कोरोना जैसी महामारी के लिए कितना तैयार है भारत? जानें पूरी तैयारी, आंकड़े देंगे जवाब

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कोरोना के बाद भारत ने 163 लैब, 4 जीनोम हब और 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक की तैयारी की है। जानें महामारी से निपटने में देश कितना तैयार है।

निष्कर्ष भारत, ( नई दिल्ली)। रूस के साइबेरिया में एक लैब टेक्नीशियन की निमोनिया के बाद मौत ने एक बार फिर महामारी की तैयारी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना इरकुत्स्क के एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़ी है। हालांकि उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के मुताबिक इस मौत को प्लेग संक्रमण के तौर पर कंफर्म नहीं किया गया है। ऐसे में किसी भी आशंका को तथ्य मानना सही नहीं होगा। लेकिन इस घटना ने यह सवाल जरूर सामने ला दिया है कि अगर कोरोना जैसी कोई नई संक्रामक बीमारी अचानक फैलने लगे तो भारत उसे कितनी जल्दी पहचान और नियंत्रित कर सकता है?

कोरोना महामारी के दौरान भारत समेत पूरी दुनिया ने देखा कि महामारी से निपटने के लिए सिर्फ अस्पताल और डॉक्टर पर्याप्त नहीं हैं। बीमारी की शुरुआती पहचान, जांच, निगरानी, जीनोम सीक्वेंसिंग, गंभीर मरीजों के लिए ICU और केंद्र-राज्य के बीच तेज तालमेल भी उतना ही जरूरी है। इसी अनुभव के बाद भारत ने स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम किया है।

कोरोना के बाद कितना बदला भारत का हेल्थ सिस्टम?

भारत ने महामारी की तैयारियों को केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा। इसके तहत लैब नेटवर्क, क्रिटिकल केयर, बीमारी की निगरानी, जीनोम जांच और वन हेल्थ जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया गया है।

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PM-ABHIM के लिए 2021-22 से 2025-26 तक 64,180 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। इसके अलावा देश में संक्रामक रोगों की जांच क्षमता बढ़ाने के लिए ICMR के VRDL नेटवर्क को भी मजबूत किया गया है।

आज भारत में 163 वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैब का नेटवर्क है। इनमें 11 रीजनल, 27 स्टेट और 125 मेडिकल कॉलेज लैब शामिल हैं। इसका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियों की जांच को तेजी से उपलब्ध कराना है।

कोरोना जैसी बीमारी में टेस्टिंग क्यों अहम?

महामारी के शुरुआती दौर में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि बीमारी आखिर है क्या। कोरोना के समय कई जगह टेस्टिंग क्षमता बढ़ाने में समय लगा था। अब लैब नेटवर्क के विस्तार से इस चुनौती को कम करने की कोशिश की गई है।

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अगर किसी जिले या क्षेत्र में असामान्य संक्रमण सामने आता है तो सैंपल को हर बार किसी बड़े शहर की लैब में भेजने की जरूरत कम हो सकती है। स्थानीय और क्षेत्रीय लैब में जांच होने से बीमारी की पहचान और रिपोर्टिंग तेजी से संभव हो सकती है।

रूस में सामने आई घटना भी यही बताती है कि किसी बीमारी के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले वैज्ञानिक जांच जरूरी है। केवल निमोनिया, किसी रिसर्च सेंटर में काम करना या संपर्क में आए लोगों की निगरानी से प्लेग की पुष्टि नहीं होती।

कोरोना के बाद जीनोम जांच पर जोर

महामारी में सिर्फ संक्रमण की पहचान ही पर्याप्त नहीं होती। वैज्ञानिकों के लिए यह जानना भी जरूरी है कि किसी वायरस या बैक्टीरिया में कोई महत्वपूर्ण जेनेटिक बदलाव तो नहीं हो रहा।

भारत में इसके लिए चार आधुनिक जीनोम सीक्वेंसिंग हब विकसित किए गए हैं। जीनोम जांच के जरिए रोगजनक के जेनेटिक बदलावों को समझने में मदद मिलती है। इससे संक्रमण के स्वरूप और उसके संभावित बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।

कोरोना के दौरान नए वेरिएंट की पहचान में जीनोम सीक्वेंसिंग की भूमिका सामने आई थी। यही वजह है कि नई महामारी की तैयारी में यह व्यवस्था अब एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।

कोरोना के दबाव से निपटने के लिए 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक

कोरोना महामारी ने अस्पतालों पर अचानक बढ़ने वाले दबाव की तस्वीर भी सामने रखी थी। ऑक्सीजन, ICU और गंभीर मरीजों के लिए बेड की जरूरत तेजी से बढ़ सकती है।

