बिहार में गरमाई सियासत: संविधान (131वां संशोधन) बिल गिरने पर NDA vs विपक्ष आमने-सामने, महिला आरक्षण पर छिड़ी नई बहस
महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर NDA और विपक्ष आमने-सामने हैं।
लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित न होने के बाद देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं, और बिहार भी इससे अछूता नहीं रहा। राज्य में सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। जहां एक तरफ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कांग्रेस पर महिलाओं के खिलाफ होने का आरोप लगाया है, वहीं विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर NDA और विपक्ष आमने-सामने हैं।
CM सम्राट चौधरी का कांग्रेस पर हमला
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति करने वाली कांग्रेस की “दोहरी सोच” अब देश के सामने आ गई है।
उन्होंने कहा कि जब महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का अवसर आया, तब विपक्ष ने इसका समर्थन नहीं किया। उनके मुताबिक, विपक्ष महिलाओं के नेतृत्व और सशक्तिकरण से डरता है और इसलिए इस ऐतिहासिक पहल को रोक दिया गया।
रोहिणी आचार्य ने उठाए जमीनी मुद्दे
वहीं, राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद की बेटी रोहिणी आचार्य ने इस मुद्दे पर अलग दृष्टिकोण रखते हुए सरकार को घेरा।
उन्होंने कहा कि सिर्फ आरक्षण देने की बात करना काफी नहीं है, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर भी ध्यान देना जरूरी है। रोहिणी ने अपने बयान में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, सामाजिक भेदभाव और घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों को उठाया।

उन्होंने कहा कि देश में आज भी कई जगहों पर पर्दा प्रथा, दहेज उत्पीड़न, यौन शोषण और बलात्कार जैसी घटनाएं हो रही हैं। ऐसे में सरकार पहले महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, फिर सशक्तिकरण की बात करे।
तेजस्वी यादव का केंद्र पर हमला
राजद नेता तेजस्वी यादव ने भी केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण बिल पहले ही 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन सरकार इसे बार-बार राजनीतिक मुद्दा बनाकर पेश कर रही है।
तेजस्वी के अनुसार, केंद्र सरकार चुनावी फायदे के लिए इस मुद्दे का इस्तेमाल कर रही है और परिसीमन के नाम पर लोकतांत्रिक ढांचे को बदलने की कोशिश कर रही है।
उपेंद्र कुशवाहा का पोस्ट और सोशल मीडिया पर बहस
आरएलएम के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने भी इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने लिखा कि उनकी पार्टी का “संवैधानिक-अधिकार-परिसीमन-सुधार” अभियान विपक्ष के विरोध के कारण अधूरा रह गया। उन्होंने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता, तो बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 और विधानसभा सीटें 243 से बढ़कर 365 हो जातीं।

हालांकि, उनके इस पोस्ट पर सोशल मीडिया यूजर्स ने तीखी प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने टिप्पणी की कि अगर बिल पास हो जाता तो उनकी बहू सांसद बन सकती थीं, लेकिन विपक्ष ने उनके “मंसूबों पर पानी फेर दिया।”
कुशवाहा परिवार की राजनीति में सक्रियता
उपेंद्र कुशवाहा का परिवार भी इन दिनों राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हाल ही में उनके बेटे दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली है, जबकि वे न तो विधायक हैं और न ही एमएलसी।
कुशवाहा खुद राज्यसभा सांसद हैं, उनकी पत्नी विधायक हैं और उनकी बहू साक्षी मिश्रा भी सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। इससे विपक्ष को परिवारवाद का मुद्दा उठाने का मौका भी मिल रहा है।
लोजपा(आर) महिला मोर्चा का प्रदर्शन
पटना में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के महिला मोर्चा ने विरोध प्रदर्शन किया।
दर्जनों महिला कार्यकर्ता सड़कों पर उतरीं और कांग्रेस नेता राहुल गांधी का पुतला फूंका। इस दौरान “राहुल गांधी होश में आओ” जैसे नारे लगाए गए।

महिला मोर्चा की सदस्य संगीता पासवान ने कहा कि यह दिन महिलाओं के लिए “काला दिन” है, क्योंकि एक महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो सका। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के खिलाफ काम किया है।
महिला आरक्षण बनाम परिसीमन: असली विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ महिला आरक्षण और परिसीमन के बीच का संबंध है। सरकार का कहना है कि सीटों का पुनर्निर्धारण (परिसीमन) किए बिना महिला आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता।
वहीं विपक्ष का तर्क है कि परिसीमन के जरिए राजनीतिक संतुलन बदला जा सकता है, जिससे कुछ राज्यों को नुकसान और कुछ को फायदा होगा।
राजनीतिक असर और भविष्य की रणनीति
इस घटनाक्रम का असर आने वाले चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है। एनडीए इस मुद्दे को “महिला सशक्तिकरण” के रूप में पेश कर विपक्ष को घेरने की कोशिश करेगा।
वहीं विपक्ष इसे “संविधान और लोकतंत्र की रक्षा” के रूप में जनता के सामने रखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा 2029 के लोकसभा चुनाव तक राजनीतिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का लोकसभा में गिरना केवल एक विधायी घटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में गहरे मतभेदों और रणनीतिक टकराव को भी दर्शाता है।
बिहार में जिस तरह से इस मुद्दे पर राजनीतिक तापमान बढ़ा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होगी। महिला आरक्षण, परिसीमन और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे अब सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि जनता के बीच भी बड़ा राजनीतिक विमर्श बनेंगे।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
