा के समापन पर पूरे क्षेत्र में धार्मिक माहौल बना रहा।
लखीसराय के चितरंजन रोड स्थित भारत माता प्रांगण में भी सिंदूर खेला का आयोजन हुआ। सुहागिन महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर चढ़ाया और एक-दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाकर मंगलकामनाएं कीं। मां की विदाई के दौरान श्रद्धालुओं के बीच भावुकता देखने को मिली।
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गयाजी के ऐतिहासिक दुर्गाबाड़ी में भी बंगाली संस्कृति की इस परंपरा के साथ मां दुर्गा को भावभीनी विदाई दी गई। महिलाओं ने एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की। अलग-अलग शहरों में निभाई गई इन रस्मों ने बिहार की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक आस्था की झलक दिखाई।
बक्सर में कंधों पर उठाकर ले गए मां दुर्गा की प्रतिमा
बक्सर में विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन शुरू हुआ। यहां बड़ी देवी पूजा समिति की प्रतिमा का विसर्जन सबसे पहले किया गया। खास बात यह रही कि श्रद्धालुओं ने प्रतिमा को किसी वाहन पर ले जाने के बजाय अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन स्थल तक पहुंचाया।
यह परंपरा दशकों से निभाई जा रही है और स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखती है। प्रतिमा को कंधों पर लेकर चलने वाले भक्तों के साथ बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे। विसर्जन के दौरान श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा के जयकारे लगाए और उनसे सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना की।

बिहार में बक्सर की यह परंपरा दर्शाती है कि दुर्गा पूजा केवल पंडालों में होने वाला आयोजन नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय इतिहास, सामुदायिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं भी शामिल हैं।
बिहार में दुर्गा विसर्जन के लिए घाटों पर खास इंतजाम
बिहार में दुर्गा पूजा के बाद प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर पटना नगर निगम ने विशेष तैयारियां की हैं। गंगा को प्रदूषण से बचाने के उद्देश्य से विभिन्न घाटों पर कृत्रिम तालाब बनाए गए हैं। जिन घाटों पर पहले से तालाब मौजूद हैं, उनकी सफाई कराई गई है, ताकि प्रतिमाओं का विसर्जन निर्धारित स्थानों पर किया जा सके।
विसर्जन के बाद पानी से मूर्तियों के अवशेष और पूजन सामग्री निकालने के लिए अतिरिक्त सफाईकर्मियों की तैनाती की गई है। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए पाटलिपुत्र अंचल में 30 और अजीमाबाद अंचल में 140 अतिरिक्त कर्मियों को लगाया गया है।
प्रमुख घाटों पर गोताखोरों की तैनाती के साथ मजबूत बैरिकेडिंग, पर्याप्त रोशनी और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित करने की तैयारी की गई है। प्रशासन का उद्देश्य विसर्जन के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा बनाए रखना और गंगा में प्रदूषण को कम करना है।
नालंदा में भी प्रतिमाओं के विसर्जन के दौरान घाटों पर एसडीआरएफ की टीम तैनात की गई है। सुरक्षा व्यवस्था के बीच श्रद्धालु मां दुर्गा को विदाई दे रहे हैं।
नम आंखों से विदाई, अगले बरस आने की उम्मीद
बिहार में मां दुर्गा के विसर्जन के साथ नौ दिनों तक चले पूजा-पाठ और उत्सव का समापन हो रहा है। पटना, गया, मुजफ्फरपुर और लखीसराय में सिंदूर खेला की रस्म ने जहां बंगाली संस्कृति की खूबसूरती दिखाई, वहीं बक्सर में कंधों पर प्रतिमा ले जाने की परंपरा ने स्थानीय आस्था को सामने रखा।
मां दुर्गा की विदाई भक्तों के लिए भावुक क्षण है। श्रद्धालु नम आंखों से मां को विदा करते हुए परिवार की खुशहाली और सुख-शांति की प्रार्थना कर रहे हैं। इस विदाई में दुख के साथ एक विश्वास भी जुड़ा है कि मां अगले वर्ष फिर आएंगी और अपने भक्तों को आशीर्वाद देंगी। यही विश्वास दुर्गा पूजा की परंपरा को हर वर्ष नई ऊर्जा और उत्साह के साथ जीवंत बनाए रखता है।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
