बिहार में सत्ता परिवर्तन की आहट! लालू हुए एक्टिव, सियासी समीकरण की तैयारी, क्या सम्राट की जाएगी कुर्सी?
लालू यादव की सक्रियता से बिहार में सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़े सियासी उलटफेर की अटकलें तेज हो गई हैं। दिल्ली में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी की मुलाकात, दूसरी ओर चिराग पासवान के लगातार बदलते राजनीतिक तेवर और जेडीयू में निशांत कुमार की बढ़ती सक्रियता ने नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार में सत्ता परिवर्तन की पटकथा तैयार हो रही है? क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है? और क्या नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कोई नया राजनीतिक समीकरण तैयार किया जा रहा है?
इन सवालों के बीच सबसे दिलचस्प चर्चा जेडीयू और आरजेडी के संभावित गठबंधन को लेकर है। हालांकि, अभी तक किसी भी दल की ओर से ऐसी राजनीतिक बातचीत या सत्ता परिवर्तन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन जिस तरह से अलग-अलग राजनीतिक घटनाक्रमों को जोड़कर देखा जा रहा है, उससे बिहार की राजनीति में नई संभावनाओं पर बहस शुरू हो गई है।
लालू यादव और सोनिया गांधी की मुलाकात से बढ़ी सियासी चर्चा
दिल्ली में लालू प्रसाद यादव और सोनिया गांधी की मुलाकात को बिहार की राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच पुराने राजनीतिक संबंध रहे हैं। कांग्रेस और आरजेडी लंबे समय से बिहार में एक साथ राजनीति करते रहे हैं। ऐसे में इस मुलाकात को केवल शिष्टाचार भेंट मानकर नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी।
लालू यादव की सक्रियता ऐसे समय में चर्चा का विषय बनी है, जब बिहार में विपक्ष अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। ऐसे में लालू यादव के सामने तेजस्वी यादव के राजनीतिक भविष्य और पार्टी की वापसी की चुनौती है।
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राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या लालू यादव बिहार में नए गठबंधन की संभावनाएं तलाश रहे हैं? क्या जेडीयू के साथ किसी तरह की बातचीत का रास्ता खुल सकता है? फिलहाल इन सवालों के जवाब सामने नहीं आए हैं, लेकिन दिल्ली की मुलाकात ने चर्चाओं को जरूर हवा दी है।
लालू यादव, निशांत कुमार और तेजस्वी यादव के बीच क्या बन सकता है समीकरण?
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ समय से निशांत कुमार का नाम लगातार चर्चा में है। जेडीयू के भीतर उनकी राजनीतिक भूमिका को लेकर अलग-अलग तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। सवाल यह है कि अगर भविष्य में जेडीयू और आरजेडी के बीच कोई राजनीतिक समझौता होता है तो नेतृत्व की जिम्मेदारी किसे मिलेगी?

राजनीतिक चर्चाओं में एक संभावित फार्मूले की बात भी सामने आ रही है। इसके तहत निशांत कुमार को मुख्यमंत्री और तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना पर चर्चा हो रही है। हालांकि, यह फिलहाल केवल राजनीतिक अटकल है। न तो जेडीयू और न ही आरजेडी ने ऐसे किसी फार्मूले को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है।
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इस तरह के समीकरण के पीछे दोनों दलों के अपने राजनीतिक हित हो सकते हैं। आरजेडी को सत्ता में वापसी का अवसर मिल सकता है, जबकि जेडीयू को अपने नए नेतृत्व को स्थापित करने का मौका मिलेगा। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती दोनों दलों के बीच नेतृत्व, सत्ता में हिस्सेदारी और राजनीतिक विश्वास कायम करने की होगी।
चिराग पासवान के बयान क्यों बढ़ा रहे हैं बेचैनी?
बिहार के संभावित राजनीतिक बदलाव में चिराग पासवान की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। केंद्र सरकार में मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान पिछले कुछ समय से बिहार सरकार के कामकाज और कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाते रहे हैं।
उनके बयानों को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के अर्थ निकाले जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या चिराग पासवान एनडीए के भीतर अपनी अलग राजनीतिक पहचान मजबूत कर रहे हैं या भविष्य की किसी बड़ी रणनीति के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं?
चिराग पासवान को उनके पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत भी हासिल है। रामविलास पासवान ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई गठबंधनों के साथ काम किया था। ऐसे में चिराग की अगली राजनीतिक चाल पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
हालांकि, सरकार की आलोचना करना गठबंधन छोड़ने का प्रमाण नहीं है। चिराग पासवान की ओर से एनडीए से अलग होने या किसी नए गठबंधन में शामिल होने का आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है।
आरएलएम के तीन विधायकों की भूमिका क्यों अहम?
