नैनोकार्बन यौगिकों में कैंसर-रोधी क्षमता के संकेत, बिहार के डॉ. सुजीत कुमार ठाकुर के शोध से जगी नई उम्मीद
नैनोकार्बन से कैंसर का इलाज? डॉ. सुजीत ठाकुर के शोध ने जगाई नई उम्मीद
- क्या नैनोकार्बन बन सकता है कैंसर के इलाज की नई उम्मीद? प्रीक्लिनिकल रिसर्च में मिले आशाजनक संकेत, लेकिन इंसानों तक पहुंचने से पहले अभी कई बड़ी परीक्षाएं बाकी
निष्कर्ष भारत, ( नई दिल्ली)। कैंसर के इलाज की दुनिया में हर नई खोज अपने साथ उम्मीद लेकर आती है, लेकिन विज्ञान यह भी सिखाता है कि प्रयोगशाला में मिली सफलता और मरीज के इलाज के बीच एक लंबी दूरी होती है। इसी दूरी को तय करने की दिशा में भारत में विकसित कुछ जल में घुलनशील नैनोकार्बन यौगिकों से जुड़े नए प्रीक्लिनिकल निष्कर्षों ने वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है।
चेन्नई स्थित Balman Eswaran Bio Medicine and Materials Science (BEMMS) तथा IIT दिल्ली के FITT से जुड़े वैज्ञानिकों के कार्य में विकसित नैनोकार्बन फॉर्मूलेशन ने इम्यूनो-कॉम्प्रोमाइज्ड चूहों में मानव स्तन कैंसर के मॉडल पर ट्यूमर वृद्धि को कम करने और ट्यूमर ऊतक में व्यापक नेक्रोसिस पैदा करने के संकेत दिए हैं। अध्ययन में फुलरीन-आधारित Fullarazirman तथा SWCNT-Mn(II) आधारित फॉर्मूलेशन विशेष रूप से चर्चा में रहे। BEMMS को IIT दिल्ली के FITT के वर्तमान स्टार्टअप विवरण में कैंसर उपचार के लिए एंटी-कैंसर नैनोकार्बन सामग्री विकसित करने वाली कंपनी के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है।
लेकिन इस खबर की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे “कैंसर की नई दवा मिल गई” कहना अभी वैज्ञानिक रूप से जल्दबाजी होगी। उपलब्ध परिणाम अभी प्रीक्लिनिकल स्तर के हैं। मानव मरीजों पर इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित करने के लिए क्लिनिकल ट्रायल आवश्यक होंगे।
नैनोकार्बन आखिर है क्या?
नैनोकार्बन ऐसे कार्बन-आधारित पदार्थ हैं जिनकी संरचना नैनोमीटर स्तर पर होती है। फुलरीन, कार्बन नैनोट्यूब और ग्राफीन परिवार की सामग्रियां इसी व्यापक श्रेणी में आती हैं। वैज्ञानिक लंबे समय से इनकी अनूठी रासायनिक और भौतिक विशेषताओं के कारण बायोमेडिसिन में संभावित उपयोग तलाश रहे हैं।
इस शोध की खासियत यह है कि शोधकर्ताओं ने ऐसे नैनोकार्बन पदार्थों को जल में घुलनशील रूप देने की दिशा में काम किया है। यही विशेषता संभावित जैव-चिकित्सीय उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि मूल नैनोकार्बन सामग्रियों की सीमित घुलनशीलता उनके जैविक उपयोग में बाधा बन सकती है।
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2020 में प्रकाशित एक शोधपत्र में Sujeet Kumar Thakur, Saibal Saha, Prasenjit Guchhait और Sambasivan Venkat Eswaran ने Fullarazirman नामक जल में घुलनशील Fullerene C60–Manganese(II) complex की तैयारी और उसके कैंसर-रोधी अध्ययन को प्रकाशित किया था। शोध Journal of Biomedical Nanotechnology में प्रकाशित हुआ था।
यानी मौजूदा प्रीक्लिनिकल अध्ययन अचानक सामने आई कोई एक-दिवसीय खोज नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रहे नैनोकार्बन अनुसंधान की अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए।
चूहों में क्या मिला?
