अनंत चतुर्दशी पर रवियोग का संयोग, जानें पूजा विधि, महत्व और पौराणिक कथा

अनंत चतुर्दशी

अनंत चतुर्दशी

निष्कर्ष भारत संवाददाता: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, अनंत भगवान की पौराणिक कथा सुनते हैं और चौदह गांठों वाला अनंत सूत्र धारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अनंत चतुर्दशी का व्रत सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और संकटों से मुक्ति की कामना के लिए किया जाता है।

इस बार अनंत चतुर्दशी के अवसर पर रवियोग का संयोग बनने की बात कही गई है। पंचांग के अनुसार, दोपहर 12:10 बजे तक पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र रहेगा। इसके बाद पूरे दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु की पूजा कर अनंत सूत्र बांधेंगे और परिवार के कल्याण की कामना करेंगे।

रवियोग में होगी भगवान अनंत की पूजा

अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा करने, कथा सुनने और अनंत सूत्र धारण करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

पूजा के दौरान भगवान विष्णु को फल, फूल, नैवेद्य और मधुर पकवान अर्पित किए जाते हैं। श्रद्धालु भगवान अनंत का ध्यान करते हुए परिवार की सुख-शांति, धन-धान्य और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। रवियोग के संयोग को भी धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है।

हालांकि, पूजा का समय और शुभ मुहूर्त स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग या स्थानीय पुरोहित से समय की पुष्टि कर लेनी चाहिए।

अनंत चतुर्दशी का धार्मिक महत्व

अनंत चतुर्दशी भगवान विष्णु को समर्पित प्रमुख व्रतों में से एक मानी जाती है। ‘अनंत’ शब्द का अर्थ है जिसका न आदि है और न अंत। धार्मिक मान्यताओं में भगवान विष्णु को अनंत और सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है।

पौराणिक परंपराओं के अनुसार, भगवान अनंत ने सृष्टि के आरंभ में चौदह लोकों की रचना की थी। इनमें तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, मह, जन, तप और सत्य लोक का उल्लेख मिलता है।

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मान्यता है कि इन लोकों के पालन और संरक्षण के लिए भगवान अनंत विभिन्न रूपों में प्रकट हुए। इसी कारण अनंत चतुर्दशी के व्रत को भगवान विष्णु की आराधना और अनंत फल की प्राप्ति से जोड़कर देखा जाता है।

चौदह गांठों वाले अनंत सूत्र का महत्व

अनंत चतुर्दशी की पूजा में चौदह गांठों वाले अनंत सूत्र का विशेष महत्व होता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, सूत्र की प्रत्येक गांठ भगवान विष्णु के अलग-अलग नाम और स्वरूप से जुड़ी होती है।

पूजा के दौरान अनंत, पुरुषोत्तम, ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव, बैकुंठ, श्रीधर, त्रिविक्रम, मधुसूदन, वामन, केशव, नारायण, दामोदर और गोविंद नामों से भगवान की आराधना की जाती है।

परंपरा के अनुसार, पुरुष अनंत सूत्र को दाहिने हाथ की बांह पर और महिलाएं बाएं हाथ की बांह पर बांधती हैं। श्रद्धालु इसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद और सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं। यह भी मान्यता है कि अनंत सूत्र धारण करने से जीवन में आने वाली परेशानियों से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

अनंत चतुर्दशी की पूजा में क्या करें?

अनंत चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है।

पूजा में पीले फूल, फल, दीप, धूप, नैवेद्य और अनंत सूत्र का उपयोग किया जाता है। श्रद्धालु भगवान विष्णु को भोग अर्पित करने के बाद अनंत चतुर्दशी की कथा सुनते हैं।

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कई श्रद्धालु इस दिन श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ भी करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, विष्णु सहस्रनाम का पाठ भगवान विष्णु की भक्ति और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण माध्यम है। पूजा के बाद परिवार के सदस्यों को प्रसाद वितरित किया जाता है।

अनंत चतुर्दशी की पौराणिक कथा

अनंत चतुर्दशी से जुड़ी एक प्रमुख कथा महाभारत काल से संबंधित मानी जाती है। कथा के अनुसार, कौरवों ने छलपूर्वक जुए में पांडवों को हरा दिया था। इसके बाद पांडवों को अपना राजपाट छोड़कर वनवास जाना पड़ा। वनवास के दौरान पांडवों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने वन पहुंचे। युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने कष्टों से मुक्ति और दोबारा राजपाट प्राप्त करने का उपाय पूछा। इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत भगवान का व्रत करने और पूजा-अर्चना करने की सलाह दी।

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि अनंत भगवान कौन हैं। तब श्रीकृष्ण ने बताया कि अनंत भगवान भगवान विष्णु का ही स्वरूप हैं। उनका न कोई आदि है और न कोई अंत, इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों को अनंत चतुर्दशी का व्रत रखने और विधिपूर्वक पूजा करने का महत्व समझाया। इसके बाद युधिष्ठिर ने परिवार सहित अनंत भगवान की पूजा की। धार्मिक कथा के अनुसार, व्रत के प्रभाव से पांडवों को दोबारा अपना राजपाट प्राप्त हुआ।

अनंत चतुर्दशी पर विष्णु सहस्रनाम का पाठ

अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के नामों का जाप करने से मन को शांति मिलती है और भक्त का ध्यान आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ता है।

कई श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं और शाम के समय परिवार के साथ पूजा करते हैं। कुछ लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, सुख-समृद्धि, संतान और परिवार के कल्याण के लिए अनंत भगवान की आराधना करते हैं।

चौदह वर्षों तक व्रत रखने की मान्यता

धार्मिक मान्यताओं में अनंत चतुर्दशी के व्रत को चौदह वर्षों तक करने का भी उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि श्रद्धालु यदि श्रद्धा और नियम के साथ इस व्रत का पालन करते हैं तो उन्हें भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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हालांकि, व्रत की अवधि और नियम अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं। श्रद्धालुओं को अपनी पारिवारिक परंपरा, धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए।

अनंत चतुर्दशी पर भक्ति और आस्था का पर्व

अनंत चतुर्दशी केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा, परिवार की सुख-शांति और धार्मिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु अनंत भगवान की पूजा कर जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।

रवियोग के संयोग और अनंत भगवान की आराधना के साथ श्रद्धालु इस पर्व को श्रद्धा और उत्साह से मनाएंगे। पूजा, कथा श्रवण और अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा के बीच अनंत चतुर्दशी का पर्व धार्मिक आस्था और पारिवारिक मंगलकामनाओं का संदेश देता है।

Nishkarsh Bharat

भूमि आर्या की रिपोर्ट