SC-ST सांसदों को बोलने का समय कम? मांझी ने ओम बिरला को लिखा पत्र, जानें क्या कहा

मांझी

Jitan Ram Manjhi ने Om Birla को लिखा पत्र

निष्कर्ष भारत संवाददाता- केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रमुख जीतन राम मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर संसद में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से आने वाले सांसदों को चर्चा के दौरान पर्याप्त समय दिए जाने का मुद्दा उठाया है। मांझी ने यह पत्र 16 सितंबर को लिखा था। इसमें उन्होंने 5 अगस्त को अपने आवास पर हुई NDA सांसदों की एक बैठक का हवाला दिया है।

मांझी के मुताबिक, बैठक में मध्य प्रदेश की खरगोन लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने SC/ST सांसदों को बोलने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिलने की बात उठाई थी। इसी मुद्दे को उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाया है।

NDA सांसदों की बैठक में उठा था मुद्दा

जीतन राम मांझी ने बताया कि मौजूदा लोकसभा कार्यकाल में सांसदों के समूह की बैठकें होती हैं। इन बैठकों में सांसद अपने क्षेत्र और संसद से जुड़े अलग-अलग मुद्दों को सामने रखते हैं।

मांझी के अनुसार, वह बैठक में उठाए गए मुद्दों को संबंधित मंत्रालय या सक्षम अधिकारी तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत SC/ST सांसदों के बोलने के समय से जुड़ी शिकायत भी सामने आने के बाद उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा।

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मांझी ने कहा कि यह मुद्दा उनकी व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, बल्कि NDA सांसदों की बैठक में उठाई गई बात के आधार पर उन्होंने इसे आगे बढ़ाया है।

गजेंद्र सिंह पटेल ने उठाई थी बात

मांझी के 16 सितंबर के पत्र में 5 अगस्त को उनके आवास पर हुई NDA सांसदों की बैठक का उल्लेख है। रिपोर्ट के मुताबिक, खरगोन से बीजेपी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने इस दौरान SC/ST समुदाय से आने वाले सांसदों को संसद में अपने मुद्दे रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाने की बात कही थी।

पटेल ने भी इस मुद्दे को उठाए जाने की पुष्टि की है। उनका कहना है कि अलग-अलग दलों को मिलने वाला बोलने का समय उनके सांसदों के बीच बांटा जाता है और SC/ST सांसदों के लिए समय बढ़ाने की जरूरत पर उन्होंने बात रखी थी।

मांझी ने ओम बिरला को क्यों लिखा पत्र?

जीतन राम मांझी ने बताया कि सांसद समूह की बैठकों में कई तरह की समस्याएं सामने आती हैं। उनके मुताबिक, समूह के नेता के तौर पर उनकी भूमिका यह है कि सांसदों द्वारा उठाए गए मुद्दों को संबंधित मंत्रालय या अधिकारी तक पहुंचाया जाए।

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उन्होंने कहा कि इसी वजह से उन्होंने SC/ST सांसदों के बोलने के समय से जुड़ी बात को लोकसभा अध्यक्ष के सामने रखा। मांझी के मुताबिक, इस पत्र को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

‘हम अपनी नहीं, सांसदों की बात बोल रहे हैं’

जब मांझी से पूछा गया कि क्या उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी लगता है कि SC/ST सांसदों को संसद में कम समय मिलता है, तो उन्होंने कहा कि वह अपनी राय नहीं बल्कि बैठक में सांसद द्वारा उठाई गई बात को आगे बढ़ा रहे हैं।

मांझी ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई सांसद अपने क्षेत्र में अवैध खनन या किसी दूसरी समस्या की बात उठाता है, तो समूह के नेता के तौर पर उनका काम उस मुद्दे को संबंधित स्तर तक पहुंचाना है।

इसी तरह SC/ST सांसदों के बोलने के समय का मुद्दा भी उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष के सामने रखा है।

संसद में बोलने का समय कैसे जुड़ा है?

