बिहार के 68,379 नियोजित शिक्षकों के प्रमाणपत्र गायब, नहीं मिले दस्तावेज, नौकरी पर लटकी तलवार

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बिहार के 68,379 नियोजित शिक्षकों के फोल्डर गायब, प्रमाणपत्र सत्यापन अटका

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। बिहार में नियोजित शिक्षकों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन का मामला एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के 68,379 नियोजित शिक्षकों के शैक्षणिक और प्रशिक्षण प्रमाणपत्रों से जुड़े फोल्डर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को अब तक नहीं मिल सके हैं। दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण संबंधित शिक्षकों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन अधूरा है। बिहार में निगरानी ने इस मामले में शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर आवश्यक कार्रवाई करने को कहा है। बिहार में अब सबकी नजर इस बात पर है कि विभाग लंबित फोल्डरों को लेकर क्या कदम उठाता है और संबंधित शिक्षकों के मामले में आगे की प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।

वर्ष 2006 से 2015 के बीच पंचायत और नगर निकायों के माध्यम से बहाल किए गए इन शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच लंबे समय से चल रही है। दस्तावेजों की उपलब्धता इस जांच का अहम हिस्सा है। हालांकि, फोल्डर नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित शिक्षकों के प्रमाणपत्र फर्जी हैं। उनके मामलों में आगे का निर्णय दस्तावेजों की उपलब्धता, सत्यापन और विभागीय नियमों के आधार पर लिया जाना है।

बिहार में 68 हजार से अधिक शिक्षकों के दस्तावेज लंबित

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बिहार में मेरिट के आधार पर कुल 3,52,927 नियोजित शिक्षकों की बहाली हुई थी। इन शिक्षकों के शैक्षणिक और प्रशिक्षण प्रमाणपत्रों की जांच के लिए निगरानी अन्वेषण ब्यूरो ने जिला शिक्षा अधिकारियों और जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों से संबंधित फोल्डर मांगे थे।

दिसंबर 2025 तक निगरानी को 2,83,278 शिक्षकों के फोल्डर प्राप्त हुए थे। इस दौरान 69,649 शिक्षकों के फोल्डर लंबित थे। इसके बाद संबंधित जिलों को दोबारा निर्देश दिया गया कि शेष दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं, ताकि सत्यापन की प्रक्रिया आगे बढ़ सके।

लेकिन इसके बाद भी अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। करीब 10 महीने के दौरान निगरानी को केवल 1,270 अतिरिक्त फोल्डर ही मिल सके। इस तरह अक्टूबर 2026 तक 68,379 शिक्षकों के फोल्डर उपलब्ध नहीं होने का आंकड़ा सामने आया है।

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बिहार की यह स्थिति बताती है कि शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच के लिए जरूरी दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। अब शिक्षा विभाग और जिला स्तर के अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

बिहार में कैसे होता है शिक्षकों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन?

नियोजित शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत की जाती है। सबसे पहले संबंधित शिक्षक के शैक्षणिक और प्रशिक्षण प्रमाणपत्रों से जुड़ा फोल्डर निगरानी अन्वेषण ब्यूरो को उपलब्ध कराया जाता है। इसके बाद प्रमाणपत्र जारी करने वाले बोर्ड, विश्वविद्यालय या संबंधित शैक्षणिक संस्थान से उनका सत्यापन कराया जाता है।

सत्यापन के दौरान प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता और उनसे संबंधित विवरणों की जांच की जाती है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसकी जानकारी शिक्षा विभाग को भेजी जाती है, जिसके आधार पर आवश्यक विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

लेकिन जिन शिक्षकों के फोल्डर ही उपलब्ध नहीं हैं, उनके प्रमाणपत्र संबंधित संस्थानों को भेजकर सत्यापित कराने में परेशानी आती है। यही वजह है कि हजारों शिक्षकों का मामला अभी लंबित है।

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निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की ओर से शिक्षा विभाग को पत्र लिखे जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दस्तावेज उपलब्ध कराने के लिए संबंधित जिलों को क्या निर्देश दिए जाते हैं। साथ ही, जिन मामलों में फोल्डर नहीं मिल रहे हैं, उनके रिकॉर्ड जुटाने के लिए क्या व्यवस्था बनाई जाती है।

