महा भ्रष्टाचारी…. IIT PATNA के रजिस्टार AK ठाकुर के खिलाफ पटना में FIR दर्ज…. अब यह सिलसिला रुकेगा नहीं, अभी तो शुरुआत है

IIT

(IIT) पटना के रजिस्ट्रार एके ठाकुर के खिलाफ आखिरकार एससी/एसटी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है।

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना के रजिस्ट्रार एके ठाकुर के खिलाफ आखिरकार एससी/एसटी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। कांग्रेस नेता आदित्य पासवान करीब एक सप्ताह तक लगातार पुलिस और प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाने के बाद गर्दनीबाग स्थित एससी/एसटी थाने में मामला दर्ज कराने में सफल रहे। इस एफआईआर के बाद जहां एक ओर मामले ने नया मोड़ ले लिया है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की कार्यशैली और शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब किसी व्यक्ति की शिकायत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े कथित अपमानजनक व्यवहार को लेकर हो, तो प्राथमिकी दर्ज करने में इतना समय क्यों लगा? क्या कानून के सामने सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं? और यदि शिकायतकर्ता को न्याय पाने के लिए एक सप्ताह तक संघर्ष करना पड़े, तो आम आदमी पुलिस-प्रशासन से क्या उम्मीद करेगा?

एक सप्ताह की भागदौड़ के बाद दर्ज हुई प्राथमिकी

मामले के अनुसार, IIT पटना के रजिस्ट्रार एके ठाकुर पर दलित विरोधी टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया है। इस मामले को लेकर कांग्रेस नेता आदित्य पासवान ने पुलिस प्रशासन के समक्ष शिकायत दर्ज कराने की पहल की थी। उनका आरोप था कि रजिस्ट्रार की कथित टिप्पणी अनुसूचित जाति समुदाय के सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ है।

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शिकायतकर्ता का कहना है कि मामला सामने आने के बाद उन्होंने संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की, लेकिन उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्हें लगातार पुलिस कार्यालयों और थानों के चक्कर लगाने पड़े। करीब एक सप्ताह की कोशिशों के बाद आखिरकार गर्दनीबाग एससी/एसटी थाने में एफआईआर दर्ज हुई।

आदित्य पासवान ने इस कार्रवाई को अपनी लड़ाई का शुरुआती परिणाम बताया है। हालांकि, उनका सवाल है कि जिस मामले में शिकायत मिलने के बाद कानून के अनुसार तत्काल कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है, उसमें सात दिनों तक इंतजार क्यों करना पड़ा?

24 घंटे बनाम सात दिन, पुलिस की कार्यशैली पर सवाल

इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा एफआईआर दर्ज होने में हुई कथित देरी है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि किसी मामले में एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध किए जाने की शिकायत सामने आती है, तो पुलिस को कानून के प्रावधानों के अनुसार तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। इसके बावजूद उन्हें लगभग एक सप्ताह तक संघर्ष करना पड़ा।

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू समझना जरूरी है। एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुरूप शिकायत की जांच और आवश्यक कार्रवाई करे। हालांकि, हर शिकायत में 24 घंटे के भीतर एफआईआर दर्ज करने का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। कार्रवाई की समयसीमा मामले की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करती है। इसके बावजूद शिकायतकर्ता की ओर से उठाया गया सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण है कि आखिर पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद समय रहते स्पष्ट कार्रवाई क्यों नहीं की?

यदि शिकायत में संज्ञेय अपराध के तथ्य सामने आते हैं, तो पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुसार प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया अपनाए। किसी भी शिकायतकर्ता को अनावश्यक रूप से थाने और कार्यालयों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के अधिकारी पर आरोप, मामला क्यों गंभीर?

IIT पटना देश के प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षण संस्थानों में शामिल है। ऐसे संस्थान के रजिस्ट्रार जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी पर जातिगत टिप्पणी करने का आरोप लगना अपने आप में गंभीर विषय है। शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी केवल शिक्षा और शोध तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन्हें समानता, सामाजिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों का भी पालन करना होता है।

यदि किसी अधिकारी पर जाति के आधार पर अपमानित करने का आरोप लगता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। संस्थान के भीतर काम करने वाले कर्मचारियों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए समान अवसर और सम्मान का वातावरण बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

हालांकि, प्राथमिकी दर्ज होना किसी व्यक्ति के अपराधी साबित होने का प्रमाण नहीं है। रजिस्ट्रार एके ठाकुर पर लगाए गए आरोपों की सत्यता का निर्धारण पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा। संबंधित अधिकारी का पक्ष और मामले में उपलब्ध साक्ष्य भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे।

आदित्य पासवान ने प्रशासन से मांगा जवाब

एफआईआर दर्ज होने के बाद आदित्य पासवान ने पुलिस की कार्रवाई में हुई देरी को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि यदि समाज के वंचित और कमजोर वर्गों से जुड़े लोगों की शिकायतों पर भी तत्काल कार्रवाई नहीं होगी, तो उन्हें न्याय कैसे मिलेगा?

गर्दनीबाग एससी/एसटी थाने के पास मौजूद रहकर उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और एफआईआर से संबंधित दस्तावेज भी दिखाए। उनका आरोप है कि एक सप्ताह तक लगातार प्रयास करने के बाद ही पुलिस ने मामला दर्ज किया।

उनकी इस पहल ने एक बार फिर बिहार में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े मामलों में पुलिस की संवेदनशीलता पर बहस शुरू कर दी है। सवाल यह भी है कि क्या पुलिस प्रशासन प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों से जुड़ी शिकायतों में अलग रवैया अपनाता है? हालांकि, इस मामले में ऐसा कोई निष्कर्ष जांच और उपलब्ध तथ्यों के बिना नहीं निकाला जा सकता।

मुख्यमंत्री से भी मांगा गया जवाब

इस पूरे प्रकरण को लेकर बिहार सरकार और मुख्यमंत्री से भी जवाब मांगा गया है। शिकायतकर्ता का सवाल है कि जब राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष कानून मौजूद हैं, तो फिर ऐसे मामलों में कार्रवाई को लेकर शिकायतकर्ताओं को परेशानी क्यों उठानी पड़ती है?

बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सरकारें वंचित वर्गों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा का दावा करती रही हैं। ऐसे में किसी प्रतिष्ठित संस्थान के अधिकारी पर जातिगत टिप्पणी का आरोप और फिर प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ता का एक सप्ताह तक संघर्ष करना प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है।

मुख्यमंत्री और गृह विभाग के स्तर पर भी यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि इस तरह की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाए और पुलिसकर्मी कानून के मुताबिक समय पर कार्रवाई करें।

अब जांच और जवाबदेही की असली परीक्षा

एफआईआर दर्ज होने के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण चरण पुलिस जांच का है। पुलिस को शिकायत में लगाए गए आरोपों, कथित टिप्पणी के संदर्भ, उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों और अन्य साक्ष्यों की निष्पक्षता से जांच करनी होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायत मिलने के बाद प्राथमिकी दर्ज करने में देरी किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन था।

IIT पटना प्रशासन को भी मामले पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए, ताकि संस्थान की कार्यप्रणाली और सामाजिक जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके।

इस पूरे मामले में दो अलग-अलग मुद्दे हैं। पहला, रजिस्ट्रार एके ठाकुर पर लगाए गए कथित जातिगत टिप्पणी के आरोपों की निष्पक्ष जांच और दूसरा, शिकायत मिलने के बाद पुलिस की ओर से की गई कार्रवाई में कथित देरी की जवाबदेही। दोनों ही विषय महत्वपूर्ण हैं और इन्हें एक-दूसरे से अलग रखकर देखा जाना चाहिए।

फिलहाल, एफआईआर दर्ज होना शिकायतकर्ता की लंबी कोशिशों के बाद मिली एक महत्वपूर्ण कानूनी शुरुआत है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया अभी बाकी है। असली सवाल यह है कि क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर आरोपों की सच्चाई सामने लाएगी? क्या IIT पटना प्रशासन इस मामले में पारदर्शी रुख अपनाएगा?

क्या बिहार सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भविष्य में किसी भी वंचित वर्ग के व्यक्ति को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए सात दिनों तक संघर्ष न करना पड़े? क्योंकि कानून की असली ताकत केवल उसके कागजों में नहीं, बल्कि आम नागरिक को समय पर मिलने वाले न्याय में दिखाई देती है।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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