पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 10.13 लाख की स्टांप ड्यूटी रद्द, जानें पुरा मामला
पटना हाईकोर्ट से जमीन खरीदार को राहत, लाखों की मांग हुई रद्द
निष्कर्ष भारत संवाददाता पटना। पटना हाईकोर्ट ने जमीन के निबंधन से जुड़े एक अहम मामले में निबंधन अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए बाद में लगाई गई 10.13 लाख रुपये की अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और 1.01 लाख रुपये की पेनाल्टी की मांग रद्द कर दी है। अदालत ने संबंधित बिक्री विलेख का अंतिम निबंधन चार सप्ताह के भीतर पूरा कर याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया है। मामला मधुबनी निवासी शशि भूषण सिंह से जुड़ा है।
जमीन के निबंधन से शुरू हुआ पूरा मामला
मामला 14 कट्ठा जमीन के बिक्री विलेख के निबंधन से संबंधित है। शशि भूषण सिंह ने टाइटल सूट संख्या 31/2003 में मिली विशिष्ट निष्पादन की डिक्री के आधार पर जमीन का बिक्री विलेख तैयार कराया था। निचली अदालत के निर्देश के बाद जिला अवर निबंधक, मुजफ्फरपुर ने जमीन की स्टांप ड्यूटी और निबंधन शुल्क निर्धारित किया।
याचिकाकर्ता ने अधिकारियों द्वारा तय पूरी राशि जमा कर दी। इसके बाद 12 दिसंबर 2014 को बिक्री विलेख निबंधन के लिए स्वीकार कर लिया गया। इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें टोकन और रसीद भी जारी की गई।
साढ़े चार महीने बाद फिर उठा जमीन का मामला
मामला तब नया मोड़ ले लिया, जब निबंधन की प्रक्रिया पूरी होने के करीब साढ़े चार महीने बाद एक अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट के आधार पर जमीन की प्रकृति पर सवाल उठाया गया। रिपोर्ट में जमीन को व्यावसायिक प्रकृति का बताया गया।
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इसके बाद निबंधन विभाग के अधिकारियों ने पहले से जमा की गई राशि के बावजूद जमीन का दोबारा मूल्यांकन किया। इसी आधार पर सहायक महानिरीक्षक, निबंधन ने 14 जुलाई 2015 को 10,13,400 रुपये की अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और 1,01,340 रुपये की पेनाल्टी लगाने का आदेश जारी किया।
हाईकोर्ट ने अधिकारियों की प्रक्रिया पर उठाए सवाल
मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने पूरी प्रक्रिया की जांच की। न्यायमूर्ति राज कुमार ने पाया कि निबंधन के समय ही जिला अवर निबंधक को जमीन की वास्तविक प्रकृति और उसके बाजार मूल्य की जांच करनी चाहिए थी।
अदालत के अनुसार, इसके लिए संबंधित अंचलाधिकारी से रिपोर्ट ली जा सकती थी और एमवीआर के आधार पर जमीन का उचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए था। लेकिन अधिकारियों ने निबंधन के समय ऐसा नहीं किया और बाद में एक अपर डिविजनल क्लर्क की रिपोर्ट को आधार बनाकर अतिरिक्त राशि की मांग कर दी।
हाईकोर्ट ने कानून के पालन को बताया जरूरी
पटना हाईकोर्ट ने मामले में बिहार स्टांप कानून की धारा 47ए(2) के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने कहा कि संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के लिए एक महीने का समय देना और उसके बाद विधिवत जांच करना जरूरी था।
लेकिन इस मामले में अदालत के अनुसार, याचिकाकर्ता को पर्याप्त अवसर दिए बिना उसी दिन अंतिम आदेश पारित कर दिया गया। हाईकोर्ट ने इसे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन माना।
10.13 लाख की स्टांप ड्यूटी और पेनाल्टी रद्द
अदालत ने अधिकारियों की ओर से जारी 14 जुलाई 2015 के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही 7 फरवरी 2015 की रिपोर्ट को भी निरस्त कर दिया गया। हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर बिक्री विलेख का अंतिम निबंधन करने और उसे याचिकाकर्ता को सौंपने का निर्देश दिया।

जमीन खरीदार के लिए क्यों अहम है फैसला?
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निबंधन की प्रक्रिया के दौरान जमीन की प्रकृति और मूल्यांकन को लेकर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होती है। यदि निबंधन के समय आवश्यक जांच पूरी नहीं की गई और बाद में किसी रिपोर्ट के आधार पर अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, तो संबंधित व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना जरूरी है। इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी प्रक्रिया को आधार बनाकर अधिकारियों के बाद में लगाए गए अतिरिक्त वित्तीय बोझ को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट के फैसले से क्या स्पष्ट हुआ?
फैसले से यह संदेश सामने आता है कि जमीन के निबंधन से जुड़े मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। जमीन की प्रकृति, बाजार मूल्य और स्टांप ड्यूटी का निर्धारण समय पर और उचित तरीके से किया जाना चाहिए।

साथ ही, यदि बाद में किसी आधार पर अतिरिक्त शुल्क या पेनाल्टी लगाने की प्रक्रिया शुरू होती है, तो संबंधित पक्ष को कानून के मुताबिक अपना पक्ष रखने का अवसर देना भी जरूरी है।
शशि भूषण सिंह के मामले में पटना हाईकोर्ट ने अधिकारियों की इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी और पेनाल्टी का आदेश रद्द कर दिया। अब संबंधित विभाग को अदालत के निर्देश के अनुसार चार सप्ताह के भीतर बिक्री विलेख का अंतिम निबंधन पूरा करना होगा।
राज कुमार की रिपोर्ट
