बिहार में डस्टबिन घोटाले के बाद अब हुआ स्वागत गेट घोटाला, 11 लाख में ख़रीदा गया एक गेट, 40 लाख हुआ खर्च,  हैरान कर देगी पूरी रिपोर्ट 

घोटाले

पावापुरी में स्वागत गेट की खरीद पर 40 लाख खर्च का दावा

निष्कर्ष भारत, संवाददाता पटना। बिहार में डस्टबिन घोटाले की चर्चा के बाद अब नालंदा जिले के पावापुरी नगर पंचायत से जुड़े स्वागत गेट की खरीद और स्थापना का मामला सोशल मीडिया पर बहस का विषय बना हुआ है। वायरल पोस्ट में दावा किया गया है कि अब बिहार में एक नए घोटाले की खबर सामने आई है नगर पंचायत क्षेत्र में पांच वेलकम गेट पर करीब 40 लाख 50 हजार रुपये खर्च किए गए। पोस्ट में प्रति गेट लगभग 8 लाख 10 हजार रुपये की लागत का जिक्र करते हुए सरकारी धन के इस्तेमाल और विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

पांच स्वागत गेट पर 40.50 लाख खर्च का दावा

वायरल पोस्ट में घोटाले की बात नगर पंचायत से जुड़ा एक खरीद आदेश का दस्तावेज भी दिखाया गया है। पोस्ट में पांच गेट की खरीद और स्थापना पर 40 लाख 50 हजार रुपये खर्च होने का दावा किया गया है। हालांकि, घोटाले का दस्तावेज में दिखाई गई प्रति इकाई कीमत और पोस्ट में बताई गई गणना के बीच अंतर नजर आने की बात भी सामने आई है।

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यही अंतर अब पूरे मामले को और अधिक जांच के दायरे में लाता है। वास्तविक लागत जानने के लिए खरीद आदेश, टैक्स, परिवहन, निर्माण, स्थापना और अन्य संबंधित खर्चों का अलग-अलग विवरण सामने आना जरूरी है।

डस्टबिन घोटाले के बाद स्वागत गेट पर चर्चा

बिहार में सरकारी राशि से जुड़ी खरीद को लेकर पहले भी सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे सामने आते रहे हैं। डस्टबिन घोटाले के नाम से चर्चित मामलों के बाद अब पावापुरी के स्वागत गेट घोटाले को लेकर उठे सवालों ने सरकारी खरीद और स्थानीय निकायों के खर्च पर बहस को फिर तेज कर दिया है।

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हालांकि, किसी सोशल मीडिया पोस्ट में किसी खर्च को घोटाला कहना अपने आप में प्रमाण नहीं है। घोटाले या किसी भी अनियमितता की पुष्टि के लिए सरकारी रिकॉर्ड, निविदा प्रक्रिया, भुगतान विवरण और सक्षम जांच की जरूरत होती है।

सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, प्राथमिकता का भी

पावापुरी घोटाले में सामने आए विवाद का केंद्र केवल एक गेट की कीमत नहीं है। सोशल मीडिया पोस्ट में यह सवाल भी उठाया गया है कि नगर पंचायत के पास उपलब्ध धन का इस्तेमाल स्थानीय लोगों की बुनियादी जरूरतों के लिए किस तरह किया जा रहा है।

घोटाले के पोस्ट में स्कूलों में कुर्सियों, बच्चों के बैठने की बेहतर व्यवस्था और विज्ञान प्रयोगशालाओं जैसी सुविधाओं का उदाहरण देते हुए पूछा गया है कि क्या ऐसे कामों को प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए। स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि नगर पंचायत के विकास का मतलब केवल आकर्षक प्रवेश द्वार और सजावटी ढांचे तैयार करना नहीं होना चाहिए।

सड़क, नाली और पेयजल पर भी उठे सवाल

नगर पंचायतों में विकास का दायरा सड़क, नाली, पेयजल, सफाई, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक फैला होता है। ऐसे में सरकारी राशि से होने वाले हर बड़े खर्च को लेकर जनता का यह जानना स्वाभाविक है कि उससे क्षेत्र को कितना प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

