महंगाई की मार! रसोई का फिर बिगड़ेगा बजट, खाने-पीने की चीजों के दाम आखिर कब घटेंगे?

महंगाई

खाद्य महंगाई बढ़ी, कब घटेंगे खाने-पीने की चीजों के दाम?

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)। घर का बजट अक्सर किसी बड़े खर्च से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी खरीदारी से बिगड़ता है। सब्जी मंडी में प्याज कुछ रुपये महंगा हुआ, खाने का तेल महंगा हुआ या दाल की कीमत बढ़ी, तो एक दिन में इसका असर बहुत बड़ा नजर नहीं आता। लेकिन महीनेभर की खरीदारी में यही छोटी बढ़ोतरी परिवार के कुल खर्च को काफी ऊपर ले जाती है।

अभी भारत में खाने-पीने की चीजों की कीमतों को लेकर कुछ ऐसा ही दबाव दिखाई दे रहा है। अगस्त 2026 में खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.95 फीसदी हो गई, जो जुलाई में 5.52 फीसदी थी। इसी दौरान खुदरा महंगाई भी 4.45 फीसदी से बढ़कर 4.82 फीसदी पहुंच गई। यानी रसोई के खर्च पर दबाव फिर बढ़ रहा है।

महंगाई का असर हर सामान पर एक जैसा नहीं

इस बार खाद्य महंगाई की सबसे खास बात यह है कि सभी खाने-पीने की चीजें एक साथ महंगी नहीं हुई हैं। कुछ वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई, जबकि कुछ सब्जियां सस्ती भी हुई हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में प्याज की कीमत सालाना आधार पर 48.27 फीसदी बढ़ी। लहसुन में 43.60 फीसदी और अदरक में 73.82 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। दूसरी ओर टमाटर की कीमत 31.09 फीसदी और आलू की कीमत 13.14 फीसदी घटी। इसके बावजूद महंगी हुई जरूरी चीजों का असर इतना अधिक रहा कि कुल खाद्य महंगाई बढ़ गई।

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यानी बाजार में किसी एक सामान का सस्ता होना पूरे किराना बिल को जरूरी नहीं कि कम कर दे। परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों में जिन वस्तुओं की खरीद ज्यादा होती है, उनकी कीमत बढ़ने पर कुल खर्च तेजी से ऊपर जा सकता है।

महंगाई अगले कुछ महीनों में और बढ़ सकती है?

अर्थशास्त्रियों के अनुमान ने चिंता बढ़ा दी है। 360 ONE Asset के वरिष्ठ अर्थशास्त्री विक्रम छाबड़ा का अनुमान है कि खाद्य महंगाई आने वाले तीन से छह महीनों में करीब 7 से 8 फीसदी तक पहुंच सकती है। वहीं ICRA की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने अक्टूबर 2026 तक खाद्य महंगाई के 7 फीसदी से ऊपर जाने की आशंका जताई है।

हालांकि ये अनुमान हैं, अंतिम स्थिति आने वाले महीनों के वास्तविक आंकड़ों पर निर्भर करेगी। खरीफ फसल की आवक, मौसम, मंडियों में सप्लाई और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम कीमतों की दिशा बदल सकते हैं।

इसलिए यह कहना अभी सही नहीं होगा कि महंगाई निश्चित रूप से 7 या 8 फीसदी तक जाएगी। लेकिन मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों पर दबाव एक महत्वपूर्ण चिंता बना रह सकता है।

प्याज ने बढ़ाई रसोई की चिंता

प्याज की कीमतों में तेजी फिलहाल सबसे ज्यादा दिखाई देने वाले दबावों में से एक है। प्याज ऐसी चीज है जिसका इस्तेमाल भारतीय घरों में रोजाना या बहुत नियमित रूप से होता है। इसलिए इसकी कीमत बढ़ने का असर सीधे परिवार के रसोई बजट में महसूस होता है।

PHDCCI के राजीव जुनेजा के अनुसार प्याज की थोक कीमतों में बदलाव खुदरा बाजार तक अपेक्षाकृत तेजी से पहुंच सकता है। हालांकि मंडी से घर तक पहुंचते-पहुंचते परिवहन, भंडारण, हैंडलिंग, खराब होने और थोक-खुदरा मार्जिन जैसे खर्च भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।

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यही वजह है कि मंडी में कीमत घटने के बावजूद दुकानों पर उसका असर तुरंत या उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है।

महंगाई में मौसम की भूमिका सबसे अहम

खाद्य कीमतों के लिए इस समय सबसे बड़ा जोखिम मौसम को माना जा रहा है। मानसून की मात्रा के साथ-साथ उसका वितरण भी खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। कहीं ज्यादा बारिश और कहीं कम बारिश होने पर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

इस साल कमजोर और असमान मानसून को लेकर चिंता बनी हुई है। इसका असर खरीफ फसलों की बुवाई और आगे की पैदावार पर पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र में उत्पादन कम हुआ तो बाजार में उपलब्धता घट सकती है और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

