रालोमो में फूट के सवाल पर भड़के उपेंद्र कुशवाहा, बोले- लोगों का माथा टूट जाएगा, लेकिन पार्टी नही टूटेगी

उपेंद्र कुशवाहा

उपेंद्र कुशवाहा बोले- पार्टी नहीं टूटेगी, माथा टूट जाएगा

निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( पटना)।  बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर होने वाले चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोक मोर्चा यानी रालोमो के भीतर सामने आए मतभेद ने एनडीए के राजनीतिक समीकरणों को चर्चा में ला दिया है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से रालोमो के प्रदेश महासचिव रामपुकार सिन्हा के चुनाव मैदान में उतरने के बाद पार्टी के भीतर ही अलग-अलग रुख सामने आए हैं। रालोमो के कुछ विधायक रामपुकार सिन्हा के समर्थन में पहुंच गए, जबकि पार्टी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए के अधिकृत उम्मीदवारों की जीत का दावा किया है।

इसी बीच पटना में पत्रकारों ने जब उपेंद्र कुशवाहा से पार्टी में टूट को लेकर सवाल किया तो उन्होंने सवाल को खारिज करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि भीड़ बहुत ज्यादा है, पत्रकार जी, आपका माथा भी टूट जाएगा। उनके इस बयान के बाद रालोमो में कथित टूट का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।

उपेंद्र कुशवाहा के सामने पार्टी में टूट का सवाल

विधान परिषद चुनाव के दौरान उपेंद्र कुशवाहा के रालोमो के अंदर पैदा हुए घटनाक्रम को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के प्रदेश महासचिव रामपुकार सिन्हा ने सोमवार को सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नामांकन दाखिल किया। खास बात यह रही कि उनके नामांकन के दौरान रालोमो के प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह और पार्टी के तीन विधायक भी उनके समर्थन में नजर आए।

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रामपुकार सिन्हा का चुनाव मैदान में उतरना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एनडीए ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार उतारा है। ऐसे में रालोमो के नेता का अलग उम्मीदवार के तौर पर मैदान में आना सीधे तौर पर एनडीए के घोषित चुनावी रुख से अलग माना जा रहा है।

पत्रकारों ने इसी घटनाक्रम को लेकर उपेंद्र कुशवाहा से सवाल किया था कि क्या रालोमो में टूट हो गई है। जवाब में उन्होंने पार्टी में टूट की बात को स्वीकार नहीं किया और कहा कि भीड़ में धक्का-मुक्की के कारण पत्रकार का माथा भी टूट सकता है।

रालोमो में अलग रुख से बढ़ी राजनीतिक हलचल

रालोमो प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने विधान परिषद की सभी आठ सीटों पर एनडीए की जीत का दावा किया है। उन्होंने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एनडीए के अधिकृत उम्मीदवारों के समर्थन में काम करने का निर्देश भी दिया है।

इसके बावजूद रालोमो से जुड़े कुछ प्रमुख नेताओं और विधायकों का रामपुकार सिन्हा के समर्थन में पहुंचना पार्टी के अंदर मतभेद की ओर इशारा कर रहा है। राजनीतिक तौर पर यह घटनाक्रम इसलिए भी अहम है क्योंकि सारण शिक्षक सीट पर रामपुकार सिन्हा का मुकाबला एनडीए के उम्मीदवार से होना है।

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ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी का संगठनात्मक निर्देश जमीन पर उसी तरह लागू हो रहा है जैसा नेतृत्व चाहता है या स्थानीय स्तर पर नेताओं की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं सामने आ रही हैं।

उपेंद्र कुशवाहा ने एनडीए उम्मीदवारों के समर्थन की अपील की

उपेंद्र कुशवाहा लगातार यह संदेश देते रहे हैं कि विधान परिषद की सभी आठ सीटों पर एनडीए उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करनी है। उन्होंने पार्टी नेताओं को चुनावी मैदान में एनडीए प्रत्याशियों के समर्थन में सक्रिय होने को कहा था।

बताया गया कि रामपुकार सिन्हा के समर्थन में पहुंचे तीनों विधायकों को एनडीए उम्मीदवारों के नामांकन कार्यक्रम में शामिल होने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन इसके बजाय वे रामपुकार सिन्हा के नामांकन में पहुंच गए।

