रुपये में भारी गिरावट, 96.78 के स्तर पर पहुंचा; RBI ने उठाया बड़ा कदम

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रुपये में रिकॉर्ड गिरावट, ₹96.78 प्रति डॉलर के स्तर पर RBI ने कड़े किए नियम

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेज गिरावट के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने और करेंसी ट्रेडिंग में अनुशासन मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, रुपया 96.78 प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल गया, जो बताए गए ऐतिहासिक निचले स्तर के करीब है।

रुपये पर दबाव के बीच RBI ने करेंसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट की सीमा घटाने, रद्द किए गए कॉन्ट्रैक्ट की दोबारा बुकिंग पर रोक और कुछ बड़े सौदों पर अतिरिक्त कैश रिजर्व जैसे उपाय लागू किए हैं। RBI की इस कार्रवाई का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में अनावश्यक जोखिम और सट्टा गतिविधियों को नियंत्रित करना है। इसके साथ ही सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी नई व्यवस्था की जानकारी सामने आई है।

रुपये की चाल, विदेशी निवेश और देश के विदेशी मुद्रा भंडार में आई गिरावट के कारण वित्तीय बाजार की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। ध्यान रहे कि रुपये का विनिमय भाव लगातार बदलता रहता है। इसलिए 96.78 रुपये प्रति डॉलर का स्तर और संबंधित नियामकीय उपायों की प्रभावी तारीख की पुष्टि RBI तथा विश्वसनीय बाजार आंकड़ों से करना जरूरी है।

रुपये में गिरावट रोकने के लिए RBI ने बदले नियम

RBI ने रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम सीमित करने के लिए कई बदलाव किए हैं। नए नियमों के तहत रजिस्टर्ड डीलरों के माध्यम से किए जाने वाले कुछ करेंसी कॉन्ट्रैक्ट की दोबारा बुकिंग पर रोक लगाई गई है। हालांकि, मौजूदा नियमों के अनुसार मैच्योरिटी पर कॉन्ट्रैक्ट को रोलओवर करने की अनुमति जारी रहेगी। इसका उद्देश्य ऐसे लेनदेन पर नियंत्रण रखना है, जिनके पीछे वास्तविक कारोबारी जरूरत के बजाय केवल विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से मुनाफा कमाने की मंशा हो सकती है।

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विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव ऐसे वित्तीय कॉन्ट्रैक्ट होते हैं, जिनका इस्तेमाल भविष्य में मुद्रा की कीमत में होने वाले बदलाव से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए किया जाता है। आयातकों, निर्यातकों और अंतरराष्ट्रीय कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए ये उपयोगी होते हैं। लेकिन इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सट्टेबाजी के लिए भी हो सकता है।

रुपये से जुड़े करेंसी ट्रेड की सीमा 100 मिलियन से घटाकर 5 मिलियन डॉलर

RBI के नए उपायों में बिना वास्तविक अंतर्निहित विदेशी मुद्रा जोखिम (अंडरलाइंग एक्सपोजर) के किए जाने वाले कुछ डेरिवेटिव लेनदेन की सीमा घटाना भी शामिल है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रजिस्टर्ड डीलरों के लिए संबंधित सीमा 100 मिलियन डॉलर के बराबर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दी गई है।

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मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंजों पर रुपये से जुड़े एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी डेरिवेटिव में बिना अंडरलाइंग एक्सपोजर के पोजिशन लेने की संबंधित सीमा भी इसी स्तर पर लाई गई है। इस बदलाव से उन कारोबारियों की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं, जो वास्तविक आयात, निर्यात या दूसरे कारोबारी जोखिम के बिना बड़े करेंसी सौदे करते हैं।

दूसरी ओर, जिन कंपनियों को वास्तविक कारोबारी जरूरतों के लिए डॉलर खरीदने या बेचने की आवश्यकता होती है, उनके लिए हेजिंग की सुविधा महत्वपूर्ण बनी रहेगी। RBI का जोर जोखिम प्रबंधन और विदेशी मुद्रा बाजार में अनुशासन बनाए रखने पर है।

20 फीसदी कैश रिजर्व का नियम क्या है?

केंद्रीय बैंक ने 2 मिलियन डॉलर से अधिक की नोशनल वैल्यू वाले कुछ रुपये-संबंधी विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए फॉरेन करेंसी रिस्क रिजर्व (FERR) की व्यवस्था लागू करने की जानकारी दी है।

इसके तहत पात्र लेनदेन की नोशनल राशि के रुपये में बराबर मूल्य का 20 प्रतिशत कैश रिजर्व के तौर पर रखने का प्रावधान बताया गया है। यह व्यवस्था निर्धारित शर्तों के अधीन लागू होती है और इसे हर प्रकार के विदेशी मुद्रा सौदे पर लागू सामान्य नियम नहीं समझना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि किसी पात्र कॉन्ट्रैक्ट की नोशनल राशि का रुपये में मूल्य 10 करोड़ रुपये है, तो 20 प्रतिशत के हिसाब से रिजर्व की राशि 2 करोड़ रुपये होगी।

