IIT छात्रों की आत्महत्या पर सवाल, पढ़ाई का दबाव कितना जिम्मेदार?  World Suicide Prevention Day 2026 पर उठे सवाल

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IIT छात्रों की आत्महत्या: पढ़ाई का दबाव कितना जिम्मेदार?

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। भारत में IIT में प्रवेश को प्रतिभा, सफलता और उज्ज्वल करियर की गारंटी के रूप में देखा जाता है। लाखों विद्यार्थी हर वर्ष इन संस्थानों में जगह बनाने के लिए कठिन प्रतियोगिता से गुजरते हैं। परिवारों के लिए IIT में चयन गर्व का विषय होता है और छात्रों के लिए यह अक्सर वर्षों की मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम माना जाता है। लेकिन इन संस्थानों की चमकदार सफलता की कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है—अत्यधिक शैक्षणिक दबाव, प्रतियोगिता, करियर की चिंता, अकेलापन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकट।

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2026 के अवसर पर यह सवाल एक बार फिर महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हमारे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान छात्रों को केवल बेहतर करियर के लिए तैयार कर रहे हैं या उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य की भी उतनी ही जिम्मेदारी उठा रहे हैं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 में इसकी थीम “Changing the Narrative on Suicide” यानी आत्महत्या को लेकर सोच और बातचीत का नजरिया बदलना है। इसका संदेश है—“Start the Conversation”, यानी बातचीत शुरू करें। WHO का कहना है कि चुप्पी और कलंक के बजाय खुलेपन, सहानुभूति और सहयोग का माहौल बनाया जाना जरूरी है।

IITs में सामने आया चिंताजनक आंकड़ा

मार्च 2026 में प्रकाशित Al Jazeera की एक रिपोर्ट ने भारत के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में छात्र आत्महत्याओं के मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न सरकारी अधिकारियों और IIT से जुड़े आंकड़ों को संकलित करने वाले स्रोतों के आधार पर पिछले करीब दो दशकों में IITs में कम-से-कम 160 छात्रों की आत्महत्या से मौत दर्ज की गई। इनमें 69 मामले पिछले पांच वर्षों के बताए गए हैं।

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रिपोर्ट में IIT दिल्ली के छात्र वरद नेरकर समेत कई मामलों का उल्लेख किया गया है। IIT दिल्ली में 2024 में हुई उनकी मौत को संस्थान ने आत्महत्या के रूप में दर्ज किया था। रिपोर्ट के अनुसार, मौत से कुछ समय पहले उन्होंने अपनी मां से शैक्षणिक तनाव और अपने सुपरवाइजर से जुड़े कथित दबाव की बात की थी।

यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। इसके पीछे ऐसे परिवार हैं जिनके लिए किसी बच्चे का IIT पहुंचना वर्षों की मेहनत और सपनों का परिणाम था। हर एक मौत यह सवाल छोड़ जाती है कि उस छात्र की परेशानी समय रहते क्यों नहीं पहचानी गई और क्या संस्थागत स्तर पर उसे पर्याप्त मदद मिल सकी?

जब सफलता ही दबाव बन जाए

IIT में प्रवेश अपने आप में कठिन उपलब्धि है। लेकिन कई छात्रों के लिए असली दबाव प्रवेश के बाद शुरू होता है। स्कूल में हमेशा बेहतर प्रदर्शन करने वाला छात्र जब देश के सबसे प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के बीच पहुंचता है, तो उसे पहली बार यह महसूस हो सकता है कि यहां हर कोई उत्कृष्ट है।

यहीं से तुलना का सिलसिला शुरू हो सकता है—CGPA, परीक्षा, प्रोजेक्ट, रिसर्च, इंटर्नशिप, प्रतियोगिताएं और नौकरी।