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के विधायकों को लेकर भी चर्चा तेज है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के तीन विधायकों के जेडीयू की तरफ जाने की अटकलों ने राजनीतिक गणित को दिलचस्प बना दिया है।
यदि आरएलएम के तीन विधायक जेडीयू के साथ आते हैं तो विधानसभा में जेडीयू की संख्या 85 से बढ़कर 88 हो सकती है। इससे भाजपा और जेडीयू के विधायकों की संख्या बराबर होने की स्थिति बन सकती है। यही वजह है कि इन विधायकों की संभावित राजनीतिक भूमिका पर निगाहें टिकी हुई हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आरएलएम के विधायक अपना राजनीतिक रुख बदलते हैं तो वे भाजपा की बजाय जेडीयू की तरफ क्यों जाएंगे? क्या इसके पीछे भविष्य के नेतृत्व को लेकर कोई रणनीति है या फिर यह केवल राजनीतिक अटकल है? इन सवालों पर अभी स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।
बिहार विधानसभा का गणित और सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं
बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का समर्थन जरूरी है। उपलब्ध राजनीतिक आंकड़ों के आधार पर भाजपा के 88 और जेडीयू के 85 विधायकों की संख्या बताई जा रही है। आरएलएम के चार विधायकों के साथ चिराग पासवान की पार्टी के 19 और जीतन राम मांझी की पार्टी के चार विधायक भी एनडीए की राजनीतिक ताकत का हिस्सा हैं।
दूसरी तरफ आरजेडी के 25, कांग्रेस के छह और एआईएमआईएम के पांच विधायकों की भूमिका भी किसी नए राजनीतिक समीकरण में महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके अतिरिक्त एक विधायक वाली अन्य पार्टियों का समर्थन भी सरकार बनाने के गणित को प्रभावित कर सकता है।
यदि जेडीयू के 88 विधायक, आरजेडी के 25 और कांग्रेस के छह विधायक एक साथ आते हैं तो संख्या 119 तक पहुंचती है। एक अन्य विधायक का समर्थन मिलने पर यह संख्या 120 होगी। ऐसे में बहुमत के लिए एआईएमआईएम या अन्य विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है।
यदि चिराग पासवान की पार्टी भी किसी नए गठबंधन का हिस्सा बनती है तो यह संख्या और मजबूत हो सकती है। हालांकि, विधायकों की संख्या जोड़ना और वास्तव में सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं।
दिल्ली की राजनीति का बिहार पर कितना असर?
बिहार के इस संभावित राजनीतिक घटनाक्रम को केंद्र की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद केंद्र में एनडीए सरकार सहयोगी दलों के समर्थन से सत्ता में है। जेडीयू और चिराग पासवान की पार्टी के सांसदों का समर्थन केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण है। तेलुगु देशम पार्टी भी एनडीए की प्रमुख सहयोगी है।
ऐसी स्थिति में यदि बिहार में एनडीए के सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ती है तो उसका असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है। हालांकि, बिहार में किसी संभावित सत्ता परिवर्तन का मतलब अपने आप केंद्र सरकार का गिरना नहीं होगा। इसके लिए लोकसभा में अलग से बहुमत का गणित प्रभावित होना जरूरी है।
यही वजह है कि बिहार की राजनीति में चिराग पासवान, नीतीश कुमार की पार्टी और अन्य सहयोगियों के रुख को राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या सम्राट चौधरी की कुर्सी पर मंडरा रहा है खतरा?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लेकर है। क्या बिहार में नेतृत्व परिवर्तन होने जा रहा है? क्या जेडीयू अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाकर मुख्यमंत्री पद पर दावा कर सकती है? और क्या निशांत कुमार को आगे लाने की कोई तैयारी चल रही है?
फिलहाल इन सवालों पर कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन यदि एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के बीच मतभेद बढ़ते हैं और नए राजनीतिक समीकरण बनते हैं तो मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चर्चा स्वाभाविक है।

एक दूसरी संभावना मध्यावधि चुनाव की भी हो सकती है, यदि मौजूदा सरकार विधानसभा में बहुमत खो देती है और कोई वैकल्पिक सरकार नहीं बन पाती। हालांकि, सरकार का भविष्य केवल दलों की बयानबाजी से नहीं, बल्कि विधानसभा में वास्तविक समर्थन और संवैधानिक प्रक्रिया से तय होगा।
बिहार की राजनीति में आगे क्या होगा?
लालू यादव की दिल्ली में सक्रियता, सोनिया गांधी से मुलाकात, चिराग पासवान के बयान, निशांत कुमार को लेकर चर्चाएं और आरएलएम विधायकों की संभावित भूमिका ने बिहार की राजनीति को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है।
फिलहाल किसी तख्तापलट या नए गठबंधन की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इतना जरूर है कि बिहार में राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर निगाहें तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि ये चर्चाएं महज राजनीतिक अटकलें साबित होती हैं या वास्तव में बिहार की सत्ता के लिए कोई नया समीकरण आकार लेता है।
बड़ा सवाल यही है कि क्या लालू यादव बिहार की राजनीति में एक बार फिर निर्णायक भूमिका निभाने की तैयारी में हैं? क्या निशांत कुमार और तेजस्वी यादव एक साथ नई राजनीतिक पारी शुरू कर सकते हैं? और क्या चिराग पासवान इस पूरे खेल में सबसे बड़े किंगमेकर बनेंगे? इन सवालों का जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम ही देंगे।
पटना से संवाददाता की रिपोर्ट