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इस तरह के प्रावधान से बड़े लेनदेन के लिए अतिरिक्त नकदी की जरूरत बढ़ सकती है। इसका उद्देश्य बाजार में अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति को सीमित करना और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही मजबूत करना है।

रुपये की हेजिंग पर अब अतिरिक्त दस्तावेज जरूरी

RBI ने कॉन्ट्रैक्टेड एक्सपोजर को हेज करने के लिए रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव का इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों के लिए दस्तावेजी प्रक्रिया भी सख्त की है। नए प्रावधानों के अनुसार, रजिस्टर्ड डीलरों को ग्राहकों से ऐसा वचन-पत्र लेना और सुरक्षित रखना होगा, जिसमें यह पुष्टि की जाए कि एक ही अंतर्निहित जोखिम को किसी अन्य रजिस्टर्ड डीलर के साथ भी हेज नहीं किया गया है। इसका उद्देश्य एक ही कारोबारी जोखिम के नाम पर कई जगह कॉन्ट्रैक्ट लेकर अतिरिक्त पोजिशन बनाने की संभावना को कम करना है।

आयात करने वाली कंपनियां डॉलर की कीमत बढ़ने के जोखिम से बचने के लिए पहले से हेजिंग करती हैं। इसी तरह निर्यातक भी भविष्य में मिलने वाले डॉलर के मूल्य में गिरावट से बचने के लिए ऐसे कॉन्ट्रैक्ट का उपयोग कर सकते हैं। इसलिए नियमों में बदलाव का वास्तविक कारोबार करने वाली कंपनियों पर क्या असर पड़ेगा, यह उनके लेनदेन की प्रकृति पर निर्भर करेगा।

सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर जरूरत पर RBI की नई व्यवस्था

रिपोर्ट के अनुसार, 12 अक्टूबर से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन की दैनिक विदेशी मुद्रा जरूरतों को पूरा करने के लिए RBI की ओर से विशेष व्यवस्था की जानी है।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भुगतान मुख्य रूप से डॉलर में होने के कारण सरकारी तेल कंपनियों को नियमित रूप से विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ती है।

यदि इन कंपनियों की डॉलर मांग का एक बड़ा हिस्सा बाजार से हटाकर केंद्रीय बैंक के माध्यम से पूरा किया जाता है, तो विदेशी मुद्रा बाजार में तत्काल मांग के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, रुपये की विनिमय दर पर इसका वास्तविक असर कई कारकों पर निर्भर करेगा। इनमें कच्चे तेल की कीमत, डॉलर की वैश्विक मांग, विदेशी निवेश और भारत के आयात-निर्यात का संतुलन शामिल हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार में 12.95 अरब डॉलर की गिरावट

रुपये पर दबाव के बीच भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.95 अरब डॉलर घटकर 734.60 अरब डॉलर रह गया। विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में 10.66 अरब डॉलर की कमी के बाद उनका मूल्य 604.74 अरब डॉलर बताया गया, जबकि स्वर्ण भंडार 2.28 अरब डॉलर घटकर 106.41 अरब डॉलर रह गया।

इससे पहले के सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 18.34 अरब डॉलर की गिरावट की जानकारी दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 785.70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था।

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट का अर्थ अपने आप में आर्थिक संकट नहीं होता। इसमें विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में बदलाव, केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप और अन्य कारकों की भूमिका हो सकती है। गिरावट के कारणों को समझने के लिए RBI के विस्तृत आंकड़ों का अध्ययन जरूरी है।

रुपये में गिरावट का आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने का असर आयात पर निर्भर कारोबार और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। जब एक डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तो आयातित सामान की लागत बढ़ने की आशंका रहती है।

भारत कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, मशीनरी और कई औद्योगिक उत्पादों का आयात करता है। यदि कंपनियों की लागत बढ़ती है और वे उसका बोझ ग्राहकों पर डालती हैं, तो पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन और कुछ दूसरे सामान की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों, विदेश यात्रा करने वाले परिवारों और डॉलर में भुगतान करने वाले लोगों के लिए भी कमजोर रुपया महंगा साबित हो सकता है। हालांकि, इसका असर हर वस्तु की कीमत पर तुरंत या समान रूप से नहीं पड़ता। कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार, करों, सरकारी नीतियों और कंपनियों की लागत पर भी निर्भर करती हैं।

आगे रुपये की चाल पर क्यों रहेगी नजर?

RBI के नए उपायों का वास्तविक प्रभाव आने वाले दिनों में विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबार, रुपये की विनिमय दर और विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़ों से समझा जा सकेगा।

यदि इन उपायों से सट्टा गतिविधियों पर अंकुश लगता है और डॉलर की मांग का दबाव कम होता है, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन मजबूत अमेरिकी डॉलर, महंगा कच्चा तेल और विदेशी निवेश की निकासी जैसी चुनौतियां बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है।

रुपये में गिरावट के बीच RBI ने विदेशी मुद्रा बाजार में जोखिम नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन नियमों से बाजार में स्थिरता कितनी आती है और भारतीय मुद्रा को आगे कितनी राहत मिलती है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट