BJP के दिग्गज नेता आरके सिन्हा का निधन, नोएडा में ली अंतिम सांस, बनाया था 13 हजार करोड़ का एंपायर
भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद और SIS ग्रुप के संस्थापक आरके सिन्हा का निधन। जानिए 250 रुपये की नौकरी से 15 हजार करोड़ के कारोबार तक का सफर।
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद और देश के प्रमुख कारोबारी चेहरों में शामिल डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का निधन हो गया है। आरके सिन्हा के नाम से मशहूर 75 वर्षीय सिन्हा ने शुक्रवार को नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से बिहार के राजनीतिक, सामाजिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वह भारतीय जनता पार्टी के शुरुआती दौर से जुड़े नेताओं और पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। राजनीति के साथ-साथ उन्होंने सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) ग्रुप की स्थापना कर देश के निजी सुरक्षा सेवा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई थी।
आरके सिन्हा का जीवन संघर्ष, पत्रकारिता, राजनीति और उद्यमिता का ऐसा सफर रहा, जिसकी शुरुआत महज 250 रुपये महीने की नौकरी से हुई थी। पटना में एक छोटे से गैराज से शुरू हुई उनकी कंपनी आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार करने वाले बड़े समूहों में शामिल है। उनके निधन के बाद उनके जीवन और उपलब्धियों की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है।
पटना लाया जाएगा आरके सिन्हा का पार्थिव शरीर
आरके सिन्हा के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए दिल्ली-एनसीआर से पटना लाए जाने की तैयारी है। पटना के पाटलिपुत्र स्थित अन्नपूर्णा भवन में लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे। अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार का विस्तृत कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया गया है।
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बिहार की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे आरके सिन्हा का पटना से गहरा जुड़ाव था। उनके राजनीतिक और कारोबारी जीवन की शुरुआत भी इसी शहर से हुई थी। ऐसे में उनके पार्थिव शरीर को पटना लाने की खबर के बाद समर्थकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और परिचितों में शोक का माहौल है।
कौन थे आरके सिन्हा? जनसंघ से भाजपा तक का सफर
डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा का जन्म 22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पटना में हुई। उन्होंने एएन कॉलेज से राजनीति विज्ञान और कानून की पढ़ाई की। युवावस्था से ही उनकी रुचि सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में थी।
उनका राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ के दौर से शुरू हुआ था। वर्ष 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें जनसंघ से जोड़ा था। बाद में जब भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ तो वह पार्टी के शुरुआती नेताओं और संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे।
भाजपा के संगठनात्मक विस्तार में उन्होंने अपनी भूमिका निभाई। वह अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के दौर के पुराने नेताओं में गिने जाते थे। वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा भेजा। वह 2014 से 2020 तक उच्च सदन के सदस्य रहे। संसद में उन्होंने गृह, विदेश और श्रम जैसे विषयों से जुड़ी समितियों में भी जिम्मेदारी निभाई।
250 रुपये की नौकरी से शुरू हुई थी आरके सिन्हा की कहानी
आरके सिन्हा के जीवन की सबसे चर्चित बात उनका पत्रकारिता से शुरू हुआ सफर है। राजनीति और कारोबार में पहचान बनाने से पहले उन्होंने पत्रकार के रूप में काम किया था। पटना के अंग्रेजी अखबार ‘द सर्चलाइट’ और हिंदी दैनिक ‘प्रदीप’ से उनका जुड़ाव रहा।
शुरुआती दिनों में उन्हें हर महीने लगभग 250 रुपये वेतन मिलता था। उस समय वह साइकिल से शहर के अलग-अलग इलाकों में जाकर अपराध और राजनीतिक घटनाओं की रिपोर्टिंग करते थे। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी काम किया था।
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युद्ध की रिपोर्टिंग के दौरान उनका संपर्क सेना के जवानों से हुआ। उन्होंने करीब से देखा कि सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद कई पूर्व सैनिकों के सामने रोजगार की समस्या आती है। यही अनुभव आगे चलकर उनके कारोबारी जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ।
जेपी की सलाह पर 1974 में रखी SIS ग्रुप की नींव
आरके सिन्हा के कारोबारी सफर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। बताया जाता है कि जेपी ने उन्हें सेवानिवृत्त सैनिकों के लिए रोजगार के अवसर तैयार करने की सलाह दी थी।
इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने वर्ष 1974 में पटना में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज यानी SIS की स्थापना की। शुरुआत एक छोटे से किराए के गैराज से हुई थी। शुरुआती दौर में कंपनी में केवल दो लोग थे। बाद में उन्होंने पूर्व सैनिकों को सुरक्षा गार्ड के रूप में रोजगार देना शुरू किया।

पहले चरण में करीब 14 पूर्व सैनिकों को कंपनी से जोड़ा गया। उस समय निजी सुरक्षा सेवाओं का कारोबार भारत में आज की तरह विकसित नहीं था। धीरे-धीरे कंपनियों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों और व्यावसायिक संस्थानों में निजी सुरक्षा की मांग बढ़ने लगी। इसका फायदा SIS को मिला और कंपनी का विस्तार होता चला गया।
आरके सिन्हा ने केवल सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने तक अपने कारोबार को सीमित नहीं रखा, बल्कि प्रशिक्षण और पेशेवर सुरक्षा व्यवस्था को भी महत्व दिया।
13 हजार करोड़ का कारोबार नहीं, इससे भी आगे पहुंचा SIS ग्रुप
जिस कंपनी की शुरुआत पटना के एक छोटे से गैराज से हुई थी, उसने आगे चलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। SIS ग्रुप ने सुरक्षा सेवाओं के साथ कैश लॉजिस्टिक्स, फैसिलिटी मैनेजमेंट और अन्य व्यावसायिक सेवाओं में भी विस्तार किया।
कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया सहित विदेशों में भी अपना कारोबार फैलाया। वर्ष 2008 में ऑस्ट्रेलिया की चब सिक्योरिटी के कारोबार का अधिग्रहण समूह के अंतरराष्ट्रीय विस्तार का महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
आज SIS ग्रुप भारत के प्रमुख सुरक्षा और बिजनेस सपोर्ट सर्विस समूहों में शामिल है। कंपनी की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में समूह का राजस्व लगभग 15,982 करोड़ रुपये रहा। यह आंकड़ा कंपनी के कारोबार यानी राजस्व का है, व्यक्तिगत संपत्ति या कंपनी के बाजार मूल्य का नहीं।
इस तरह 250 रुपये की नौकरी से शुरू हुआ उनका सफर हजारों करोड़ रुपये के कारोबार वाले व्यावसायिक समूह की स्थापना तक पहुंचा। इस विस्तार में उनके बेटे ऋतुराज किशोर सिन्हा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिक्षा और समाजसेवा में भी सक्रिय रहे आरके सिन्हा
आरके सिन्हा की पहचान केवल एक राजनेता और कारोबारी तक सीमित नहीं रही। शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में भी उन्होंने कई पहल कीं। उन्होंने देहरादून में इंडियन पब्लिक स्कूल की स्थापना की। इसके अलावा अवसर ट्रस्ट के माध्यम से शिक्षा और सामाजिक कल्याण से जुड़े कार्यों में योगदान दिया।
उनका विशेष जोर पूर्व सैनिकों और युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने पर रहा। SIS ग्रुप के माध्यम से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला। उन्होंने निजी सुरक्षा क्षेत्र में प्रशिक्षण और पेशेवर मानकों को बढ़ावा देने के लिए भी काम किया।
पत्रकारिता के अनुभव ने उन्हें लेखन से भी जोड़े रखा। उन्होंने बिहार के छात्र आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन पर ‘जन आंदोलन’ नामक पुस्तक लिखी। इसके अलावा सुरक्षा प्रबंधन और सामाजिक विषयों पर भी उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने किया था सम्मानित
आरके सिन्हा के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अवसर 19 अक्टूबर 2023 को आया था। मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें डॉक्टर ऑफ लेटर्स की मानद उपाधि से सम्मानित किया था।
यह सम्मान उनके सामाजिक, शैक्षणिक और व्यावसायिक योगदान के लिए दिया गया था। बिहार से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले आरके सिन्हा के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
बिहार की राजनीति और कारोबारी जगत में छोड़ी अपनी पहचान
आरके सिन्हा का जीवन कई अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ा रहा। उन्होंने पत्रकारिता में काम किया, जनसंघ और भाजपा के संगठनात्मक दौर को करीब से देखा, राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व किया और निजी सुरक्षा सेवाओं के क्षेत्र में एक बड़े कारोबारी समूह की नींव रखी।
उनके निधन से बिहार ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया है, जिसकी पहचान राजनीति और कारोबार दोनों में थी। 250 रुपये की नौकरी से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय कारोबारी समूह खड़ा करने तक का उनका सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष और उद्यमिता की एक महत्वपूर्ण कहानी के रूप में याद किया जाएगा।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
