‘आसमान गिर जाए, न्याय होना चाहिए’, हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, जानें पूरा मामला
पटना हाईकोर्ट ने बैंक के पैनल वकील के खिलाफ केस किया रद्द
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। ‘आसमान गिर जाए, न्याय होना चाहिए’—पटना हाईकोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने कानूनी पेशे से जुड़े एक अहम सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है। अदालत ने यूको बैंक के पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। मामला बैंक में कथित ऋण धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों से जुड़ा था, जिसमें वकील को भी आरोपी बनाया गया था।
जस्टिस राणा विक्रम सिंह की पीठ ने कहा कि केवल कानूनी राय गलत साबित होने या किसी ऋण खाते के गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) बन जाने से वकील को धोखाधड़ी या साजिश में शामिल नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी वकील की ओर से जानबूझकर धोखाधड़ी में भागीदारी के ठोस संकेत हों, तो मामला अलग हो सकता है।
पटना हाईकोर्ट में क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2008 में पटना स्थित यूको बैंक की एग्जीबिशन रोड शाखा में दिए गए कैश-क्रेडिट ऋण से जुड़ा था। बैंक की शिकायत के अनुसार, कुछ कर्जदारों को संपत्ति के दस्तावेजों के आधार पर ऋण दिया गया था। बाद में संबंधित खातों के NPA होने और संपत्ति के कागजात पर सवाल उठने के बाद बैंक को करीब 29.54 लाख रुपये का नुकसान होने की बात सामने आई।
मामले में बैंक अधिकारियों, कर्जदारों और जमानतदारों के साथ पैनल वकील गोपाल कृष्ण अग्रवाल का नाम भी शामिल किया गया। आरोप था कि ऋण स्वीकृत करने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं हुईं और संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों में गड़बड़ी थी।
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हालांकि, किसी दस्तावेज के फर्जी पाए जाने या ऋण खाते के खराब होने से अपने-आप यह साबित नहीं होता कि उससे जुड़ी कानूनी राय देने वाला वकील भी अपराध में शामिल था। हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यही था कि क्या उपलब्ध सामग्री के आधार पर वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने के पर्याप्त आधार मौजूद थे।
2016 के आदेश को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती
पटना के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (ACJM) ने 21 जनवरी 2016 को मामले में संज्ञान लिया था। इसके बाद वकील ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी।
याचिका में यह सवाल उठाया गया कि क्या पेशेवर जिम्मेदारी निभाते हुए दी गई कानूनी राय के आधार पर किसी अधिवक्ता को धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोपों का सामना करना चाहिए, जबकि उसकी सक्रिय आपराधिक भूमिका के पर्याप्त संकेत न हों।
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और वकील की ओर से दी गई कानूनी राय का परीक्षण किया। अदालत के सामने यह भी रखा गया कि संबंधित वकील ने बैंक को दस्तावेजों का स्वतंत्र रूप से सत्यापन करने की सलाह दी थी। इस पहलू को मामले में महत्वपूर्ण माना गया।
कानूनी राय गलत होना अपराध का प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट
अदालत ने अपने फैसले में पेशेवर कानूनी राय और आपराधिक साजिश के बीच अंतर को रेखांकित किया। किसी वकील का काम कानून और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर अपने मुवक्किल या संबंधित संस्था को राय देना है। यह राय बाद में गलत साबित हो सकती है, लेकिन केवल इसी आधार पर आपराधिक मंशा का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए आरोपों के समर्थन में आवश्यक तत्व और ठोस सामग्री होनी चाहिए। केवल पेशेवर संबंध, किसी लेन-देन में भूमिका या बाद में सामने आई गड़बड़ी किसी व्यक्ति को अपराध का साझेदार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