यही कारण है कि आने वाले महीनों में खरीफ फसल की वास्तविक आवक महंगाई की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगी।

अल नीनो ने बढ़ाई चिंता

मौसम से जुड़ी चिंता सिर्फ मानसून तक सीमित नहीं है। अल नीनो की संभावित स्थिति को भी खाद्य महंगाई के लिए बड़ा जोखिम माना जा रहा है। इसका असर बारिश, तापमान और जलाशयों की स्थिति पर पड़ सकता है।

अगर जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं रहा तो आने वाली रबी फसल के लिए सिंचाई की चुनौती बढ़ सकती है। गेहूं और दाल जैसी फसलों पर इसका असर पड़ने की आशंका रहती है। वहीं सर्दियों में तापमान सामान्य से अधिक रहने पर कुछ जल्दी खराब होने वाली फसलों की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

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इसी वजह से विशेषज्ञों की नजर सिर्फ अक्टूबर-नवंबर की सब्जियों की कीमतों पर नहीं, बल्कि 2027 की शुरुआत में आने वाली रबी फसल पर भी है।

दाल, चावल और तेल की कीमतों पर नजर

खाद्य महंगाई का अगला बड़ा मोर्चा दाल, चावल और खाद्य तेल हो सकता है। सभी फसलों की स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ फसलों के पास पर्याप्त स्टॉक है, जबकि कुछ में शुरुआती स्टॉक कम रहने से कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

तिलहन के मामले में घरेलू उत्पादन, क्रशिंग की मांग और अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल कीमतें महत्वपूर्ण हैं। भारत खाद्य तेल के लिए आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का असर घरेलू कीमतों पर भी पड़ सकता है।

दालों में सरकार सप्लाई बढ़ाने और आयात के जरिए कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकती है। हाल में सरकार की ओर से कुछ दालों के आयात शुल्क में बदलाव पर विचार की खबरें भी सामने आई हैं।

पश्चिम एशिया संकट से भी महंगाई का खतरा

खाद्य महंगाई को प्रभावित करने वाला एक और बड़ा कारण ऊर्जा की कीमतें हैं। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल और ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव बना हुआ है।

कच्चा तेल महंगा होने पर खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल, सिंचाई, परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है। इसका असर खेत से मंडी और मंडी से खुदरा बाजार तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

इसके अलावा खाद और पैकेजिंग की लागत भी ऊर्जा कीमतों से प्रभावित होती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का असर सीधे उसी दिन सब्जी के भाव में नजर नहीं आता, लेकिन कुछ समय बाद पूरी सप्लाई चेन के जरिए उपभोक्ता तक पहुंच सकता है। वित्त मंत्रालय ने भी सितंबर की आर्थिक समीक्षा में ऊंचे कच्चे तेल और भू-राजनीतिक तनाव को महंगाई के लिए जोखिम बताया है।

थोक महंगाई ने भी बढ़ाई चिंता

खुदरा बाजार के साथ थोक कीमतों में भी दबाव दिखाई दे रहा है। अगस्त 2026 में भारत की थोक महंगाई दर बढ़कर 9.92 फीसदी हो गई, जबकि जुलाई में यह 9.78 फीसदी थी। इसी दौरान थोक खाद्य कीमतों की महंगाई 6.65 फीसदी से बढ़कर 7.05 फीसदी हो गई।

हालांकि थोक और खुदरा महंगाई अलग-अलग सूचकांक हैं और दोनों का असर उपभोक्ता तक एक ही समय और उसी अनुपात में नहीं पहुंचता। फिर भी थोक कीमतों में लगातार बढ़ोतरी आने वाले महीनों में लागत दबाव का संकेत दे सकती है।

कब सस्ता होगा राशन और सब्जियों का खर्च?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम परिवार को राहत कब मिलेगी। इसका कोई निश्चित दिन या महीना अभी नहीं बताया जा सकता। लेकिन अर्थशास्त्रियों के अनुसार 2026 के अंत से 2027 की शुरुआत के बीच राहत की संभावना बन सकती है, बशर्ते खरीफ फसल की आवक अच्छी रहे, प्याज और दूसरी सब्जियों की सप्लाई सुधरे और मौसम का दबाव कम हो।

अगर रबी की बुवाई और पैदावार भी सामान्य रहती है तो गेहूं, दाल और अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। इससे खाद्य महंगाई को नीचे आने में मदद मिल सकती है।

इसके उलट अगर अल नीनो का असर बढ़ता है, रबी फसल प्रभावित होती है और ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो रसोई के बजट पर दबाव लंबे समय तक रह सकता है।

फिलहाल राहत की उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन अगले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण हैं। मंडियों में फसल की आवक, प्याज-दाल-तेल की कीमतें, मानसून के बाद की खेती और वैश्विक ऊर्जा बाजार यह तय करेंगे कि महंगाई की यह लहर कितनी लंबी चलती है। इसलिए आम परिवारों के लिए अभी सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आज बाजार में क्या महंगा है, बल्कि यह है कि आने वाले महीनों में रोजमर्रा की थाली कितनी महंगी होने वाली है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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