हालांकि, किसी स्वागत गेट की उपयोगिता का अंतिम फैसला स्थानीय जरूरत, प्रशासनिक योजना और स्वीकृत विकास परियोजना के आधार पर ही किया जा सकता है। इसलिए केवल गेट पर खर्च होने वाली राशि को दूसरी योजनाओं से तुलना करके अनियमितता मान लेना भी उचित नहीं होगा।

खरीद प्रक्रिया पर भी निगाह

वायरल पोस्ट में खरीद प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं। इनमें यह जानने की मांग की गई है कि गेट की खरीद के लिए किस प्रक्रिया का पालन किया गया, क्या बाजार की कीमतों से तुलना की गई और क्या सामग्री की गुणवत्ता की तकनीकी जांच हुई।

इसके अलावा तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश, निविदा या खरीद आदेश, भुगतान की जानकारी और स्थापना से संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग भी उठ रही है। इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद ही यह पता चल सकेगा कि खरीद किस आधार पर की गई थी।

डस्टबिन घोटाले जैसी चर्चा से पहले दस्तावेज जरूरी

सरकारी खरीद से जुड़े मामलों में सोशल मीडिया पर सामने आने वाले दावों की जांच दस्तावेजों के आधार पर होना जरूरी है। डस्टबिन घोटाला जैसे शब्द किसी मामले को तुरंत चर्चा में ला सकते हैं, लेकिन किसी नए मामले में भी आधिकारिक जांच या ठोस रिकॉर्ड के बिना घोटाले का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

यदि पांचों गेट की वास्तविक कीमत, स्थापना लागत और अन्य खर्चों का पूरा विवरण सामने आता है तो वायरल पोस्ट में किए गए दावे और सरकारी रिकॉर्ड के बीच तुलना की जा सकती है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि प्रति गेट वास्तविक खर्च कितना पड़ा।

सरकारी ई-मार्केटप्लेस से मिल सकती है जानकारी

सरकारी संस्थाओं की खरीद में सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी GeM जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है। यदि पावापुरी नगर पंचायत की यह खरीद इसी व्यवस्था या किसी अन्य निर्धारित सरकारी प्रक्रिया के माध्यम से हुई है, तो संबंधित खरीद रिकॉर्ड से कीमत, आपूर्तिकर्ता और आदेश से जुड़ी जानकारी की जांच की जा सकती है।इसके अलावा नगर पंचायत के भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित फाइलों से भी वास्तविक खर्च का मिलान किया जा सकता है।

प्रशासन के जवाब का इंतजार

फिलहाल वायरल सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए घोटाले के दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पावापुरी नगर पंचायत या संबंधित प्रशासन की ओर से इन आरोपों और सवालों पर विस्तृत जवाब सामने आना बाकी है।

ऐसे में फिलहाल इसे स्वागत गेट घोटाला कहना जल्दबाजी होगी। मामले में वास्तविक स्थिति तभी स्पष्ट होगी जब खरीद आदेश, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान विवरण, स्थापना लागत और अन्य जरूरी दस्तावेज सार्वजनिक या जांच के लिए उपलब्ध होंगे।

जांच हुई तो साफ होगी पूरी तस्वीर

पांच वेलकम गेट की खरीद का मामला अब सरकारी धन की पारदर्शिता और विकास की प्राथमिकताओं से जुड़ गया है। स्थानीय स्तर पर मांग है कि नगर पंचायत पूरी खरीद प्रक्रिया और खर्च का विवरण सार्वजनिक करे, ताकि लोगों के बीच उठ रहे सवालों का जवाब मिल सके।

यदि दस्तावेजों की जांच में नियमों के उल्लंघन या वित्तीय अनियमितता के प्रमाण मिलते हैं तो सक्षम एजेंसी को नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं, यदि खरीद पूरी तरह नियमों के तहत हुई है तो आधिकारिक रिकॉर्ड सामने आने से विवाद और सोशल मीडिया पर चल रही अटकलों पर भी विराम लग सकता है।

फिलहाल निगाह प्रशासन की प्रतिक्रिया पर है। पांच गेट पर वास्तविक खर्च कितना हुआ, खरीद किस प्रक्रिया से हुई और क्या सभी नियमों का पालन किया गया—इन सवालों के जवाब सरकारी दस्तावेज और आधिकारिक जांच से ही सामने आएंगे।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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