सम्राट चौधरी की सरकार का मेगा दावा: क्या संभव है 12 महीने में ₹5 लाख करोड़ निवेश?

सम्राट चौधरी

बिहार की राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश देते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में अपने पहले भाषण के दौरान एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा—अगले एक साल में राज्य में ₹5 लाख करोड़ का निजी निवेश लाने का दावा।

मुख्यमंत्री के बड़े दावे पर उठे सवाल, आंकड़े बता रहे अलग हकीकत

पटना, बिहार: बिहार की राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संदेश देते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधानसभा में अपने पहले भाषण के दौरान एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा—अगले एक साल में राज्य में ₹5 लाख करोड़ का निजी निवेश लाने का दावा। यह घोषणा 24 अप्रैल को विश्वास मत के दौरान की गई, जिसने राजनीतिक और औद्योगिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि उनकी सरकार ने पिछले दो वर्षों में ₹1.36 लाख करोड़ के निजी निवेश को आकर्षित किया है और अब लक्ष्य इसे कई गुना बढ़ाने का है। हालांकि, यह दावा जहां उम्मीद जगाता है, वहीं पिछले आंकड़े और जमीन पर हकीकत कई सवाल भी खड़े करते हैं।


क्या कहते हैं आंकड़े?

बिहार आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, सितंबर 2025 तक बिहार में केवल ₹10,635 करोड़ का निवेश ही वास्तव में धरातल पर उतर पाया है। जबकि 2016 से अब तक राज्य को लगभग ₹2.31 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव (MoU) मिले थे।

इनमें से:

  • ₹1.11 लाख करोड़ के प्रस्तावों ने प्रथम चरण की स्वीकृति के लिए आवेदन किया
  • ₹13,693 करोड़ के निवेश ने अगले चरण तक पहुंच बनाई
  • अंततः केवल ₹10,635 करोड़ का निवेश ही वास्तविक परियोजनाओं में बदल सका

इसका मतलब साफ है कि कुल MoU का 5% से भी कम निवेश ही जमीन पर उतर पाया है। ऐसे में ₹5 लाख करोड़ के लक्ष्य को लेकर संदेह होना स्वाभाविक है।


निवेश में सबसे आगे कौन से सेक्टर?

अब तक जो निवेश बिहार में आया है, उसमें सबसे बड़ा हिस्सा खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) सेक्टर का रहा है। लगभग ₹4,866 करोड़ का निवेश इसी क्षेत्र में हुआ है, जो राज्य की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था को देखते हुए स्वाभाविक भी है।

इसके अलावा:

  • इथेनॉल प्लांट्स में करीब ₹1,467 करोड़ का निवेश हुआ
  • इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भी सीमित निवेश देखने को मिला

हालांकि, इथेनॉल उद्योग की स्थिति हाल के वर्षों में कमजोर हुई है। नीति में बदलाव और खरीद कोटा घटने के कारण कई इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं।


निवेश क्यों नहीं आ पाता बिहार?

विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार में निवेश की धीमी रफ्तार के पीछे कई प्रमुख कारण हैं:

1. नीति में बार-बार बदलाव

सरकारी नीतियों में लगातार बदलाव निवेशकों के भरोसे को कमजोर करता है। उदाहरण के तौर पर, शराबबंदी लागू होने से हॉस्पिटैलिटी और संबंधित उद्योगों को बड़ा झटका लगा।

2. भूमि अधिग्रहण की समस्या

लंबे समय तक राज्य सरकार निजी कंपनियों के लिए जमीन अधिग्रहण नहीं करती थी, जिससे निवेशकों को खुद यह प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती थी। हालांकि अब सरकार ने इस नीति में बदलाव किया है और जमीन उपलब्ध कराने की पहल की है।

3. कानून व्यवस्था

बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर भी निवेशकों में संदेह बना रहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह एक बड़ा कारण है कि राज्य शुरुआती निवेश अवसरों को खो चुका है।

4. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

हालांकि पिछले दो दशकों में सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है, फिर भी बड़े उद्योगों के लिए जरूरी सुविधाएं अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हैं।


क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेंद्र का कहना है कि यह केवल बिहार की समस्या नहीं है। देश के कई राज्यों में बड़े-बड़े MoU होते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही वास्तविक निवेश में बदल पाते हैं।

वहीं, अरुण अग्रवाल इस घोषणा को सकारात्मक मानते हैं। उनके अनुसार, “डबल इंजन सरकार” की स्थिति में केंद्र और राज्य दोनों का सहयोग मिलेगा, जिससे निवेश की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

दूसरी ओर, राकेश तिवारी का मानना है कि निवेश के लिए लंबी अवधि की स्थिर नीतियां जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि निवेशकों को जमीन, वित्त और सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए।


क्या ₹5 लाख करोड़ का लक्ष्य संभव है?

यह सवाल सबसे अहम है। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी राशि के MoU हासिल करना संभव है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना सबसे बड़ी चुनौती है।

अगर सरकार को इस लक्ष्य को हासिल करना है, तो उसे:

  • नीति में स्थिरता बनाए रखनी होगी
  • निवेशकों के लिए आसान प्रक्रियाएं बनानी होंगी
  • कानून-व्यवस्था को मजबूत करना होगा
  • इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स में सुधार करना होगा

केंद्र सरकार की भूमिका भी अहम

विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार जैसे राज्य के लिए केंद्र सरकार का सहयोग बेहद जरूरी है। इंडस्ट्री से जुड़े लोग लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि बिहार को विशेष आर्थिक पैकेज मिले।

अगर केंद्र से हर साल ₹1 लाख करोड़ का कर्जमुक्त लोन मिलता है, तो राज्य में शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को गति मिल सकती है।


राजनीतिक बयान या ठोस रणनीति?

कुछ जानकार इस घोषणा को “रूटीन पॉलिटिकल स्टेटमेंट” भी मानते हैं। उनका कहना है कि हर नई सरकार जनता में विश्वास जगाने के लिए ऐसे बड़े लक्ष्य तय करती है, लेकिन असली परीक्षा उसे लागू करने में होती है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सरकार को सिर्फ लक्ष्य बताने के बजाय यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वह इन बाधाओं को कैसे दूर करेगी।


मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का ₹5 लाख करोड़ निवेश लाने का लक्ष्य निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी है और इससे राज्य में उम्मीद की नई किरण जगी है। लेकिन पिछले आंकड़े यह बताते हैं कि बिहार में निवेश को जमीन पर उतारना आसान नहीं है।

अगर सरकार ठोस नीतिगत सुधार, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेशकों के भरोसे को मजबूत करने में सफल होती है, तो यह लक्ष्य आंशिक रूप से ही सही, लेकिन हासिल किया जा सकता है। अन्यथा, यह घोषणा भी उन बड़े वादों की सूची में शामिल हो सकती है, जो कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट