पटना के बांस घाट पर अंतिम संस्कार ठप, तीनों मशीनें खराब, बढ़ी परेशानी

पटना

पटना के बांस घाट पर अंतिम संस्कार बंद, तीनों मशीनें खराब होने से परेशानी

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। पटना में बांस घाट स्थित नगर निगम के पुराने विद्युत शवदाहगृह में अंतिम संस्कार की व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई है। यहां लगी तीनों विद्युत शवदाह मशीनें खराब होने से मृतकों के परिजनों की परेशानी बढ़ गई है। बुधवार, 14 अक्टूबर को सुबह से शाम तक 10 शवों का अंतिम संस्कार नहीं हो सका और परिजनों को शव लेकर वापस लौटना पड़ा। गुरुवार को भी शवदाहगृह पहुंचने वाले लोगों को निराश होकर गुलबी घाट का रुख करना पड़ा।

बांस घाट का पुराना विद्युत शवदाहगृह लंबे समय से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सस्ता विकल्प रहा है। यहां कम खर्च में अंतिम संस्कार की सुविधा उपलब्ध थी। खासकर लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण थी। लेकिन तीनों मशीनें खराब होने के बाद लोगों के सामने दूसरे घाटों पर जाने और अधिक खर्च उठाने की मजबूरी खड़ी हो गई है।

पटना के बांस घाट पर कैसे ठप हुई अंतिम संस्कार की व्यवस्था?

बांस घाट स्थित पुराने विद्युत शवदाहगृह में कुल तीन विद्युत शवदाह मशीनें लगी हैं। इनमें से दो मशीनें पहले ही पिछले करीब एक महीने से खराब थीं। ऐसे में तीसरी मशीन के सहारे ही शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा था। इसी मशीन पर पूरे शवदाहगृह का काम निर्भर हो गया था।

बुधवार को जब तीसरी मशीन भी खराब हो गई, तो अंतिम संस्कार की पूरी व्यवस्था बंद करनी पड़ी। एक साथ तीनों मशीनें काम करना बंद कर देंगी, इसकी वजह से यहां पहुंचने वाले परिवारों को तत्काल दूसरे विकल्प तलाशने पड़े।

बुधवार सुबह से शाम तक 10 शवों का अंतिम संस्कार नहीं हो पाने की जानकारी सामने आई। परिजनों को शव लेकर वापस लौटना पड़ा। गुरुवार को भी यही स्थिति बनी रही और लोगों को गुलबी घाट जाना पड़ा। किसी परिवार में मृत्यु होने के बाद अंतिम संस्कार में देरी पहले से दुखी परिजनों के लिए अतिरिक्त परेशानी बन जाती है।

पटना में गरीब परिवारों के सामने बढ़ा खर्च

बांस घाट का पुराना विद्युत शवदाहगृह अपनी कम लागत वाली सुविधा के कारण खास महत्व रखता है। यहां लावारिस शवों का अंतिम संस्कार महज 300 रुपये में किया जाता था। सीमित आमदनी वाले परिवारों के लिए भी यह अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प था।

अब मशीनें बंद होने के कारण लोगों को दीघा और गुलबी घाट जैसे दूसरे स्थानों पर जाना पड़ रहा है। इससे आने-जाने की परेशानी के साथ अतिरिक्त खर्च भी उठाना पड़ सकता है। शव को दूसरे घाट तक ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अलावा अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने में भी समय लगता है।

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सबसे अधिक परेशानी उन परिवारों को हो रही है, जिनके पास अचानक अंतिम संस्कार के लिए अधिक पैसे जुटाने की व्यवस्था नहीं है। ऐसे समय में सस्ती और सुलभ सार्वजनिक सुविधा का बंद होना उनके लिए बड़ी समस्या बन गया है।

आधुनिक विद्युत शवदाहगृह में 3,500 रुपये तक खर्च

पटना स्मार्ट सिटी की ओर से बनाए गए आधुनिक विद्युत शवदाहगृह में अंतिम संस्कार के लिए न्यूनतम 3,500 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। पुराने बांस घाट के शवदाहगृह में उपलब्ध कम लागत वाली सुविधा की तुलना में यह राशि काफी अधिक है।

