स्टालिन को हाईकोर्ट से झटका, कोलाथुर सीट की याचिका खारिज, सीएम विजय को बड़ी राहत, जानें पूरा मामला

स्टालिन

कोलाथुर सीट मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने स्टालिन की याचिका खारिज की

निष्कर्ष भारत संवाददाता चेन्नई। स्टालिन को हाईकोर्ट से झटका लगा है। मद्रास हाईकोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अध्यक्ष और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की कोलाथुर विधानसभा सीट से जुड़ी रिट याचिका खारिज कर दी है। स्टालिन ने चुनाव में वीवीपैट की सभी पर्चियों की पुनर्गणना कराने और तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के विधायक वीएस बाबू के निर्वाचन को रद्द कर खुद को विजयी घोषित करने की मांग की थी। अदालत के इस फैसले से निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर दायर उनकी याचिका को बड़ा झटका लगा है।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश एसए धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की पीठ ने की। पीठ ने माना कि स्टालिन की ओर से दायर रिट याचिका इस मामले में विचार योग्य नहीं है। इससे पहले सोमवार को सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

स्टालिन ने किस आधार पर दी थी चुनौती?

कोलाथुर विधानसभा सीट के चुनाव परिणाम को लेकर स्टालिन की ओर से अदालत का रुख किया गया था। उनका कहना था कि चुनाव प्रक्रिया में ईवीएम और वीवीपैट से संबंधित कुछ गंभीर सवाल सामने आए हैं, जिनकी विस्तृत जांच जरूरी है।

स्टालिन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2024 के फैसले के दायरे में आता है। इस फैसले के तहत चुनाव में दूसरे या तीसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को निर्धारित प्रक्रिया के तहत 5 प्रतिशत ईवीएम की बर्न मेमरी या माइक्रोकंट्रोलर की जांच कराने का अधिकार दिया गया है।

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सिब्बल ने अदालत को बताया कि स्टालिन ने चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद तय समय सीमा के भीतर सत्यापन के लिए आवेदन किया था। उनके अनुसार, परिणाम घोषित होने के सात दिनों के भीतर आवेदन करने का प्रावधान है और स्टालिन ने कथित तौर पर तीन दिनों के भीतर, 7 मई को ही आवेदन कर दिया था।

ईवीएम सत्यापन में क्या सामने आया?

सुनवाई के दौरान स्टालिन की ओर से ईवीएम सत्यापन को लेकर भी कई सवाल उठाए गए। कपिल सिब्बल ने दावा किया कि निर्वाचन आयोग ने 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दायर करने की समय सीमा समाप्त होने के बाद 29 जुलाई से 5 अगस्त के बीच 14 ईवीएम का सत्यापन किया।

सिब्बल के मुताबिक, सत्यापन के दौरान कुछ तकनीकी विसंगतियां सामने आईं। इनमें एक पोलिंग स्टेशन संख्या 208 की बैलेट यूनिट से जुड़ी समस्या का भी उल्लेख किया गया। दलील दी गई कि संबंधित बैलेट यूनिट कंट्रोल यूनिट को डिटेक्ट नहीं कर सकी थी। इसके कारण मशीन में स्टालिन का नाम प्रदर्शित नहीं होने की बात कही गई।

इसके अलावा वीवीपैट और कंट्रोल यूनिट के बीच डेटा सिग्नल से संबंधित विसंगति का भी हवाला दिया गया। स्टालिन की ओर से इन तकनीकी बिंदुओं को गंभीर बताते हुए विस्तृत जांच और वीवीपैट पर्चियों की पुनर्गणना की मांग की गई थी।

स्टालिन की याचिका पर चुनाव आयोग की दलील

मामले में निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. राजागोपालन और दामा शेषाद्रि नायडू ने अदालत में रिट याचिका की स्वीकार्यता पर ही सवाल उठाया। आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 329(b) और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए कानून में अलग प्रक्रिया निर्धारित है।

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आयोग का तर्क था कि चुनाव परिणाम को केवल चुनाव याचिका के जरिए चुनौती दी जा सकती है। उसके मुताबिक, रिट याचिका के माध्यम से चुनाव परिणाम को रद्द करने की अनुमति दी गई तो इससे चुनावी और न्यायिक प्रक्रिया में अव्यवस्था पैदा हो सकती है।

यही मामला सुनवाई के दौरान मुख्य कानूनी मुद्दा बन गया। अदालत के सामने सवाल यह था कि चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए अपनाई गई रिट याचिका इस परिस्थिति में स्वीकार की जा सकती है या नहीं।

45 दिन की समय सीमा पर क्या कहा गया?

स्टालिन की ओर से कपिल सिब्बल ने अदालत के सामने एक महत्वपूर्ण तर्क रखा। उन्होंने कहा कि यदि निर्वाचन आयोग की ओर से सत्यापन प्रक्रिया में देरी हुई और इसी वजह से चुनाव याचिका दाखिल करने की 45 दिनों की वैधानिक समय सीमा समाप्त हो गई, तो याचिकाकर्ता को कानूनी उपाय से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।

सिब्बल का कहना था कि स्टालिन ने अपनी ओर से निर्धारित समय के भीतर सत्यापन का आवेदन दे दिया था। ऐसे में यदि प्रक्रिया पूरी होने में देरी आयोग की तरफ से हुई, तो ऐसी स्थिति में रिट याचिका को वैकल्पिक कानूनी रास्ते के रूप में देखा जाना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग की ओर से रखे गए संवैधानिक और कानूनी तर्कों को स्वीकार किया। अदालत ने माना कि इस तरह की चुनावी चुनौती के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इसी आधार पर स्टालिन की रिट याचिका को खारिज कर दिया गया।

कोलाथुर सीट पर क्या रहा था चुनाव परिणाम?

कोलाथुर विधानसभा सीट के चुनाव परिणाम में TVK उम्मीदवार वीएस बाबू को 82,997 वोट मिले थे। वहीं एमके स्टालिन को 74,202 वोट हासिल हुए। इस तरह दोनों उम्मीदवारों के बीच 8,795 वोटों का अंतर रहा।

चुनाव परिणाम में स्टालिन दूसरे स्थान पर रहे। इसके बाद ईवीएम और वीवीपैट सत्यापन से जुड़े मुद्दों को लेकर उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाया था। अब मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी ओर से दायर रिट याचिका पर राहत नहीं मिल सकी।

अदालत के फैसले का क्या मतलब है?

मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला मुख्य रूप से चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए अपनाई गई कानूनी प्रक्रिया से जुड़ा है। अदालत ने रिट याचिका को विचार योग्य नहीं माना और चुनाव कानून में निर्धारित प्रक्रिया की ओर संकेत किया।

इस फैसले के बाद कोलाथुर सीट के चुनाव परिणाम को लेकर स्टालिन की इस रिट याचिका पर फिलहाल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। वहीं, चुनाव आयोग की ओर से चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पर दिया गया तर्क अदालत में स्वीकार किया गया।

मामले में ईवीएम सत्यापन के दौरान उठाए गए तकनीकी सवालों और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित स्टालिन की दलीलों पर भी सुनवाई हुई, लेकिन इन दलीलों के बावजूद अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार नहीं किया। इस तरह कोलाथुर सीट को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में फिलहाल स्टालिन को हाईकोर्ट से झटका लगा है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट