जदयू से निष्कासन के बाद अनंत सिंह को विधानसभा का नोटिस, 7 दिन का अल्टीमेटम, जवाब नहीं तो क्या होगा?
अनंत सिंह को विधानसभा का नोटिस, 7 दिन में जवाब नहीं तो बढ़ेगी मुश्किलें।
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। मोकामा के विधायक अनंत सिंह की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से छह साल के लिए निष्कासित होने के बाद अब उनकी विधानसभा सदस्यता पर भी संकट मंडराने लगा है। बिहार विधानसभा सचिवालय की ओर से अनंत सिंह को नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर जवाब मांगा गया है। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. प्रेम कुमार के निर्देश पर विधानसभा सचिव संजय कुमार सिंह ने यह नोटिस जारी किया है। सोमवार को अनंत सिंह ने विधानसभा का नोटिस प्राप्त कर लिया।
दिलचस्प बात यह है कि नोटिस ऐसे समय में आया है, जब अनंत सिंह अपनी छोटी बेटी की शादी की तैयारियों में व्यस्त हैं। हालांकि, विधानसभा की कार्रवाई के बीच उन्हें अपनी विधायकी बचाने के लिए अब कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया का सामना करना होगा। जदयू ने उनके खिलाफ पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाते हुए विधानसभा अध्यक्ष से सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा की थी। अब विधानसभा अध्यक्ष उनके जवाब और पार्टी की ओर से सौंपे गए साक्ष्यों की समीक्षा करेंगे।
जदयू से निष्कासन के बाद अनंत सिंह की विधायकी पर संकट
मोकामा विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी एवं पूर्व विधायक नीलम देवी को 24 अक्टूबर 2026 को जदयू ने छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने दोनों की प्राथमिक सदस्यता समाप्त करने का आदेश जारी किया था।
जदयू की नाराजगी की मुख्य वजह विधान परिषद चुनाव के दौरान अनंत सिंह की भूमिका बताई गई। आरोप है कि उन्होंने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार का समर्थन करने के बजाय जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी अनुज सिंह के पक्ष में प्रचार किया था।
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पार्टी नेतृत्व का आरोप था कि अनंत सिंह लगातार पार्टी के निर्देशों की अनदेखी कर रहे थे। इसके अलावा वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने और पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के विरोध में काम करने की शिकायत भी की गई थी।
निष्कासन के बाद जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार को पत्र लिखकर अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की अनुशंसा की थी। इसी शिकायत के आधार पर अब विधानसभा सचिवालय ने उन्हें नोटिस जारी किया है।
अनंत सिंह को 7 दिन का अल्टीमेटम, क्या है विधानसभा का नोटिस?
बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने इस मामले में स्पष्ट किया है कि किसी विधायक की सदस्यता समाप्त करने का फैसला बिना उसका पक्ष सुने नहीं लिया जाएगा। जदयू की ओर से शिकायत मिलने के बाद उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों की समीक्षा की गई है।
इसके बाद अनंत सिंह को नोटिस भेजकर सात दिनों के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया गया है। वह अपना जवाब लिखित रूप में दे सकते हैं। इसके अलावा निर्धारित प्रक्रिया के तहत व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर भी अपना पक्ष रख सकते हैं।
जदयू की ओर से शिकायत के समर्थन में दस्तावेज, समाचार पत्रों की कटिंग और अन्य साक्ष्य उपलब्ध कराए गए हैं। अब विधानसभा अध्यक्ष इन सभी तथ्यों के साथ अनंत सिंह के जवाब का मिलान करेंगे।
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इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नोटिस जारी होना सदस्यता समाप्त होने का अंतिम आदेश नहीं है। अभी पूरी प्रक्रिया बाकी है और अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष को नियमानुसार लेना है।
जवाब नहीं दिया तो क्या जाएगी अनंत सिंह की विधायकी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अनंत सिंह सात दिनों के भीतर विधानसभा के नोटिस का जवाब नहीं देते हैं तो उनके साथ क्या होगा?
विधानसभा अध्यक्ष के रुख के अनुसार, यदि अनंत सिंह निर्धारित समय में अपना जवाब नहीं देते हैं, तो उनके जवाब के अभाव में उपलब्ध शिकायत और साक्ष्यों के आधार पर आगे विचार किया जा सकता है।
हालांकि, जवाब नहीं देने का मतलब यह नहीं है कि उनकी विधानसभा सदस्यता अपने आप समाप्त हो जाएगी। अध्यक्ष को मामले के तथ्यों, संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करनी होगी।
दूसरी तरफ, यदि अनंत सिंह अपना पक्ष रखते हैं तो उनके जवाब को भी जदयू की शिकायत के साथ देखा जाएगा। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष तय करेंगे कि सदस्यता समाप्त करने का पर्याप्त आधार बनता है या नहीं।
इसलिए आने वाले सात दिन अनंत सिंह के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
क्या है दल-बदल कानून, जिसके तहत जा सकती है विधायकी?
