IIIT रांची में बिहार के छात्र ने की आत्महत्या, सुरक्षा पर सवाल…राँची से पटना तक उठी जवाबदेही की मांग

IIIT रांची

IIIT रांची में बिहार के छात्र की मौत, कैंपस सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। झारखंड स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IIIT) रांची में प्रथम वर्ष के छात्र आदित्य कुमार से जुड़ी घटना ने संस्थान की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, IIIT के छात्र ने रात करीब 10:45 बजे अपने कमरे में आत्महत्या की कोशिश की। घटना के बाद छात्रों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन सहायता मिलने में कथित देरी को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं।

बताया जा रहा है कि जब IIIT के आदित्य के रूममेट ने कमरे का दरवाजा खटखटाया और अंदर से कोई जवाब नहीं मिला, तो सीनियर छात्रों की मदद से दरवाजा तोड़ा गया। इसके बाद IIIT के छात्रों ने उन्हें सीपीआर (CPR) देकर बचाने की कोशिश की। घटनाक्रम के दौरान छात्र में कुछ समय के लिए चेतना के संकेत दिखाई देने की बात भी सामने आई है। हालांकि, इन विवरणों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

IIIT रांची में एम्बुलेंस की चाबी मिलने में देरी का आरोप

IIIT घटना के बाद छात्रों ने आरोप लगाया कि आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराने में लापरवाही हुई। उनके मुताबिक, IIIT में एम्बुलेंस की चाबी खोजने में करीब 15 मिनट का समय बर्बाद हुआ, जिससे छात्र को अस्पताल पहुंचाने में देरी हुई।

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इसके अलावा, IIIT के डॉक्टर और केयरटेकर के कथित तौर पर नशे में होने तथा घटनास्थल से चले जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। IIIT मामले में वास्तविक परिस्थितियों और चिकित्सा सहायता मिलने के समय की जानकारी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

IIIT रांची में कैंपस की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल

इस घटना ने उच्च शिक्षण संस्थानों में आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और जिम्मेदार कर्मचारियों की जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या संस्थान में 24 घंटे मेडिकल सहायता, तत्काल उपलब्ध एम्बुलेंस और प्रशिक्षित कर्मचारियों की पर्याप्त व्यवस्था है।

तकनीकी संस्थानों में छात्र सुरक्षा पर उठे सवाल, क्या हैं चुनौतियां?

देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। झारखंड के IIIT राँची में प्रथम वर्ष के छात्र आदित्य कुमार से जुड़ी घटना, मुंबई के IIT बॉम्बे में छात्र साहिल वाकोड़े की मौत और बिहार के IIT पटना में छात्र राहुल लावरी की मौत के मामलों ने संस्थानों की जवाबदेही पर बहस तेज कर दी है। इन घटनाओं के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों को पर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य सहायता, समय पर चिकित्सा सुविधा और निष्पक्ष शिकायत निवारण व्यवस्था मिल पा रही है?

IIT बॉम्बे में साहिल वाकोड़े की मौत के बाद विवाद

मुंबई स्थित IIT बॉम्बे में सितंबर 2026 में छात्र साहिल वाकोड़े की मौत के बाद भी संस्थान के माहौल और छात्र हितों को लेकर सवाल उठे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनके परिवार ने जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए थे। वहीं, संस्थान ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि छात्र की ओर से प्रशासन या एससी-एसटी सेल में ऐसी शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी।

परीक्षा में कथित अनुचित साधनों के इस्तेमाल से जुड़े घटनाक्रम के बाद छात्र की मौत हुई। इस मामले के बाद परिसर में विरोध प्रदर्शन भी हुए और छात्रों ने मानसिक स्वास्थ्य सहायता तथा प्रशासनिक फैसलों को लेकर चिंता जताई।

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हालांकि, परिवार के आरोपों और संस्थान के जवाब के बीच वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए पारदर्शी जांच जरूरी है। किसी शिकायत का आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होना अपने आप में सभी संभावित समस्याओं को खारिज नहीं करता। इसी तरह, आरोपों को जांच से पहले प्रमाणित तथ्य भी नहीं माना जा सकता।

IIT पटना में छात्र की मौत ने भी बढ़ाई चिंता

फरवरी 2025 में IIT पटना के छात्र राहुल लावरी की मौत का मामला सामने आया था। उस समय पुलिस ने जांच शुरू की थी और एक सहपाठी ने अकादमिक दबाव का उल्लेख किया था। हालांकि, मौत के वास्तविक कारण के संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए जांच के तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

राँची, मुंबई और पटना के मामलों को एक साथ देखने पर उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, पढ़ाई से जुड़े तनाव और संकट के समय उपलब्ध सहायता की प्रभावशीलता पर चर्चा जरूरी हो जाती है। इन घटनाओं से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी मौतों का कारण अकादमिक दबाव या संस्थागत लापरवाही ही था।

IIT परिसरों में मौतों के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

एक मीडिया रिपोर्ट में आरटीआई जवाबों और समाचार रिपोर्टों के संकलन के आधार पर जनवरी 2006 से सितंबर 2026 तक IIT परिसरों में 171 छात्र आत्महत्याओं और अन्य अप्राकृतिक मौतों का उल्लेख किया गया। उसी संकलन में वर्ष 2025 के दौरान 16 और 18 सितंबर 2026 तक 13 मौतें दर्ज होने की बात कही गई। फिर भी, इन आंकड़ों के आधार पर छात्र कल्याण और सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थाओं की समीक्षा की जरूरत पर गंभीर चर्चा हो सकती है।

मोदी सरकार और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही पर सवाल

IIT और IIIT जैसे संस्थानों की प्रशासनिक संरचना और जिम्मेदारियां अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए हर घटना के लिए सीधे केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय की भूमिका संस्थानों में छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जवाबदेही से जुड़े मानकों को मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

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ऐसे में कुछ बुनियादी सवालों के जवाब जरूरी हैं। क्या कैंपस में चौबीसों घंटे प्रशिक्षित चिकित्सा सहायता उपलब्ध है? क्या एम्बुलेंस, प्राथमिक उपचार और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था का नियमित ऑडिट किया जाता है? क्या छात्रों को गोपनीय काउंसलिंग और विशेषज्ञ मानसिक स्वास्थ्य सहायता मिलती है? क्या एससी-एसटी सहित सभी शिकायत प्रकोष्ठ प्रभावी ढंग से काम करते हैं? और यदि जांच में गंभीर लापरवाही सामने आती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई कैसे सुनिश्चित की जाती है?

डिग्री और प्लेसमेंट के साथ छात्र सुरक्षा भी जरूरी

देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों की पहचान उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध, रैंकिंग और प्लेसमेंट से होती है। लेकिन छात्रों के लिए सुरक्षित वातावरण, समय पर चिकित्सा सहायता और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

IIIT राँची में आदित्य कुमार की घटना से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच, IIT बॉम्बे में परिवार और संस्थान के पक्षों की पारदर्शी समीक्षा तथा IIT पटना सहित अन्य संस्थानों में छात्र कल्याण व्यवस्था का मूल्यांकन जरूरी है।

शिक्षा मंत्रालय और संबंधित संस्थानों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। आखिरकार, किसी संस्थान की सफलता का आकलन केवल वहां से मिलने वाली डिग्री या नौकरी से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि संकट के समय वह अपने छात्रों को कितनी प्रभावी सहायता दे पाता है।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट

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