जिउतिया व्रत आज, संतान की लंबी उम्र के लिए रखेंगी निर्जला उपवास, जानें शुभ समय और नियम

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जिउतिया व्रत आज, जानें शुभ समय, पूजा विधि और पारण का नियम

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। जिउतिया व्रत आज रखा जाएगा। संतान की कुशलता, लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास करेंगी। आर्द्रा नक्षत्र और वरीयान योग के संयोग में पड़ रहे इस व्रत को सनातन धर्म में महत्वपूर्ण माना गया है। व्रती महिलाएं भगवान जीमूतवाहन की पूजा कर संतान की मंगलकामना करेंगी।

जिउतिया व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को रखा जाता है। इस दिन व्रती महिलाएं बिना अन्न और जल ग्रहण किए उपवास करती हैं। शाम के समय पूजा और कथा सुनने के बाद अगले दिन अष्टमी तिथि समाप्त होने पर पारण किया जाता है। इस बार भी बड़ी संख्या में महिलाओं ने व्रत की तैयारी पूरी कर ली है।

जिउतिया व्रत का शुभ समय

पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि शनिवार सुबह 10 बजकर 03 मिनट से शुरू होकर रविवार 4 अक्टूबर की सुबह 7 बजकर 38 मिनट तक रहेगी। अष्टमी तिथि के प्रदोष काल और चंद्रोदयव्यापिनी होने के कारण इस दिन जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।

व्रती महिलाएं दिनभर निर्जला उपवास रखकर शाम को विधि-विधान से पूजा करेंगी। इसके बाद भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनी जाएगी। अगले दिन अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद व्रत का पारण किया जाएगा। पारण में केराउ और गाय के दूध का प्रयोग करने की परंपरा बताई गई है।

जिउतिया में जीमूतवाहन की पूजा क्यों

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिउतिया व्रत भगवान जीमूतवाहन के त्याग और करुणा से जुड़ा है। कथा के मुताबिक राजा जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का निर्णय लिया था। उनके त्याग और परोपकार की स्मृति में यह व्रत किए जाने की मान्यता है।

भविष्य पुराण, स्मृति ग्रंथ, निर्णय सिंधु और विष्णु धर्मोत्तर आदि ग्रंथों में प्रदोषव्यापिनी अष्टमी पर जीमूतवाहन की पूजा का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से अष्टमी तिथि के समय को इस व्रत में विशेष महत्व दिया जाता है।

संतान की लंबी उम्र के लिए निर्जला उपवास

जिउतिया व्रत करने वाली महिलाएं संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य, सुख और वंश वृद्धि की कामना करती हैं। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। कई क्षेत्रों में इसे जीउतिया या जिउतिया नाम से जाना जाता है।

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मान्यता है कि व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने और कथा सुनने से परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। धार्मिक परंपराओं में इस व्रत को त्याग, धर्म और करुणा का प्रतीक भी माना गया है।

जिउतिया पूजा में यह विधि अपनाएंगी महिलाएं

व्रती महिलाएं पूजा के दौरान कुश से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाकर उनकी पूजा करेंगी। इसके साथ माता लक्ष्मी और देवी दुर्गा की भी पूजा की जाएगी। पूजा के बाद ब्राह्मण या योग्य पंडित से जीमूतवाहन की कथा सुनने की परंपरा है।

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कथा श्रवण के बाद पंडित को दक्षिणा देने का विधान बताया गया है। पूजा में स्थानीय परंपरा के अनुसार फल, प्रसाद और अन्य पूजन सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। व्रत का पारण अगले दिन अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद किया जाएगा।

सरगही-ओठगन से शुरू हुआ व्रत

जिउतिया व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि की रात सरगही-ओठगन से होती है। व्रत रखने वाली महिलाओं ने सूर्योदय से पहले सरगही ग्रहण कर व्रत का संकल्प लिया। इसमें चाय, शरबत, मिष्ठान्न, ठेकुआ, पिरकिया, दही-चूड़ा समेत पारंपरिक खाद्य पदार्थ ग्रहण करने की परंपरा है।

सरगही के बाद महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास करती हैं। इसके बाद अष्टमी तिथि में पूजा-पाठ और कथा श्रवण किया जाता है। अगले दिन पारण के बाद ही व्रत पूरा माना जाता है।

शिव ने पार्वती को सुनाई थी जीमूतवाहन कथा

जिउतिया से जुड़ी धार्मिक कथा में भगवान शिव और माता पार्वती का भी उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने माता पार्वती को जीमूतवाहन की कथा सुनाई थी। इसी कथा में एक चूल्होरिन और सियारिन के जिउतिया व्रत करने का प्रसंग आता है।

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कथा के अनुसार दोनों ने जीमूतवाहन का व्रत रखा था, लेकिन सियारिन भूख सहन नहीं कर सकी और उसने मांस का सेवन कर लिया। इसके बाद दोनों ने अगले जन्म में एक ब्राह्मण परिवार में बहनों के रूप में जन्म लिया।

जिउतिया कथा में सात पुत्रों का प्रसंग

पौराणिक कथा के अनुसार चूल्होरिन का अगला जन्म शीलावती और सियारिन का कर्पूरावती के रूप में हुआ। शीलावती का विवाह नगर के मंत्री से और कर्पूरावती का विवाह राजा मलयकेतु से हुआ। दोनों बहनों के सात-सात पुत्र हुए।

कथा में बताया गया है कि शीलावती के सातों पुत्र जीवित रहे, जबकि कर्पूरावती के सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। इसके बाद कर्पूरावती को अपने पिछले जन्म की घटना और व्रत के नियमों की अनदेखी का बोध हुआ।

आत्मग्लानि में कर्पूरावती ने अपने प्राण त्याग दिए। धार्मिक कथा में इस प्रसंग के माध्यम से व्रत में संयम, श्रद्धा और नियमों के पालन का संदेश दिया गया है।

व्रत के पीछे त्याग और संतान की मंगलकामना

जिउतिया सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि माताओं की संतान के प्रति चिंता और मंगलकामना से जुड़ी परंपरा भी है। निर्जला उपवास के दौरान महिलाएं पूरे दिन जल और भोजन का त्याग करती हैं। शाम को पूजा और कथा के बाद अगले दिन पारण करके व्रत पूरा किया जाता है।

व्रत को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि और पारण की परंपरा में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है। इसलिए महिलाएं स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार पूजा का समय और पारण का मुहूर्त तय करती हैं। इस बार भी जिउतिया को लेकर घरों में विशेष तैयारियां की गई हैं और महिलाएं संतान की लंबी उम्र तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के साथ यह महाव्रत रखेंगी।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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