करवा चौथ आज, बन रहा है त्रिवेणी संयोग; जानें चंद्रोदय का समय
करवा चौथ पर शुभ योग, जानें चंद्रोदय का समय और पूजा की विधि
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। करवा चौथ का पावन पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना के साथ महिलाएं यह व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रेम, विश्वास, समर्पण और वैवाहिक रिश्ते की मजबूती का प्रतीक है। इस अवसर पर महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय, करवा माता और चंद्रदेव की पूजा करती हैं।
दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, करवा चौथ पर चंद्रमा को रात 8:56 बजे के बाद अर्घ्य देने का समय बताया गया है। शाम 3:45 बजे तक रोहिणी नक्षत्र और उसके बाद मृगशिरा नक्षत्र का उल्लेख है। साथ ही परिघ योग, बुधादित्य योग और लक्ष्मीनारायण योग को भी इस पर्व के विशेष संयोगों में गिना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शुभ समय में विधि-विधान से पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है।
करवा चौथ पर बन रहा त्रिवेणी संयोग, पूजा का विशेष महत्व
करवा चौथ पर ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के साथ बताए गए शुभ योग पूजा के महत्व को बढ़ाते हैं। इस दिन महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को पूजा की तैयारी करती हैं। घरों में पूजा स्थल सजाया जाता है और करवा माता की आराधना के साथ व्रत की कथा सुनने की परंपरा निभाई जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है, जबकि चंद्रदेव की पूजा के बाद ही व्रत पूरा करने की परंपरा है। महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं।
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हालांकि, पूजा के लिए शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का सटीक समय शहर के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए व्रत करने वाली महिलाओं को स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करनी चाहिए।
करवा चौथ की पूजा विधि: शाम को ऐसे करें आराधना
करवा चौथ का व्रत सामान्यतः सूर्योदय से शुरू होकर चंद्रोदय तक रखा जाता है। कई परिवारों में सुबह सरगी खाने के बाद व्रत शुरू करने की परंपरा है। इसके बाद महिलाएं दिनभर अन्न और जल का त्याग करती हैं। हालांकि, व्रत रखने की परंपरा और नियम परिवार तथा व्यक्तिगत स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकते हैं।
शाम को स्नान करके स्वच्छ या नए वस्त्र पहनने और पारंपरिक श्रृंगार करने के बाद पूजा की तैयारी की जाती है। पूजा स्थल पर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश, कार्तिकेय और करवा माता का स्मरण किया जाता है। इसके बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है और परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है।
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चंद्रमा निकलने के बाद महिलाएं चलनी से चंद्र दर्शन करती हैं। कई घरों में चलनी के साथ दीपक रखकर चंद्रमा को देखने की परंपरा है। इसके बाद उसी चलनी से पति का चेहरा देखा जाता है और चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। पूजा पूरी होने के बाद महिलाएं पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत खोलती हैं।
चांद को अर्घ्य देने की परंपरा क्यों है खास?
करवा चौथ की पूजा में चंद्रदेव को विशेष स्थान दिया गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में चंद्रमा को मन, भावनाओं और मानसिक शांति से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत पूरा करने की परंपरा है।
अर्घ्य देने के लिए कई परिवारों में जल के साथ दूध, अक्षत और अन्य पूजा सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ स्थानों पर दूध, शहद, मिश्री और नारियल अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है। पूजा की सामग्री क्षेत्र और परिवार की परंपराओं के अनुसार बदल सकती है।
चलनी से चंद्रमा और फिर पति को देखने की रस्म इस पर्व की पहचान बन चुकी है। इसे प्रतीकात्मक रूप से प्रेम, विश्वास और दांपत्य रिश्ते के प्रति समर्पण से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में यह रस्म वैवाहिक जीवन की मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती है।
करवा चौथ की वीरावती कथा, जानें व्रत की पौराणिक कहानी
करवा चौथ के अवसर पर वीरावती की कथा सुनने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार, वीरावती सात भाइयों की इकलौती बहन थी। विवाह के बाद उसने अपने पति की लंबी आयु की कामना से करवा चौथ का व्रत रखा। दिनभर भूखे-प्यासे रहने के कारण वह शाम तक काफी व्याकुल हो गई।
अपनी बहन की परेशानी देखकर उसके भाइयों ने उसे भोजन कराने के लिए एक उपाय सोचा। कथा के अनुसार, उन्होंने दूर दीपक जलाकर चंद्रमा निकलने का भ्रम पैदा कर दिया। वीरावती ने उसे चंद्रमा समझकर व्रत खोल लिया। इस कारण उसका व्रत खंडित हो गया और उसके पति पर संकट आ गया।

इसके बाद वीरावती ने श्रद्धा और नियमपूर्वक दोबारा व्रत किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपने पति के प्राण वापस मिलने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। यह कथा व्रत के प्रति निष्ठा, धैर्य और विश्वास का संदेश देती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस कथा के वर्णन में कुछ अंतर भी मिलते हैं।
करवा चौथ पर शिव-पार्वती और चंद्रदेव के मंत्र
पूजा के दौरान श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार देवी-देवताओं के मंत्रों का जाप करते हैं। माता पार्वती के लिए ‘ॐ उमायै नमः’, भगवान शिव के लिए ‘ॐ नमः शिवाय’, भगवान गणेश के लिए ‘ॐ गणेशाय नमः’, भगवान कार्तिकेय के लिए ‘ॐ षण्मुखाय नमः’ और चंद्रदेव के लिए ‘ॐ सोमाय नमः’ मंत्र का जाप किया जा सकता है।
धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूजा और मंत्र जाप करने से मन को शांति मिलती है तथा परिवार के कल्याण की भावना मजबूत होती है। पूजा के दौरान परिवार की सुख-समृद्धि, पति के स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में प्रेम बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है।
करवा चौथ का संदेश: प्रेम, विश्वास और साथ का संकल्प
करवा चौथ केवल उपवास और पूजा तक सीमित पर्व नहीं है। यह पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास, आपसी सम्मान और साथ निभाने के संकल्प का भी प्रतीक है। सनातन परंपरा में माता पार्वती और भगवान शिव के संबंध को आदर्श दांपत्य के रूप में देखा जाता है। इसी तरह महाभारत से जुड़ी धार्मिक कथाओं में द्रौपदी द्वारा संकट के समय भगवान का स्मरण करने के प्रसंग भी सुनाए जाते हैं।
आज के समय में इस पर्व का उत्सव पारिवारिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का अवसर भी बन गया है। महिलाएं पूजा के लिए एकत्र होती हैं, कथा सुनती हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देती हैं।
व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए। कमजोरी या किसी स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में परंपराओं का पालन अपनी क्षमता के अनुसार करना और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह लेना उचित है।
करवा चौथ पर चंद्र दर्शन, अर्घ्य और पूजा के साथ महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करेंगी। चंद्रोदय के समय की स्थानीय पंचांग से पुष्टि करके पूजा करना इस दिन की तैयारियों का अहम हिस्सा है।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
