अमेरिका में ट्रम्प को बड़ा झटका, दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का कब्जा

ट्रम्प

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को चुनौती मिली है। सीनेट और हाउस में डेमोक्रेट्स की बढ़त से बदले राजनीतिक समीकरण।

निष्कर्ष भारत, संवाददाता (नई दिल्ली)। अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। चुनावी नतीजों को लेकर सामने आ रहे दावों के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में अपनी स्थिति मजबूत की है। यदि दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का बहुमत स्थापित होता है, तो ट्रम्प प्रशासन के लिए अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान नहीं होगा।

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के बीच होते हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी सीटों और सीनेट की कुछ सीटों पर मतदान कराया जाता है। इन नतीजों को राष्ट्रपति की लोकप्रियता और सरकार के कामकाज पर जनता की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।

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इस चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की संभावित बढ़त ने अमेरिकी राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। हालांकि, अंतिम सीटों की स्थिति और बहुमत की आधिकारिक पुष्टि के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।

ट्रम्प को क्यों माना जा रहा है बड़ा राजनीतिक झटका?

अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए संसद के दोनों सदनों में अपनी पार्टी का बहुमत होना नीतिगत फैसलों को लागू करने में काफी मददगार होता है। लेकिन यदि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी दोनों सदनों पर नियंत्रण हासिल कर लेती है, तो ट्रम्प के लिए कानून बनाने और सरकारी योजनाओं को मंजूरी दिलाने में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

राष्ट्रपति के कई बड़े फैसलों को संसद की मंजूरी की जरूरत होती है। ऐसे में विपक्ष के पास बहुमत होने पर रिपब्लिकन पार्टी के प्रस्तावों का विरोध किया जा सकता है। बजट, सरकारी खर्च, नई नीतियों और नियुक्तियों जैसे मुद्दों पर भी राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना रहती है।

इसके अलावा डेमोक्रेट्स को संसदीय समितियों के माध्यम से सरकार के फैसलों की जांच करने और प्रशासन से जवाब मांगने का अधिक अवसर मिल सकता है।

मिशिगन में अब्दुल अल-सैयद की जीत का दावा चर्चा में

इस चुनाव से जुड़ी सबसे चर्चित खबर मिशिगन से अब्दुल अल-सैयद की कथित जीत को लेकर है। दिए गए चुनावी विवरण के अनुसार, डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अल-सैयद ने रिपब्लिकन प्रत्याशी माइक रोजर्स को हराया है।

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इस जीत को अमेरिकी राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। दावा किया गया है कि अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले देश के पहले मुस्लिम बन गए हैं।

हालांकि, इस ऐतिहासिक दावे की आधिकारिक पुष्टि और चुनाव आयोग के नतीजों का सत्यापन जरूरी है। किसी उम्मीदवार की जीत केवल शुरुआती रुझानों या राजनीतिक दावों के आधार पर अंतिम नहीं मानी जा सकती।

ट्रम्प ने अब्दुल अल-सैयद को लेकर क्या कहा था?

चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रम्प और अब्दुल अल-सैयद के बीच राजनीतिक टकराव की बात भी सामने आई थी। दिए गए विवरण के मुताबिक, 25 अक्टूबर को मिशिगन के पोर्ट ह्यूरॉन में आयोजित एक रैली में ट्रम्प ने अल-सैयद पर तीखी टिप्पणी की थी।

ट्रम्प ने कथित तौर पर उन्हें ‘जिहादी’ और मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि वह अल-सैयद को अमेरिकी सीनेटर बनने से रोकने के लिए मिशिगन आए हैं।

अपने भाषण में ट्रम्प ने 9/11 आतंकी हमले का जिक्र करते हुए अल-सैयद को अमेरिकी सुरक्षा के लिए खतरा बताने की कोशिश की थी।

दूसरी ओर, अल-सैयद ने मुस्लिम ब्रदरहुड से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया था। उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के समर्थन में प्रमाण सामने आने की पुष्टि नहीं हुई है।

हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट्स की स्थिति

अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कुल 435 सीटें हैं। हर दो साल में इस सदन की सभी सीटों पर चुनाव होता है। इसलिए मिडटर्म चुनाव में इसका नियंत्रण बदलना राष्ट्रपति की राजनीतिक स्थिति पर सीधा असर डाल सकता है।

बहुमत हासिल करने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 218 सीटों की जरूरत होती है, बशर्ते सदन की सभी सीटें भरी हों। चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की बढ़त का दावा सामने आने के बाद रिपब्लिकन पार्टी के सामने सदन में अपना नियंत्रण बचाने की चुनौती खड़ी हुई है।

यदि डेमोक्रेट्स को स्पष्ट बहुमत मिलता है, तो वे सदन के स्पीकर और महत्वपूर्ण संसदीय समितियों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। इससे ट्रम्प प्रशासन की नीतियों पर निगरानी और सवाल-जवाब की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

सीनेट में ट्रम्प की पार्टी के सामने चुनौती

अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट में कुल 100 सीटें होती हैं। इनमें से हर दो साल में लगभग एक तिहाई सीटों पर चुनाव कराया जाता है। इस बार 35 सीटों पर मतदान होने की जानकारी दी गई है।

चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के पास 53 सीटें थीं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें थीं। ऐसे में बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को कई महत्वपूर्ण सीटों पर जीत दर्ज करनी थी।

सीनेट में बहुमत का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहां राष्ट्रपति की ओर से की जाने वाली कई महत्वपूर्ण नियुक्तियों को मंजूरी दी जाती है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय समझौतों और न्यायिक नियुक्तियों जैसे मामलों में भी सीनेट की अहम भूमिका होती है।

ट्रम्प के लिए आगे क्यों बढ़ सकती हैं मुश्किलें?

यदि डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेते हैं, तो ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल का राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। राष्ट्रपति के लिए अपने चुनावी वादों को पूरा करने और नई नीतियों को लागू करने में विपक्ष की सहमति हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

बजट और सरकारी खर्च से जुड़े प्रस्तावों पर भी दोनों पार्टियों के बीच टकराव बढ़ सकता है। इसके अलावा डेमोक्रेटिक पार्टी प्रशासनिक फैसलों की जांच के लिए संसदीय समितियों का इस्तेमाल कर सकती है।

हालांकि, अमेरिकी व्यवस्था में राष्ट्रपति के पास कई संवैधानिक अधिकार होते हैं। इसलिए संसद में विपक्ष का बहुमत होने का मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति अपने सभी फैसले लेने में असमर्थ हो जाएंगे। लेकिन विधायी प्रक्रिया में विपक्ष की भूमिका निश्चित रूप से बढ़ जाएगी।

अमेरिकी राजनीति में मिडटर्म चुनाव का क्या है महत्व?

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव केवल सांसदों को चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की राय के रूप में भी देखा जाता है। आमतौर पर इन चुनावों में मतदाता सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदर्शन, महंगाई, रोजगार, विदेश नीति और सामाजिक मुद्दों को ध्यान में रखते हैं।

इन नतीजों से राष्ट्रपति के कार्यकाल के बाकी दो वर्षों की राजनीतिक दिशा तय होती है। यदि विपक्ष को बहुमत मिलता है, तो राष्ट्रपति को संसद में अधिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

फिलहाल अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों और दोनों सदनों में बहुमत की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर है। अंतिम आधिकारिक आंकड़े सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि ट्रम्प प्रशासन को संसद में कितनी बड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

Nishkarsh Bharat

राजकुमार सिंह की रिपोर्ट