ऐसे में मशीनों की खराबी केवल तकनीकी समस्या नहीं रह जाती, बल्कि इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है। जिस सुविधा के जरिए कम खर्च में अंतिम संस्कार किया जा सकता था, उसके बंद होने से परिवारों को दूसरे विकल्पों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

हालांकि अलग-अलग घाटों पर अंतिम संस्कार की वास्तविक लागत और उपलब्ध सुविधाओं में अंतर हो सकता है। ऐसे में परिजनों को दूसरे स्थानों पर जाने से पहले संबंधित व्यवस्था और शुल्क की जानकारी लेनी पड़ सकती है।

पटना नगर निगम की व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

बांस घाट की तीनों मशीनें खराब होने से शवदाहगृह के रखरखाव और मरम्मत की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। दो मशीनों के करीब एक महीने से खराब रहने के कारण पहले ही क्षमता सीमित हो गई थी। इसके बावजूद तीसरी मशीन पर पूरा काम निर्भर रहा।

ऐसी स्थिति में तीसरी मशीन खराब होने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत और अधिक महसूस हुई। यदि एक मशीन खराब होने पर दूसरी मशीनों की मरम्मत समय पर हो जाती, तो पूरी सेवा बंद होने की नौबत से बचने की संभावना रहती।

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हालांकि मशीनों में तकनीकी खराबी आने के पीछे की वजह और मरम्मत में लगने वाले समय को लेकर विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। संबंधित अधिकारियों को सभी मशीनों के खराब होने की सूचना दे दी गई है। अब लोगों को मरम्मत और शवदाहगृह दोबारा शुरू होने का इंतजार है।

लावारिस शवों के अंतिम संस्कार पर भी असर

पुराने विद्युत शवदाहगृह की एक अहम भूमिका लावारिस शवों के अंतिम संस्कार में भी रही है। कम शुल्क के कारण यहां ऐसी व्यवस्था संचालित करना अपेक्षाकृत आसान था। मशीनों के पूरी तरह बंद होने से इस काम के लिए भी वैकल्पिक इंतजाम की आवश्यकता पड़ सकती है।

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लावारिस शवों के मामले में समय पर अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में शवदाहगृह का लंबे समय तक बंद रहना संबंधित विभागों के लिए चुनौती बन सकता है।

बांस घाट की मौजूदा स्थिति यह भी बताती है कि सार्वजनिक सेवाओं में मरम्मत और नियमित रखरखाव कितना जरूरी है। खासकर उन सुविधाओं में, जिनका इस्तेमाल आम लोग आपात परिस्थितियों में करते हैं, तकनीकी खराबी का असर तुरंत दिखाई देता है।

अब मशीनों की मरम्मत और संचालन का इंतजार

बांस घाट के पुराने विद्युत शवदाहगृह की सभी मशीनें खराब होने की सूचना संबंधित अधिकारियों को दे दी गई है। अब सबसे बड़ी जरूरत मशीनों की जल्द मरम्मत कराकर सेवा बहाल करने की है, ताकि लोगों को दूसरे घाटों पर जाने के लिए मजबूर न होना पड़े।

फिलहाल शवदाहगृह कब तक दोबारा शुरू होगा, इसे लेकर कोई निश्चित समयसीमा सामने नहीं आई है। तब तक परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए वैकल्पिक घाटों का सहारा लेना पड़ सकता है।

पटना के बांस घाट की यह स्थिति नगर निगम के सामने एक अहम सवाल खड़ा करती है कि कम खर्च में अंतिम संस्कार की सुविधा को नियमित रूप से चालू रखने के लिए मरम्मत और वैकल्पिक व्यवस्था कितनी जल्दी सुनिश्चित की जा सकती है। मशीनें दोबारा चालू होने से न केवल परिजनों की परेशानी कम होगी, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी राहत मिल सकेगी।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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