बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों में नए कर का विरोध: राजद ने सरकार पर साधा निशाना, सुधाकर सिंह बोले- गरीबों पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ
बिहार सरकार की बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली 2026 को लेकर राजद ने विरोध जताया है। किसान प्रकोष्ठ अध्यक्ष सुधाकर सिंह ने कहा कि नए कर से गरीबों, छोटे कारोबारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
बिहार सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में कर व्यवस्था को नया स्वरूप देने के लिए बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को मंजूरी दिए जाने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे ग्रामीण जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने वाला कदम बताया है।
शनिवार को आयोजित एक प्रेस वार्ता में राजद किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष एवं पूर्व कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने सरकार के इस निर्णय की आलोचना करते हुए कहा कि बिहार जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य में ग्रामीणों पर नए कर और शुल्क लागू करना उचित नहीं है। उनके साथ प्रेस वार्ता में देश के जाने-माने अर्थशास्त्री, भारत सरकार के पूर्व योजना आयोग के पूर्व सचिव तथा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट (NILERD) के पूर्व महानिदेशक डॉ. संतोष मेहरोत्रा भी मौजूद रहे।
क्या है बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026?
राज्य सरकार ने 15 जुलाई को हुई कैबिनेट बैठक में बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के तहत बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को मंजूरी दी है। इस नियमावली का उद्देश्य पंचायतों को स्थानीय स्तर पर राजस्व जुटाने के लिए कर, शुल्क और उपयोग शुल्क लगाने की व्यवस्था उपलब्ध कराना है, जिससे पंचायतें अपनी वित्तीय स्थिति मजबूत कर सकें और स्थानीय विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटा सकें।
हालांकि, इसी फैसले को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर है।
‘गांवों को आर्थिक रूप से कमजोर करेगा फैसला’
सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया कि सरकार का यह निर्णय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करेगा। उन्होंने कहा कि बिहार में पहले से ही बेरोजगारी, महंगाई और कम आय जैसी समस्याएं गंभीर हैं। ऐसे समय में ग्रामीण जनता पर नए कर थोपना गरीब और मेहनतकश वर्ग के साथ अन्याय होगा।
उन्होंने कहा कि यदि पंचायतों के राजस्व बढ़ाने का सबसे आसान तरीका ग्रामीणों से टैक्स और शुल्क वसूलना बना दिया जाएगा, तो इसका सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ेगा, जिनकी आय पहले से ही सीमित है।
छोटे कारोबारियों और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ेगा असर
राजद नेता ने कहा कि इस नियमावली का सबसे पहले असर उन लोगों पर पड़ेगा, जो ठेला, खोमचा, रेहड़ी, रिक्शा, टमटम, बैलगाड़ी, हाथगाड़ी या अन्य छोटे परिवहन साधनों के जरिए अपनी आजीविका चलाते हैं।
उन्होंने कहा कि इन लोगों की आय निश्चित नहीं होती। कई बार पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और इलाज का खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यदि हाउस टैक्स, नल-जल टैक्स, पंजीकरण शुल्क, उपयोग शुल्क या अन्य स्थानीय कर लगाए जाएंगे तो उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर होगी।
सुधाकर सिंह ने सवाल उठाया कि एक ठेला चालक, सब्जी विक्रेता, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, नाई, धोबी, मोची या दिहाड़ी मजदूर अतिरिक्त कर का भुगतान किस आय से करेगा।
पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा प्रभाव
प्रेस वार्ता में सुधाकर सिंह ने दावा किया कि पंचायतों द्वारा लगाए जाने वाले करों का असर केवल करदाता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।
उनके अनुसार, छोटे व्यापारियों की लागत बढ़ेगी, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। इससे ग्रामीण बाजारों की क्रय शक्ति कमजोर होगी, स्थानीय व्यापार प्रभावित होगा और रोजगार के अवसर भी घट सकते हैं।
उन्होंने कहा कि बिहार पहले से ही प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीण आय जैसे कई प्रमुख मानकों पर देश के अग्रणी राज्यों से पीछे है। ऐसे में अतिरिक्त कर आर्थिक गतिविधियों को और प्रभावित कर सकते हैं।
पंचायतों को अधिकार, लेकिन जिम्मेदारी भी सरकार की
सुधाकर सिंह ने कहा कि पंचायत राज अधिनियम की धारा 27 पंचायतों को कर लगाने का अधिकार देती है, लेकिन यह अधिकार राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों और निर्धारित अधिकतम दरों के अधीन है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि पंचायतों को दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल गरीबों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के लिए न होने दिया जाए।
भ्रष्टाचार बढ़ने की जताई आशंका
राजद नेता ने आरोप लगाया कि सरकारी कार्यालयों में पहले से ही भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की शिकायतें आम हैं। ऐसे में यदि पंचायतों को विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क वसूलने का व्यापक अधिकार दिया जाएगा तो भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भूमि की लगान रसीद कटवाने, दाखिल-खारिज की प्रक्रिया या एफआईआर दर्ज कराने जैसी कई सेवाएं सरकारी नियमों के अनुसार कम शुल्क या निशुल्क हैं, लेकिन कई जगह लोगों से अधिक राशि वसूले जाने की शिकायतें आती रहती हैं।
उनका कहना था कि यदि पंचायत स्तर पर भी इसी प्रकार की व्यवस्था लागू हुई तो आम लोगों को और अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
गरीबों के सरकारी लाभ प्रभावित होने की आशंका
सुधाकर सिंह ने यह भी आशंका जताई कि यदि कोई गरीब परिवार आर्थिक तंगी के कारण पंचायत द्वारा लगाए गए कर या शुल्क का समय पर भुगतान नहीं कर पाएगा तो स्थानीय स्तर पर राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन या सरकारी योजनाओं के लाभ को लेकर मनमानी की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से ऐसी किसी व्यवस्था की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। यह विपक्ष द्वारा व्यक्त की गई आशंका है।
उद्योगपतियों की ऋण माफी का भी उठाया मुद्दा
प्रेस वार्ता के दौरान सुधाकर सिंह ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि एक ओर बड़े उद्योगपतियों के लाखों करोड़ रुपये के बैंक ऋण माफ किए जाते हैं, जबकि दूसरी ओर गरीब ग्रामीणों पर नए कर लगाए जा रहे हैं।
उन्होंने केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह के वर्ष 2023 के उस बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास के लिए ग्रामीण निकायों के अपने राजस्व स्रोत विकसित करना आवश्यक है।
सरकार का पक्ष भी अहम
गौरतलब है कि सरकार का उद्देश्य पंचायतों को वित्तीय रूप से अधिक सक्षम बनाना और स्थानीय विकास कार्यों के लिए संसाधन उपलब्ध कराना बताया जा रहा है। पंचायतों की आय बढ़ने से सड़क, जलापूर्ति, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास में मदद मिलने की दलील दी जाती रही है।
हालांकि, विपक्ष का कहना है कि पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए राज्य सरकार को अपने संसाधनों से अधिक वित्तीय सहायता देनी चाहिए, न कि ग्रामीण जनता पर अतिरिक्त करों का बोझ डालना चाहिए।
बिहार ग्राम पंचायत (कर, दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां सरकार इसे पंचायतों की वित्तीय आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रही है, वहीं राजद इसे गरीब विरोधी निर्णय बताते हुए वापस लेने की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस और तेज होने की संभावना है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