इसके साथ परिवार की उम्मीदें भी जुड़ी होती हैं। जिस छात्र पर बचपन से यह विश्वास जताया गया हो कि IIT में पहुंचकर उसका भविष्य सुरक्षित हो जाएगा, उसके लिए खराब ग्रेड या बैकलॉग केवल अकादमिक समस्या नहीं रह जाती। वह इसे अपनी व्यक्तिगत असफलता के रूप में देखने लग सकता है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब विद्यार्थी के मन में यह विचार बनने लगे कि “अगर मैं IIT में सफल नहीं हुआ तो मैं जिंदगी में भी असफल हूं।”

लेकिन सच यह है कि किसी विद्यार्थी की पूरी जिंदगी का मूल्य उसके CGPA, एक परीक्षा, एक सेमेस्टर, एक रिसर्च पेपर या एक प्लेसमेंट से तय नहीं किया जा सकता।

प्लेसमेंट का दबाव भी बड़ी चुनौती

IIT से जुड़ी सामाजिक धारणा में उच्च वेतन वाली नौकरी और शानदार प्लेसमेंट को सफलता का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। लेकिन हर छात्र को मनचाही नौकरी मिलना संभव नहीं है।

Al Jazeera की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में IIT के आंकड़ों में करीब 38 प्रतिशत स्नातक बिना प्लेसमेंट के रह गए। रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने कहा कि प्लेसमेंट के दौरान छात्रों पर पड़ने वाला दबाव कई बार बेहद गंभीर हो सकता है। ([Al Jazeera][3])

ऐसे माहौल में जिस विद्यार्थी ने वर्षों तक खुद को “सफल होने वाला छात्र” समझा हो, उसके लिए नौकरी न मिलना आत्मसम्मान पर गहरा असर डाल सकता है। इसलिए संस्थानों को यह समझना होगा कि करियर की असफलता को संभालने के लिए भी छात्रों को मानसिक और भावनात्मक सहायता की जरूरत होती है।

PhD छात्रों और सुपरवाइजर का दबाव

मानसिक स्वास्थ्य की समस्या केवल undergraduate छात्रों तक सीमित नहीं है। शोधार्थियों और PhD छात्रों के सामने भी अलग तरह की चुनौतियां हैं।

Al Jazeera की रिपोर्ट में IIT से जुड़े शोधार्थियों ने सुपरवाइजर और छात्र के बीच शक्ति असंतुलन, शोध पूरा करने का दबाव, फेलोशिप की अवधि और भविष्य की अनिश्चितता जैसी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया। रिपोर्ट में IIT-कानपुर के एक PhD शोधार्थी की मौत का भी उल्लेख किया गया।

शोध की प्रकृति ही ऐसी है जिसमें असफल प्रयोग, बार-बार संशोधन, पेपर रिजेक्शन और लंबी अवधि की अनिश्चितता शामिल होती है। ऐसे में छात्रों के लिए सुरक्षित शिकायत प्रणाली, स्वतंत्र अकादमिक सलाह और मानसिक स्वास्थ्य सहायता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

जातिगत भेदभाव और सामाजिक अलगाव का सवाल

छात्र आत्महत्या के मामलों में केवल पढ़ाई और परीक्षा के दबाव को ही कारण मान लेना समस्या को बहुत सरल बना देना होगा। Al Jazeera की रिपोर्ट में IITs में सामाजिक और जातिगत भेदभाव की शिकायतों का भी उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2021 के बीच IITs, IIMs, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केंद्रीय संस्थानों में आत्महत्या से हुई 122 छात्र मौतों में 68 छात्र SC, ST और OBC समुदायों से थे।

किसी विद्यार्थी के लिए शैक्षणिक दबाव के साथ सामाजिक अलगाव या भेदभाव का अनुभव स्थिति को और कठिन बना सकता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य नीति को केवल counselling तक सीमित नहीं किया जा सकता। कैंपस संस्कृति में सम्मान, समानता और सुरक्षित शिकायत तंत्र भी उतने ही जरूरी हैं।