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इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए PM-ABHIM के तहत 602 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक विकसित करने की योजना है। इसके साथ 3,382 ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट और 730 इंटीग्रेटेड पब्लिक हेल्थ लैब बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके अलावा 17,788 सब-हेल्थ सेंटरों को आयुष्मान आरोग्य मंदिर में अपग्रेड करने की मंजूरी दी गई है। शहरी इलाकों में भी 11,024 अर्बन आयुष्मान आरोग्य मंदिर विकसित किए जा रहे हैं। इसका मकसद बीमारी की रोकथाम, शुरुआती पहचान और इलाज की सुविधाओं को स्थानीय स्तर तक पहुंचाना है।

कोरोना जैसी महामारी में निगरानी सबसे जरूरी

किसी संक्रमण का पता चलने के बाद अगला सवाल होता है कि वह कितनी तेजी से फैल रहा है। इसके लिए देश में बीमारी की निगरानी का सिस्टम काम करता है। NCDC का इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम यानी IDSP अलग-अलग बीमारियों की निगरानी करता है। वहीं इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्रोग्राम के जरिए बीमारी से जुड़े आंकड़ों की रिपोर्टिंग और निगरानी को मजबूत करने की कोशिश की गई है।

संभावित प्रकोप की स्थिति में विशेषज्ञों की टीम जांच और जोखिम का आकलन कर सकती है। मॉक ड्रिल और सिमुलेशन एक्सरसाइज के जरिए यह भी परखा जाता है कि स्वास्थ्य एजेंसियां आपात स्थिति में कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती हैं। वेस्टवॉटर सर्विलांस भी कुछ रोगजनकों के शुरुआती संकेतों की पहचान करने की कोशिश का हिस्सा है।

कोरोना का अगला खतरा इंसानों से बाहर भी हो सकता है

नई महामारी का खतरा हमेशा इंसानों से ही शुरू हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई संक्रामक बीमारियां जानवरों से इंसानों तक पहुंच सकती हैं। इसी वजह से भारत ने नेशनल वन हेल्थ मिशन पर जोर दिया है।

इस मिशन में 13 से ज्यादा मंत्रालय और विभाग शामिल हैं। इसका उद्देश्य इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक साथ समझना है।

मिशन के तहत 22 BSL-3/4 लैब के नेटवर्क पर भी काम किया जा रहा है। ये उच्च जोखिम वाले रोगजनकों की जांच और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

राज्यों में पैसा कितना जमीन पर पहुंचा?

किसी योजना का बजट तय होना और उसका जमीन पर पूरी तरह इस्तेमाल होना दो अलग बातें हैं। उत्तर प्रदेश के 2025-26 के उपलब्ध आंकड़े इस अंतर को समझने में मदद करते हैं।

NHM के तहत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 1,500.93 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे। उपलब्ध प्रोविजनल आंकड़ों में 83.66 करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए हैं। वहीं PM-ABHIM के तहत यूपी के लिए केंद्र से 211.88 करोड़ रुपये जारी किए गए, जबकि रिपोर्ट में कुल खर्च 511.46 करोड़ रुपये बताया गया है।

इन आंकड़ों को पूरे देश की स्थिति का सीधा पैमाना नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि बजट और वास्तविक खर्च के बीच अंतर पर लगातार नजर रखना जरूरी है।

2026 के बजट में स्वास्थ्य पर कितना जोर?

केंद्रीय बजट 2026-27 में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 1,06,530.42 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। PM-ABHIM के लिए 4,770 करोड़ रुपये रखे गए हैं, जो पिछले संशोधित अनुमान के 2,845 करोड़ रुपये से अधिक है।

इसके अलावा NHM के लिए 39,390 करोड़ रुपये, PM-JAY के लिए 9,500 करोड़ रुपये और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिए 4,821.21 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। ICMR के लिए 4,000 करोड़ रुपये रखे गए हैं।

क्या भारत कोरोना जैसी महामारी के लिए तैयार है?

आंकड़ों को देखें तो कोरोना के बाद भारत ने महामारी की तैयारी के लिए एक व्यापक ढांचा खड़ा करने की कोशिश की है। 163 लैब, चार जीनोम हब, 602 क्रिटिकल केयर ब्लॉक, बीमारी की निगरानी और वन हेल्थ मिशन इसके प्रमुख हिस्से हैं।

फिर भी किसी महामारी की असली परीक्षा तब होती है जब संक्रमण अचानक सामने आता है। उस समय सिर्फ योजनाएं और बजट नहीं, बल्कि उनकी जमीन पर उपलब्धता, जांच की गति, राज्यों की क्षमता और केंद्र-राज्य समन्वय निर्णायक होंगे।

यह कहना ज्यादा उचित होगा कि भारत कोरोना के बाद पहले से बेहतर तैयार है, लेकिन महामारी से जुड़ी तैयारी कभी पूरी नहीं मानी जा सकती। नए रोगजनकों और बदलते संक्रमण के खतरे के बीच लगातार निगरानी, अभ्यास और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना ही सबसे बड़ी जरूरत बनी रहेगी।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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