CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग, अटॉर्नी जनरल से मांगी मंजूरी; चुनाव आयोग पर उठे सवाल
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अवमानना कार्रवाई की मांग
निष्कर्ष भारत संवाददाता: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की एक मीडिया रिपोर्ट सामने आने के बाद विवाद बढ़ गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है। वकील ब्रजेश सिंह का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और बहुसदस्यीय आयोग की व्यवस्था की कथित तौर पर अनदेखी की।
यह मांग अभी एक वकील की ओर से की गई पहल है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सुप्रीम कोर्ट ने CEC के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी है। आपराधिक अवमानना की प्रक्रिया में संबंधित कानूनी मंजूरियों और न्यायिक चरणों का पालन करना होता है।
अटॉर्नी जनरल को पत्र में क्या कहा गया?
वकील ब्रजेश सिंह ने 24 सितंबर को अटॉर्नी जनरल को भेजे पत्र में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 15(1)(b) और धारा 2(c) का उल्लेख किया है। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही से जुड़े 1975 के नियमों के नियम 3 का भी हवाला दिया।
सिंह का कहना है कि चुनाव आयोग के फैसलों और कामकाज में अन्य चुनाव आयुक्तों की कथित अनदेखी सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्णयों के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग को एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में काम करना चाहिए, जहां फैसले संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए जाएं।
टीएन शेषन मामले का दिया हवाला
वकील ने अपने पत्र में टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की बहुसदस्यीय संरचना और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर विचार किया था।
देखिये हमारी ख़बर यूट्यूब चैनल पर भी: पटना बिहटा में ‘नटवरलाल’ का कारनामा! फर्जी जॉइनिंग लेटर से रेलवे नौकरी का झांसा
वकील का तर्क है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को आयोग के अन्य सदस्यों से ऊपर एकतरफा अधिकार रखने वाले पद के रूप में काम नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को primus inter pares, यानी बराबर अधिकार रखने वाले सदस्यों में प्रथम, की भूमिका में देखा जाना चाहिए।
ब्रजेश सिंह ने आरोप लगाया है कि यदि आयोग के अन्य सदस्यों की जानकारी या मंजूरी के बिना पूर्ण आयोग के नाम से फैसले जारी किए गए, तो यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानूनी व्यवस्था की अवहेलना का विषय बन सकता है। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम कानूनी निष्कर्ष सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
अनूप बरनवाल फैसले का भी जिक्र
वकील ने 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले का भी हवाला दिया है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत व्यवस्था के महत्व पर चर्चा की थी।
सिंह का दावा है कि चुनाव आयोग को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग के अन्य आयुक्तों को निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलग रखना संवैधानिक व्यवस्था से जुड़े सवाल खड़े करता है।
खबरें हमारे फेसबुक पर भी, लगातार खबरों के लिए फेसबुक से जुड़े
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के उल्लंघन का आरोप लगाए जाने और अदालत द्वारा उस आरोप को साबित मान लेने में फर्क होता है। इस मामले में अभी अटॉर्नी जनरल की मंजूरी और आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
मीडिया रिपोर्ट में 14 बार आपत्ति का दावा
विवाद की शुरुआत 23 सितंबर को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों और आदेशों को लेकर आपत्ति दर्ज की थी।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने तथा चुनावी डेटाबेस तक पहुंच से संबंधित थीं। दोनों आयुक्तों ने कथित तौर पर कुछ फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए।
फॉर्म 6 और मतदाता सूची को लेकर विवाद
फॉर्म 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म में किए गए कुछ बदलावों को लेकर चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर और डेटाबेस की पहुंच को अधिक केंद्रीकृत किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की भूमिका और पहुंच प्रभावित हो सकती है।
ये दावे मीडिया रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों की कथित आपत्तियों पर आधारित हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि पिछले एक वर्ष में लिए गए फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों के आधार पर लिए गए थे।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?
टाइम्स ऑफ इंडिया की 24 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा कि दोनों आयुक्तों की ओर से उठाए गए सवाल और सुझाव मुख्य रूप से मसौदा स्तर की प्रक्रियाओं से जुड़े थे। आयोग ने यह भी कहा कि इन टिप्पणियों को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया और निर्णय लेने की व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
चुनाव आयोग ने एक बयान में दावा किया कि एसआईआर सहित पिछले एक वर्ष में लिए गए सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं। इस तरह आयोग ने उस रिपोर्ट के निष्कर्षों को खारिज किया, जिसमें CEC द्वारा एकतरफा तरीके से फैसले लेने का आरोप लगाया गया था।
आगे क्या हो सकता है?
अब वकील ब्रजेश सिंह की मांग पर अटॉर्नी जनरल की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अनुमति की आवश्यकता होती है।
इस विवाद ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, बहुसदस्यीय निर्णय प्रक्रिया और मतदाता सूची के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल, एक ओर वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की कथित अवहेलना का आरोप लगाया है, जबकि चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताया है। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई और संबंधित पक्षों के आधिकारिक जवाब से स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
भूमि आर्या की रिपोर्ट