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हालांकि, इसका मतलब यह भी नहीं है कि वकीलों को हर परिस्थिति में कानूनी कार्रवाई से छूट मिल जाती है। यदि किसी अधिवक्ता के जानबूझकर धोखाधड़ी में शामिल होने, फर्जी दस्तावेज तैयार कराने या दूसरों के साथ मिलकर अपराध करने के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो सकती है।
बैंक को खुद दस्तावेज जांचने की सलाह का जिक्र
मामले में वकील की ओर से दी गई लीगल रिपोर्ट भी चर्चा का अहम हिस्सा रही। रिपोर्ट में दस्तावेजों के आधार पर राय देने के साथ बैंक को अपने स्तर पर कागजात का सत्यापन करने की सलाह दिए जाने की बात सामने आई।
इससे यह सवाल उठा कि ऋण स्वीकृत करने और संपत्ति के दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच करने की जिम्मेदारी किसकी थी। बैंक की अपनी प्रक्रियाओं और अधिकारियों की भूमिका को अलग से देखना जरूरी था। केवल कानूनी राय को आधार बनाकर वकील के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोप बनाए रखने के लिए अदालत को पर्याप्त आधार नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि पेशेवर राय और जानबूझकर की गई आपराधिक भागीदारी को एक जैसा नहीं माना जा सकता। अदालत ने वकील के खिलाफ संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह राहत याचिकाकर्ता वकील को मिली, अन्य आरोपियों के मामले का फैसला इस आदेश से नहीं हुआ।
मजिस्ट्रेट के संज्ञान आदेश पर भी उठे सवाल
इस मामले में हाईकोर्ट की एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी निचली अदालत के संज्ञान आदेश को लेकर थी। रिपोर्टों के मुताबिक, जस्टिस राणा विक्रम सिंह ने आदेश के प्रारूप और उसे पारित करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। अदालत ने इस बात पर आपत्ति जताई कि किसी व्यक्ति को आपराधिक मुकदमे में बुलाने से पहले मजिस्ट्रेट को उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए।
संज्ञान लेने का आदेश केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। किसी व्यक्ति को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी होने से उसकी स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और समय पर असर पड़ सकता है। इसलिए न्यायिक अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों और आरोपों का अपने विवेक से परीक्षण करे।

यदि आदेश केवल तैयार प्रारूप पर हस्ताक्षर करने तक सीमित रह जाए और उसमें न्यायिक विचार का संकेत न मिले, तो यह न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल खड़े कर सकता है। इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी ने न्यायिक आदेशों में स्वतंत्र विचार और जवाबदेही के महत्व को सामने रखा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया गया सहारा
हाईकोर्ट ने कानूनी राय देने वाले अधिवक्ता की आपराधिक जिम्मेदारी पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा। इनमें CBI बनाम के. नारायण राव जैसे मामले शामिल हैं, जिनमें पेशेवर कानूनी राय और आपराधिक षड्यंत्र के बीच अंतर पर विचार किया गया है।
इन फैसलों से निकलने वाला मूल सिद्धांत यह है कि वकील को केवल इसलिए अपराध में शामिल नहीं माना जा सकता कि उसने किसी लेन-देन पर राय दी थी। आपराधिक आरोप के लिए संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों और वकील की कथित भूमिका के बीच संबंध दिखाना जरूरी है।
फैसले का क्या है व्यापक महत्व?
पटना हाईकोर्ट का यह फैसला कानूनी पेशे में जवाबदेही और स्वतंत्र सलाह के बीच संतुलन पर ध्यान खींचता है। यदि हर गलत साबित हुई राय पर वकील के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलने लगे, तो पेशेवर निर्णय लेने में अनावश्यक भय पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, जहां जानबूझकर धोखाधड़ी या साजिश के प्रमाण हों, वहां पेशेवर भूमिका किसी को कानून से ऊपर नहीं रखती।
इस मामले में अदालत ने गोपाल कृष्ण अग्रवाल के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। फैसले का संदेश यही है कि आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए आरोपों का कानूनी आधार और संबंधित व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। केवल नुकसान होने या किसी पेशेवर राय के गलत साबित होने से अपराध अपने-आप सिद्ध नहीं हो जाता।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