अनंत सिंह की सदस्यता का मामला संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून के संदर्भ में चर्चा में है। इस कानून का उद्देश्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक लाभ के लिए दल बदलने और पार्टी के निर्देशों के खिलाफ जाने से रोकना है।
दसवीं अनुसूची के तहत कुछ परिस्थितियों में किसी विधायक की सदस्यता समाप्त की जा सकती है। इनमें स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ना और सदन में पार्टी के निर्देश या व्हिप के विपरीत मतदान करना अथवा मतदान से दूर रहना शामिल है।
हालांकि, अनंत सिंह के मामले में केवल पार्टी से निष्कासन को सदस्यता समाप्त होने का स्वतः आधार नहीं माना जा सकता। विधानसभा अध्यक्ष को यह देखना होगा कि शिकायत में लगाए गए आरोप और प्रस्तुत साक्ष्य दसवीं अनुसूची के प्रावधानों के तहत अयोग्यता का आधार बनाते हैं या नहीं।
यही वजह है कि इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय काफी महत्वपूर्ण होगा।
दुलारचंद हत्याकांड ने भी बढ़ाई अनंत सिंह की मुश्किलें
अनंत सिंह की राजनीतिक मुश्किलों के बीच दुलारचंद यादव हत्याकांड का मामला भी लगातार चर्चा में है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को अनंत सिंह को बड़ा झटका देते हुए उनकी जमानत रद्द कर दी और एक दिसंबर 2026 तक सरेंडर करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार पुलिस को इस हत्याकांड की जांच चार महीने के भीतर पूरी करने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने मामले को चार महीने बाद फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने को कहा है।

दरअसल, पटना हाईकोर्ट ने 19 मार्च 2026 को अनंत सिंह को इस मामले में जमानत दी थी। इसके खिलाफ मृतक दुलारचंद यादव के पोते की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने जमानत रद्द करने का आदेश दिया।
इससे पहले अनंत सिंह को इस मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। जेल में रहते हुए उन्होंने मोकामा विधानसभा चुनाव भी जीता था। बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर वह बाहर आए थे।
क्या है दुलारचंद यादव हत्याकांड?
दुलारचंद यादव की हत्या 30 अक्टूबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मोकामा में हुई थी। उस समय अनंत सिंह जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे, जबकि जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थन में दुलारचंद यादव प्रचार कर रहे थे।
चुनाव प्रचार के दौरान दोनों पक्षों के समर्थकों के काफिले आमने-सामने आ गए थे। इसी दौरान हिंसक झड़प हुई और दुलारचंद यादव की मौत हो गई।
इस मामले में अनंत सिंह पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि, मामले में आरोपों और उनकी भूमिका का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना है।
नीलम देवी को सरकारी बंगला खाली करने का नोटिस
अनंत सिंह और उनके परिवार के लिए राजनीतिक मुश्किलें केवल विधानसभा और अदालत तक सीमित नहीं हैं। जदयू से निष्कासन के बाद उनकी पत्नी नीलम देवी को भी सरकारी सुविधाओं से हाथ धोना पड़ा है।
बिहार सरकार के भवन निर्माण विभाग ने पटना के 1, मॉल रोड स्थित सरकारी आवास को 25 नवंबर 2026 तक खाली करने का नोटिस जारी किया है।
नीलम देवी को राज्यस्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति की सदस्य के रूप में राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त था। इसी आधार पर उन्हें सरकारी आवास आवंटित किया गया था। निष्कासन के बाद उनका मनोनयन समाप्त कर दिया गया और मंत्री का दर्जा भी वापस ले लिया गया।
अब अनंत सिंह के अगले कदम पर टिकी बिहार की राजनीति
फिलहाल अनंत सिंह के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, विधानसभा के नोटिस का सात दिनों के भीतर जवाब देना। दूसरी, दुलारचंद यादव हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए एक दिसंबर तक सरेंडर करना। तीसरी, जदयू से निष्कासन के बाद अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत बनाए रखना।
अब देखना होगा कि अनंत सिंह विधानसभा अध्यक्ष के सामने क्या पक्ष रखते हैं और जदयू की शिकायत पर क्या फैसला होता है। क्या वह अपना जवाब देकर मोकामा की विधायकी बचा पाएंगे या उनकी सदस्यता पर भी संकट गहरा जाएगा? फिलहाल इसका फैसला विधानसभा अध्यक्ष की आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
