सम्राट चौधरी के CM बनने पर BJP में अंदरूनी खींचतान? चार संकेतों से समझिए पूरी सियासत

CM पद की शपथ ली

बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव तब देखने को मिला जब सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री (CM) पद की शपथ ली और भारतीय जनता पार्टी (BJP) को राज्य में पहली बार अपना मुख्यमंत्री मिला।

बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव तब देखने को मिला जब सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री (CM) पद की शपथ ली और भारतीय जनता पार्टी (BJP) को राज्य में पहली बार अपना मुख्यमंत्री मिला। यह बीजेपी के लिए ऐतिहासिक क्षण था, लेकिन इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ-साथ पार्टी के भीतर असंतोष और संभावित गुटबाजी की चर्चा भी तेज हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से शपथ ग्रहण समारोह और उसके बाद के कार्यक्रमों में कई बड़े नेता गायब रहे, उसने यह संकेत दे दिया है कि सब कुछ सामान्य नहीं है। आइए विस्तार से समझते हैं कि किन संकेतों से BJP के भीतर खींचतान की बात सामने आ रही है।


शपथ ग्रहण: उत्सव कम, औपचारिकता ज्यादा

आमतौर पर जब किसी राज्य में BJP का मुख्यमंत्री शपथ लेता है, तो यह कार्यक्रम शक्ति प्रदर्शन का बड़ा मंच बन जाता है। लेकिन इस बार बिहार में ऐसा नहीं दिखा।

सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण समारोह में न तो बड़े केंद्रीय नेता पहुंचे और न ही अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री। केवल संगठन स्तर के कुछ चेहरे मौजूद रहे। इसे लेकर विपक्ष ने भी तंज कसा कि “BJP अपने ही CM के शपथ समारोह में पूरी ताकत नहीं दिखा पाई।”

हालांकि पार्टी के सूत्र इसे एक सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं। उनका कहना है कि BJP यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि उसने सहयोगी नेतृत्व को हटाकर अपना मुख्यमंत्री बैठाया है।


प्रधानमंत्री का देर से रिएक्शन

राजनीति में समय बहुत मायने रखता है। शपथ ग्रहण के करीब तीन घंटे बाद प्रधानमंत्री की ओर से बधाई संदेश आना भी चर्चा का विषय बन गया।

आमतौर पर ऐसे अवसरों पर तुरंत प्रतिक्रिया दी जाती है, जिससे राजनीतिक संदेश साफ जाता है। लेकिन इस देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह इस फैसले के साथ सहज था या यह सिर्फ औपचारिकता निभाई गई।


विजय सिन्हा का बयान और दूरी

सबसे दिलचस्प पहलू रहा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव रखने वाले विजय सिन्हा का रवैया।

उन्होंने बैठक में कहा कि उन्होंने “कमांडर के आदेश” पर सम्राट चौधरी का नाम प्रस्तावित किया। इस बयान को राजनीतिक तौर पर बहुत अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि यह निर्णय पूरी तरह सर्वसम्मति से नहीं था।

इसके बाद विजय सिन्हा ने शपथ ग्रहण समारोह और पार्टी के अभिनंदन कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी। हालांकि बाद में वे सम्राट चौधरी के आवास पर जाकर बधाई देने पहुंचे, लेकिन शुरुआती दूरी ने कई सवाल खड़े कर दिए।


अभिनंदन समारोह में भी ‘खालीपन’

पटना स्थित BJP कार्यालय में आयोजित अभिनंदन समारोह में भी बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी साफ नजर आई।

यह कार्यक्रम कार्यकर्ताओं के लिए बताया गया, लेकिन राजनीतिक परंपरा के मुताबिक ऐसे अवसरों पर बड़े नेता भी शामिल होते हैं। सांसद, विधायक और पार्टी के वरिष्ठ चेहरे मंच से गायब रहे, जिसने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।


पोस्टर पॉलिटिक्स में बदलाव

बिहार की राजनीति में पोस्टर और होर्डिंग्स का विशेष महत्व है। किसी भी बड़े राजनीतिक फैसले के बाद शहर भर में बधाई संदेशों की भरमार हो जाती है।

लेकिन इस बार सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पटना की सड़कों पर ऐसा कुछ खास देखने को नहीं मिला। बड़े नेताओं की ओर से पोस्टर लगभग नदारद रहे।

यह बदलाव केवल संयोग नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे नेताओं की “साइलेंट नाराजगी” के रूप में देखा जा रहा है।


नाराजगी की असली वजह

पार्टी के भीतर असंतोष की जड़ सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा को बताया जा रहा है।

उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत अन्य दलों से की थी और बाद में BJP में शामिल हुए। ऐसे में पार्टी के पुराने और समर्पित नेताओं के बीच यह भावना है कि उन्हें नजरअंदाज किया गया है।

एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि “नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को दिया गया है, जिसकी जड़ें भाजपा की मूल विचारधारा में नहीं हैं।”


BJP की रणनीति: सोशल इंजीनियरिंग

हालांकि BJP इस फैसले को अपनी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा मान रही है। सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी कुशवाहा और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है।

इसके साथ ही पार्टी यह भी चाहती है कि गठबंधन की राजनीति में संतुलन बना रहे और नीतीश कुमार का पारंपरिक वोट बैंक NDA के साथ बना रहे।


कोर वोट बैंक की चुनौती

BJP का कोर वोट बैंक बिहार में वैश्य और सवर्ण समुदाय रहा है। पार्टी इस वर्ग को नाराज नहीं करना चाहती।

यही कारण है कि पार्टी अब “संतुलन की राजनीति” कर रही है—एक तरफ नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश और दूसरी तरफ अपने पारंपरिक वोटरों को साधने की चुनौती।


आगे की राजनीति पर असर

फिलहाल बिहार में कोई बड़ा चुनाव नजदीक नहीं है, लेकिन अंदरूनी असंतोष अगर बढ़ता है, तो इसका असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है।

2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए BJP को यह सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी के भीतर एकजुटता बनी रहे।

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना BJP के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसके साथ जो राजनीतिक संकेत सामने आए हैं, वे यह बताते हैं कि पार्टी के भीतर सब कुछ पूरी तरह सहज नहीं है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि BJP इस असंतोष को कैसे संभालती है और क्या सम्राट चौधरी अपने नेतृत्व से पार्टी को एकजुट कर पाते हैं या नहीं।

Nishkarsh Bharat

पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट

You may have missed