SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को बड़ा नोटिस, कहा- रोक देंगे फैसला

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने SIR विवाद में CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से इनकार किया, लेकिन चुनाव आयोग और केंद्र से जवाब मांगा है।

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को अहम सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि SIR से जुड़े करीब 14 महत्वपूर्ण फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए। इसी आधार पर CEC ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने और कथित तौर पर लिए गए फैसलों पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार के निलंबन का अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। इसके बजाय कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC ज्ञानेश कुमार और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों समेत संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जारी किया नोटिस?

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि केवल मीडिया रिपोर्ट या आरोपों के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सभी फैसले एकतरफा लिए गए थे। अदालत ने चुनाव आयोग से साफ और पारदर्शी जवाब मांगा है।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है और कानून में निर्णय लेने की प्रक्रिया निर्धारित है। अगर रिकॉर्ड की जांच के बाद यह सामने आता है कि किसी फैसले में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो अदालत उस फैसले पर रोक लगाने या उसे कानून के अधिकार से बाहर घोषित करने पर विचार कर सकती है।

SIR विवाद में 14 फैसलों पर क्यों उठे सवाल?

पूरे विवाद की जड़ उन आरोपों में है जिनके मुताबिक SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसलों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्तियां दर्ज की थीं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच ऐसे करीब 14 मामलों में आपत्तियां सामने आईं।

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याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन आपत्तियों के बावजूद फैसले चुनाव आयोग के नाम से लिए गए। इसी को लेकर यह सवाल उठाया गया कि क्या CEC अकेले ऐसे फैसले ले सकते हैं या फिर आयोग के सभी सदस्यों की निर्धारित प्रक्रिया के तहत भागीदारी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या बोले याचिकाकर्ता?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की शक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उन्होंने 2023 में बने कानून का हवाला देते हुए कहा कि CEC और चुनाव आयुक्तों को दी गई कानूनी सुरक्षा के कारण संस्था की जवाबदेही को लेकर नए सवाल पैदा हुए हैं।

वकील ने अदालत से मांग की कि जब तक मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक CEC को अपने पद पर काम करने से रोका जाए। उन्होंने यह भी कहा कि SIR से जुड़े विवादित फैसलों का पूरा रिकॉर्ड अदालत के सामने लाया जाना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कानून का पालन जरूरी

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने साफ संकेत दिया कि चुनाव आयोग को कानून के मुताबिक काम करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि यदि जांच के बाद कानून का उल्लंघन सामने आता है तो कोर्ट उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।

यानी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि CEC ने वास्तव में नियमों का उल्लंघन किया है। अदालत का अगला कदम चुनाव आयोग और दूसरे संबंधित पक्षों के जवाब तथा उपलब्ध रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।

क्या सुप्रीम कोर्ट CEC के फैसले पलट सकता है?

यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पूछा गया कि अगर किसी निर्णय को निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना लिया गया पाया गया तो अदालत क्या कर सकती है।

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सुनवाई के दौरान संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि कोई निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नहीं लिया गया था, तो अदालत उस निर्णय पर रोक लगा सकती है या उसे अधिकार-विहीन घोषित कर सकती है। लेकिन अदालत बिना रिकॉर्ड देखे यह मानने को तैयार नहीं थी कि सभी फैसले एकतरफा लिए गए।

CEC को तुरंत सस्पेंड क्यों नहीं किया गया?

याचिकाकर्ता ने CEC को तत्काल निलंबित करने की मांग की थी। इस पर अदालत ने व्यावहारिक सवाल भी उठाया कि यदि CEC को निलंबित कर दिया जाता है तो चुनाव आयोग का कामकाज और चुनाव कराने की प्रक्रिया कैसे चलेगी।

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याचिकाकर्ता की ओर से जवाब दिया गया कि बाकी दो चुनाव आयुक्त चुनावी जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं। इसके बावजूद अदालत ने पहले संबंधित पक्षों को सुनना जरूरी माना। इससे स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर सीधे हस्तक्षेप करने से पहले रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति को पूरी तरह समझना चाहता है।

SIR विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

मामला मीडिया रिपोर्टों के सामने आने के बाद ज्यादा चर्चा में आया। रिपोर्टों में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया था। इसके बाद CEC के खिलाफ याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

हालांकि चुनाव आयोग का रुख यह रहा है कि SIR से जुड़े निर्णयों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को उनके वास्तविक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इससे पहले आयोग ने भी कहा था कि फैसले निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं।

2023 का कानून भी क्यों चर्चा में है?

सुनवाई के दौरान 2023 में बने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से संबंधित कानून का भी उल्लेख हुआ। याचिकाकर्ताओं ने खास तौर पर उस प्रावधान पर सवाल उठाया जिसमें आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कार्यों को कानूनी सुरक्षा दी गई है।

दलील यह है कि ऐसी सुरक्षा और चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के बीच संतुलन जरूरी है। दूसरी ओर, किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई का फैसला भी बेहद गंभीर माना जाता है। इसलिए अदालत ने फिलहाल दोनों पक्षों को सुनने का रास्ता चुना है।

विपक्ष की मांगों से भी बढ़ा विवाद

SIR को लेकर राजनीतिक विवाद भी लगातार तेज रहा है। विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते रहे हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर चुके हैं। वहीं, केंद्र और चुनाव आयोग की ओर से इस पूरे विवाद पर अलग रुख सामने आया है।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित नहीं किया है। अदालत ने केंद्र, चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब अगली सुनवाई में यह देखा जाएगा कि चुनाव आयोग 14 कथित फैसलों और निर्णय प्रक्रिया को लेकर अदालत के सामने क्या रिकॉर्ड और स्पष्टीकरण रखता है।

अगर रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि किसी फैसले में कानून की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो सुप्रीम कोर्ट उस फैसले पर रोक लगाने या उसे रद्द करने जैसे कदम पर विचार कर सकता है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि SIR के सभी विवादित फैसले रद्द हो जाएंगे या CEC के खिलाफ कोई अंतिम कार्रवाई होगी।

मामले ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, CEC की शक्तियों और मतदाता सूची के SIR को लेकर देश की राजनीतिक और कानूनी बहस को और तेज कर दिया है। आने वाली सुनवाई में चुनाव आयोग का जवाब इस पूरे विवाद की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

Nishkarsh Bharat

राज कुमार की रिपोर्ट