सीवान में सबसे ज्यादा फोल्डर लंबित

जिला स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों में सीवान की स्थिति सबसे गंभीर बताई गई है। यहां 7,686 शिक्षकों के फोल्डर निगरानी को नहीं सौंपे गए हैं। इसके बाद नवादा में 4,895, सुपौल में 4,467, भोजपुर में 4,402 और अररिया में 4,331 फोल्डर लंबित हैं।

राजधानी पटना में भी 3,567 शिक्षकों के फोल्डर अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि समस्या केवल किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जिलों में दस्तावेज उपलब्ध कराने की प्रक्रिया अधूरी है।

दूसरी ओर, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बिहार के अरवल, बेतिया, कटिहार, किशनगंज, मधेपुरा और सीतामढ़ी ऐसे जिले हैं, जहां कोई फोल्डर लंबित नहीं बताया गया है। अन्य जिलों में मुंगेर के एक, मधुबनी के आठ, पूर्णिया के 197, वैशाली के 113, बांका के 119 और शेखपुरा के 121 फोल्डर अब तक नहीं मिले हैं।

जिलों के बीच लंबित दस्तावेजों की संख्या में बड़ा अंतर होने से रिकॉर्ड संकलन और निगरानी तक दस्तावेज पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अलग-अलग जिलों में फोल्डर लंबित रहने के कारणों की विस्तृत जानकारी के बिना किसी अधिकारी या शिक्षक की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

8.50 लाख प्रमाणपत्रों की जांच पूरी

बिहार में निगरानी के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, कुल 3,52,927 नियोजित शिक्षकों में से 2,84,548 शिक्षकों के लगभग 8.50 लाख प्रमाणपत्रों की जांच की जा चुकी है। एक नियोजित शिक्षक से संबंधित तीन प्रमाणपत्रों के सत्यापन का प्रावधान रहा है।

इस अभियान के तहत केवल बिहार के शैक्षणिक बोर्डों और विश्वविद्यालयों तक ही जांच सीमित नहीं रही। देश के दूसरे राज्यों के 378 बोर्ड और विश्वविद्यालयों से भी प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नेपाल से संबंधित संस्थानों तक भी सत्यापन की प्रक्रिया पहुंची।

इतने व्यापक स्तर पर जांच होने के बावजूद हजारों शिक्षकों के फोल्डर नहीं मिलना प्रक्रिया के अधूरे रहने की बड़ी वजह बना हुआ है। दस्तावेज उपलब्ध होने के बाद ही संबंधित प्रमाणपत्रों के सत्यापन की कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सकेगी।

क्या 68,379 शिक्षकों की नौकरी पर पड़ेगा असर?

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल संबंधित शिक्षकों की नौकरी को लेकर है। फोल्डर नहीं मिलने के कारण प्रमाणपत्रों का सत्यापन नहीं हो पा रहा है, लेकिन केवल दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के आधार पर नौकरी समाप्त होने का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

बिहार में संबंधित शिक्षकों के मामलों में आगे की कार्रवाई शिक्षा विभाग के निर्णय, लागू नियमों और जांच के नतीजों पर निर्भर करेगी। यदि किसी मामले में प्रमाणपत्रों की प्रामाणिकता को लेकर संदेह सामने आता है, तो उसकी जांच और निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाना होगा।

फिलहाल निगरानी अन्वेषण ब्यूरो की ओर से शिक्षा विभाग को पत्र लिखे जाने के बाद विभागीय कार्रवाई का इंतजार है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित जिलों के अधिकारी शेष फोल्डर कब तक उपलब्ध कराते हैं और रिकॉर्ड नहीं मिलने की स्थिति में उन्हें जुटाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

बिहार में नियोजित शिक्षकों के प्रमाणपत्र सत्यापन का यह मामला अब दस्तावेजों की उपलब्धता और प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर है। आने वाले दिनों में शिक्षा विभाग के निर्देश और निगरानी की जांच से ही स्पष्ट होगा कि लंबित मामलों का निपटारा किस तरह किया जाता है।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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