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यही वजह है कि रालोमो के अंदर अनुशासन और नेतृत्व के निर्देश को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि, पार्टी के बागी रुख वाले नेताओं की ओर से इसे एनडीए से अलग होने की कोशिश के तौर पर पेश नहीं किया गया है।

विधायकों ने बताया समर्थन का कारण

रालोमो विधायक माधव आनंद ने रामपुकार सिन्हा के समर्थन को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा कि वे कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान के लिए रामपुकार सिन्हा का समर्थन कर रहे हैं।

माधव आनंद ने यह भी कहा था कि वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार के समर्थन में पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। उनके बयान से संकेत मिलता है कि रामपुकार सिन्हा के समर्थन को वे एनडीए सरकार के विरोध के तौर पर नहीं देख रहे हैं।

यानी रालोमो के भीतर पैदा हुआ विवाद फिलहाल चुनावी उम्मीदवार को लेकर ज्यादा दिखाई दे रहा है। पार्टी से अलग होने या सरकार के खिलाफ जाने की बात इन नेताओं की ओर से सामने नहीं आई है।

रामपुकार सिन्हा की उम्मीदवारी क्यों अहम?

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से रामपुकार सिन्हा की उम्मीदवारी ने पूरे मामले को चुनावी रंग दे दिया है। वह रालोमो के प्रदेश महासचिव हैं और पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। ऐसे में उनका एनडीए समर्थित उम्मीदवार के खिलाफ उतरना सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जा रहा।

उनके नामांकन में पार्टी के नेताओं और विधायकों की मौजूदगी ने सवाल और बढ़ा दिए हैं। अगर रालोमो के स्थानीय संगठन का एक हिस्सा रामपुकार सिन्हा के पक्ष में सक्रिय होता है तो इसका असर एनडीए के वोट समीकरण पर पड़ सकता है। हालांकि, चुनावी मैदान में इसका वास्तविक प्रभाव मतदान के दौरान ही साफ होगा।

उपेंद्र कुशवाहा के बयान का सियासी संदेश

उपेंद्र कुशवाहा का यह कहना कि पार्टी नहीं टूट रही और पत्रकार का माथा टूट सकता है, राजनीतिक तौर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने सीधे तौर पर पार्टी में टूट की संभावना को स्वीकार नहीं किया।

उनका जोर इस बात पर रहा कि चुनाव में एनडीए के उम्मीदवारों को जीत दिलाना प्राथमिकता है। ऐसे में उनका बयान पार्टी के भीतर उठ रहे मतभेदों को ज्यादा तूल नहीं देने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।

दूसरी तरफ, रामपुकार सिन्हा के समर्थन में विधायकों का उतरना बताता है कि स्थानीय स्तर पर असंतोष या राजनीतिक मतभेद मौजूद हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व इसे चुनाव से पहले किस तरह संभालता है।

आठ सीटों पर एनडीए के सामने चुनौती

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों का चुनाव एनडीए के लिए महत्वपूर्ण है। उपेंद्र कुशवाहा का दावा है कि सभी सीटों पर एनडीए उम्मीदवारों की जीत होगी। लेकिन रालोमो से जुड़े इस घटनाक्रम ने कम से कम एक सीट पर चुनावी समीकरण को दिलचस्प बना दिया है।

सारण शिक्षक सीट पर मुकाबला अब केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर की एकजुटता की भी परीक्षा बनता दिख रहा है। एनडीए नेतृत्व के लिए चुनौती यह होगी कि अलग-अलग दलों और नेताओं के समर्थकों को एक साझा रणनीति के तहत मतदान तक साथ रखा जाए।

उपेंद्र कुशवाहा ने पार्टी में टूट की किसी संभावना को खारिज किया है। लेकिन रामपुकार सिन्हा के समर्थन में सामने आए नेताओं के रुख ने राजनीतिक चर्चा को जरूर तेज कर दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि चुनाव के दौरान रालोमो के सभी नेता एनडीए के अधिकृत उम्मीदवार के साथ खड़े होते हैं या सारण सीट पर यह अंदरूनी मतभेद कोई नया राजनीतिक मोड़ लेता है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट

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