संसद में किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान अलग-अलग राजनीतिक दलों के सांसदों को बोलने का समय निर्धारित प्रक्रिया के तहत मिलता है। मांझी द्वारा उठाया गया मुद्दा इसी समय के वितरण से जुड़ा है।

यह मांग इस बात पर केंद्रित है कि SC/ST समुदायों से आने वाले सांसदों को अपने समुदायों से जुड़े मुद्दे संसद में रखने के लिए पर्याप्त अवसर मिले।

फिलहाल मांझी के पत्र के बाद इस मुद्दे पर लोकसभा अध्यक्ष की ओर से किसी कार्रवाई या निर्देश की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।

मांझी के पत्र से क्यों शुरू हुई नई बहस?

मांझी NDA के घटक दल HAM के प्रमुख भी हैं और केंद्र सरकार में मंत्री हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ गठबंधन के एक वरिष्ठ नेता की ओर से संसद में SC/ST सांसदों के बोलने के समय का मुद्दा उठाए जाने से इस पर राजनीतिक चर्चा शुरू हुई है।

हालांकि, मांझी ने खुद इसे किसी राजनीतिक रणनीति के तौर पर पेश नहीं किया है। उनका कहना है कि उन्होंने NDA सांसदों की बैठक में सामने आई बात को लोकसभा अध्यक्ष तक पहुंचाने का काम किया है।

चुनाव आयोग को लेकर भी मांझी ने दी प्रतिक्रिया

मांझी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रही राजनीतिक बहस पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। हाल के दिनों में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर राजनीतिक दलों की ओर से अलग-अलग दावे और प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि विचारों में मतभेद होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और SIR समेत संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

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इसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए मांझी ने कहा कि आयोग जैसे संस्थानों में किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ सकती है। उन्होंने कहा कि किसी बैठक में अलग मत आने का मतलब यह नहीं है कि अंतिम निर्णय उसी राय के आधार पर होगा।

‘मुख्य व्यक्ति को निर्णय लेने का अधिकार’

ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर मांझी ने कहा कि किसी संस्था में निर्णय लेने की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। उनके मुताबिक, बैठक में अलग-अलग राय आने के बावजूद अंतिम निर्णय लेने वाले पदाधिकारी के पास अधिकार होता है और संस्थागत प्रक्रिया के तहत उस निर्णय को माना जाता है।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब चुनाव आयोग के कामकाज और SIR को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है।

SC/ST सांसदों के मुद्दे पर अब आगे क्या?

जीतन राम मांझी के पत्र के बाद अब यह देखना होगा कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से इस मांग पर क्या कदम उठाया जाता है। मांझी ने पत्र में SC/ST सांसदों को महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान पर्याप्त बोलने का अवसर देने से संबंधित कार्रवाई की मांग की है।

फिलहाल यह मुद्दा संसद में प्रतिनिधित्व और बोलने के समय के वितरण से जुड़ी बहस का हिस्सा बन गया है।

मांझी का पत्र बना चर्चा का विषय

SC/ST सांसदों को संसद में बोलने के लिए पर्याप्त समय देने की मांग को लेकर लिखा गया मांझी का पत्र अब चर्चा में है। खास बात यह है कि यह मुद्दा NDA सांसदों की बैठक में उठा था और उसी आधार पर इसे लोकसभा अध्यक्ष के सामने रखा गया।

मांझी ने साफ किया है कि वह इस मामले में अपनी व्यक्तिगत शिकायत नहीं रख रहे हैं, बल्कि सांसदों की ओर से बैठक में उठाई गई बात को संबंधित स्तर तक पहुंचा रहे हैं। अब आगे लोकसभा अध्यक्ष के स्तर से होने वाली कार्रवाई पर इस मुद्दे की दिशा निर्भर करेगी।

Nishkarsh Bharat

भूमि आर्या की रिपोर्ट