2026 का संदेश—चुप्पी तोड़िए, बातचीत शुरू कीजिए

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2026 का संदेश इसी दिशा में है। WHO ने इस वर्ष “Changing the Narrative on Suicide” को थीम बनाया है और लोगों से बातचीत शुरू करने, कलंक कम करने तथा संकट में मौजूद लोगों के लिए मदद का रास्ता आसान बनाने की अपील की है।

छात्रों के संदर्भ में इसका अर्थ बेहद स्पष्ट है। किसी दोस्त के व्यवहार में बड़ा बदलाव दिखाई दे, वह लगातार परेशान या अलग-थलग नजर आए या अपनी पढ़ाई और भविष्य को लेकर अत्यधिक निराशा व्यक्त करे, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय संवेदनशीलता से बातचीत करनी चाहिए।

किसी परेशान छात्र से यह पूछना कि “तुम इतने कमजोर क्यों हो गए?” शायद मददगार नहीं होगा। इसके बजाय यह कहना ज्यादा महत्वपूर्ण है—“तुम किस दौर से गुजर रहे हो? अगर बात करना चाहते हो तो मैं सुनने के लिए हूं।”

संस्थानों की जिम्मेदारी भी तय हो

आत्महत्या की रोकथाम को केवल छात्र की व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानना उचित नहीं है। IIT और दूसरे उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहां छात्र जरूरत पड़ने पर बिना डर के सहायता मांग सके।

इसके लिए 24 घंटे या आसानी से उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य सहायता, प्रशिक्षित counsellors, गोपनीय शिकायत व्यवस्था, faculty sensitisation, peer-support programmes, academic mentoring और अभिभावकों के साथ बेहतर संवाद जरूरी हो सकते हैं।

शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2023 के बीच IITs में 33 छात्रों की आत्महत्या से मौत दर्ज की गई थी। इसी अवधि में IITs, NITs और IIMs को मिलाकर 61 मामले सामने आए थे।

इन आंकड़ों को देखकर केवल संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी संस्थागत व्यवस्था की है जो संकट के संकेतों को समय रहते पहचान सके और छात्र तक मदद पहुंचा सके।

क्या जिंदगी किसी CGPA से बड़ी है

IIT में प्रवेश उपलब्धि है, लेकिन जिंदगी की अंतिम मंजिल नहीं। एक बैकलॉग जिंदगी का अंत नहीं है। एक खराब परीक्षा परिणाम जिंदगी का अंत नहीं है। PhD का रिजेक्शन जिंदगी का अंत नहीं है। नौकरी न मिलना जिंदगी का अंत नहीं है। कॉलेज बदलना या करियर बदलना भी जिंदगी की हार नहीं है।

छात्रों को यह भरोसा दिलाना जरूरी है कि असफलता जिंदगी का एक हिस्सा है, उसकी परिभाषा नहीं।

World Suicide Prevention Day 2026 का सबसे बड़ा संदेश यही है—बात कीजिए, सुनिए और मदद मांगने को कमजोरी नहीं, बल्कि साहस समझिए।

IIT की सफलता की कहानी तब ही पूरी होगी, जब उसके आंकड़ों में केवल शानदार पैकेज और प्लेसमेंट नहीं, बल्कि सुरक्षित, स्वस्थ और संतुष्ट छात्र भी दिखाई देंगे।

क्योंकि किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके छात्र कितने ऊंचे पैकेज पर नौकरी करते हैं। असली उपलब्धि यह है कि उसके छात्र अपने संघर्षों के बीच भी यह महसूस करें—“मैं अकेला नहीं हूं, मेरी जिंदगी महत्वपूर्ण है और मदद मांगने के लिए मेरे पास लोग हैं।

निष्कर्ष भारत World Suicide Prevention Day 2026 पर भारतीय युवाओं को आत्महत्या न करने की अपील करता है। अपने जीवन में नवीनतम ऊर्जा से आगे बढ़े, जब भी मन में ऐसे विचलित करने वाले ख्याल आए तो अपने आप को ज्यादा देर तक अकेला न रखें

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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