हालिया प्रीक्लिनिकल अध्ययन में मानव स्तन कैंसर की MDA-MB-231 सेल लाइन से ट्यूमर मॉडल तैयार किया गया। यह सेल लाइन विशेष रूप से ट्रिपल-नेगेटिव ब्रेस्ट कैंसर (TNBC) के अध्ययन में महत्वपूर्ण है।
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TNBC में कैंसर कोशिकाओं में estrogen receptor, progesterone receptor और HER2 जैसे तीन प्रमुख बायोमार्कर नहीं पाए जाते। इसके कारण कुछ सामान्य targeted hormonal/HER2 therapies इस कैंसर में प्रभावी नहीं होतीं और उपचार की चुनौती अलग होती है।
अध्ययन में तीन नैनोकार्बन फॉर्मूलेशन का परीक्षण किया गया। इनमें Fullarazirman, single-walled carbon nanotube यानी SWCNT-Mn(II) और reduced graphene oxide यानी rGO आधारित फॉर्मूलेशन शामिल थे।
रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के अनुसार, untreated समूह में औसत ट्यूमर आयतन 35वें दिन लगभग 54.86 mm³ से बढ़कर 68वें दिन 486.53 mm³ हो गया।
इसके मुकाबले Fullarazirman समूह में ट्यूमर आयतन 54.54 mm³ से 212.98 mm³ तक बढ़ा, जबकि SWCNT समूह में यह 33.49 mm³ से 169.45 mm³ तक पहुंचा। यानी अध्ययन अवधि में दोनों फॉर्मूलेशन वाले समूहों में untreated समूह की तुलना में ट्यूमर वृद्धि कम दिखाई दी।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कैंसर अनुसंधान में किसी संभावित दवा के प्रभाव को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाता कि ट्यूमर खत्म हुआ या नहीं, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उसकी वृद्धि कितनी धीमी हुई, ट्यूमर ऊतक में क्या परिवर्तन आया और शरीर पर दवा का विषाक्त प्रभाव कितना रहा।
90 प्रतिशत तक ट्यूमर नेक्रोसिस का दावा कितना महत्वपूर्ण?
अध्ययन से जुड़ी रिपोर्ट में Fullarazirman से उपचारित अलग-अलग चूहों के ट्यूमर ऊतक में लगभग 40 से 90 प्रतिशत तक नेक्रोसिस दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
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नेक्रोसिस का अर्थ है ऊतक का मर जाना। कैंसर ट्यूमर के संदर्भ में इसका मतलब यह हो सकता है कि ट्यूमर के बड़े हिस्से में कोशिकीय मृत्यु हुई। SWCNT फॉर्मूलेशन में भी अध्ययन किए गए कुछ जानवरों में लगभग 40 प्रतिशत नेक्रोसिस की रिपोर्ट की गई।

लेकिन यहां वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है। 90 प्रतिशत नेक्रोसिस का अर्थ 90 प्रतिशत कैंसर मरीजों का इलाज या 90 प्रतिशत कैंसर ठीक होना नहीं है। यह पशु मॉडल में ट्यूमर ऊतक के एक पैथोलॉजिकल अवलोकन को दर्शाता है।
यही वह अंतर है जिसे समाचार रिपोर्टिंग में स्पष्ट करना जरूरी है।
क्या इसकी सुरक्षा भी सामने आई?
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार अध्ययन के दौरान उपचार से जुड़े कोई स्पष्ट clinical symptoms या मृत्यु नहीं देखी गई और जानवरों का वजन सामान्य रूप से काफी हद तक स्थिर रहा।
यह शुरुआती स्तर पर उत्साहजनक संकेत जरूर है, लेकिन इसे पूर्ण सुरक्षा प्रमाण नहीं माना जा सकता।
किसी संभावित कैंसर दवा के विकास में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि जानवर की मृत्यु हुई या वजन घटा या नहीं। आगे dose toxicity, organ toxicity, pharmacokinetics, metabolism, biodistribution, genotoxicity और long-term safety जैसे अनेक प्रश्नों का उत्तर जरूरी होता है।
अमेरिकी FDA की drug-development guidance भी बताती है कि preclinical testing का उद्देश्य मानव परीक्षण शुरू करने से पहले संभावित दवा की pharmacological activity और safety को समझना है; इसके बाद ही नियंत्रित human clinical trials की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
डॉ. सुजीत कुमार ठाकुर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
इस शोध यात्रा में डॉ. सुजीत कुमार ठाकुर का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। उपलब्ध वैज्ञानिक रिकॉर्ड में उनका नाम Fullarazirman पर 2020 के शोधपत्र के लेखक के रूप में दर्ज है। इसके अलावा BEMMS-FITT, IIT दिल्ली से उनका वैज्ञानिक जुड़ाव भी दर्ज है।
डॉ. ठाकुर बिहार के सीतामढ़ी जिले से संबंधित हैं और लगभग एक दशक से इन नैनोकार्बन अनुसंधान गतिविधियों में योगदान दे रहे हैं। शुरुआती कैंसर-विरोधी अध्ययनों में Regional Centre for Biotechnology (RCB), Faridabad की प्रयोगशाला से जुड़ा काम भी शामिल रहा।
इस शोध का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह केवल एक संस्थान का प्रयास नहीं है। इसमें वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं, BEMMS, IIT दिल्ली के FITT और ICMR के प्रीक्लिनिकल रिसर्च ढांचे जैसे विभिन्न संस्थागत पक्ष जुड़े हैं।
2023 का पेटेंट भी इस कहानी की महत्वपूर्ण कड़ी
इस तकनीक की यात्रा में पेटेंट भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। BIRAC के उपलब्ध दस्तावेज में water-soluble Fullerene C60 adducts के लिए भारतीय पेटेंट संख्या 419806, 31 जनवरी 2023 को प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। उसी दस्तावेज में इन सामग्रियों के संभावित कैंसर-रोधी उपयोग और नैनोमेडिसिन से संबंधित संभावनाओं का भी विवरण है।
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि पेटेंट मिलना किसी दवा के चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित या प्रभावी होने की मंजूरी नहीं होता। पेटेंट बौद्धिक संपदा और आविष्कार की सुरक्षा से जुड़ा है, जबकि दवा की regulatory approval के लिए अलग वैज्ञानिक और नैदानिक प्रमाण चाहिए।
इन-विट्रो से इन-विवो तक क्यों बढ़ी उम्मीद?
शोधकर्ताओं ने इससे पहले कई cancer cell lines पर laboratory यानी in-vitro स्तर पर परीक्षण किए थे। उपलब्ध शोध सामग्री में breast, colon, lung और अन्य cancer cell lines के विरुद्ध गतिविधि का उल्लेख मिलता है। BIRAC दस्तावेज भी कई cancer cell lines पर किए गए in-vitro कार्य तथा बाद में mouse in-vivo studies की दिशा में बढ़ने की जानकारी देता है।
यही वैज्ञानिक क्रम महत्वपूर्ण है—पहले कोशिकाओं पर परीक्षण, फिर पशु मॉडल और उसके बाद, यदि सुरक्षा और प्रभावशीलता पर्याप्त रूप से स्थापित होती है, तो मानव परीक्षण। हालिया अध्ययन इसी यात्रा में एक महत्वपूर्ण लेकिन अभी शुरुआती चरण को दर्शाता है।
अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
शोधकर्ताओं के सामने अब तीन बड़ी चुनौतियां हैं—पहली, पर्याप्त मात्रा में compound का उत्पादन; दूसरी, formulation को अंतिम रूप देना; और तीसरी, बड़े पशु मॉडल में विस्तृत toxicity studies।
शोध टीम के अनुसार इसके लिए अतिरिक्त फंडिंग की भी आवश्यकता है। मानव उपयोग पर विचार करने से पहले इन चरणों का पूरा होना जरूरी है।
ICMR ने भी NARFBR को 2026 में National Institute for Pre-Clinical Research (NIPCR) के रूप में पुनर्गठित किया है और इसे preclinical validation तथा translational research के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
इसलिए इस शोध का अगला चरण केवल “दवा कितनी प्रभावी है” तक सीमित नहीं होगा। वैज्ञानिकों को यह भी जानना होगा कि शरीर में यह कहां पहुंचती है, किस मात्रा में सुरक्षित है, कितने समय तक रहती है, किस तंत्र से कैंसर कोशिकाओं को प्रभावित करती है और क्या यह स्वस्थ कोशिकाओं तथा महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाती है।
क्या नैनोकार्बन वास्तव में कैंसर का इलाज बन सकता है?
संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। मौजूदा परिणाम यह संकेत देते हैं कि जल में घुलनशील नैनोकार्बन फॉर्मूलेशन कैंसर-विरोधी दवा विकास के लिए एक दिलचस्प research platform हो सकता है। विशेष रूप से TNBC जैसे कठिन कैंसर के मॉडल में ट्यूमर वृद्धि और ऊतक नेक्रोसिस से जुड़े परिणाम आगे के अध्ययन का आधार प्रदान करते हैं।
लेकिन प्रयोगशाला से अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता लंबा है। FDA के अनुसार भी preclinical animal research मानव उपचार की सुरक्षा का अंतिम प्रमाण नहीं है; clinical research में मनुष्यों पर अलग-अलग चरणों में सुरक्षा, dosage और efficacy की जांच की जाती है
इसलिए इस समय सबसे संतुलित निष्कर्ष यही होगा कि नैनोकार्बन कैंसर उपचार का वादा जरूर दिखा रहा है, लेकिन अभी इलाज नहीं बना है।
उम्मीद क्यों बड़ी है?
इस शोध की असली अहमियत शायद किसी एक आंकड़े में नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक यात्रा में है जिसमें भारत में विकसित नैनोमटेरियल को प्रयोगशाला से पशु मॉडल तक ले जाकर उसकी संभावित चिकित्सकीय उपयोगिता परखा जा रहा है।
यदि आगे के toxicity studies, mechanism studies और बड़े preclinical experiments सकारात्मक रहते हैं और फिर clinical trials में भी इसकी सुरक्षा तथा प्रभावशीलता सिद्ध होती है, तो नैनोकार्बन आधारित दवा कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक नई दिशा खोल सकती है।
राज कुमार की रिपोर्ट
