बिहार में सत्ता परिवर्तन: सम्राट चौधरी बने 21वें मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार युग का अंत

सम्राट चौधरी

बिहार की राजनीति में बुधवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब वरिष्ठ बीजेपी नेता सम्राट चौधरी ने राज्य के 21वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

बिहार की राजनीति में बुधवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब वरिष्ठ बीजेपी नेता सम्राट चौधरी ने राज्य के 21वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह शपथ ग्रहण समारोह राजभवन में आयोजित हुआ, जहां राज्यपाल सईद अता हसनैन ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस मौके पर बीजेपी के शीर्ष नेता और सहयोगी दलों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार में पहली बार बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनी है। इसे राज्य की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।

नीतीश कुमार युग का अंत

इस सत्ता परिवर्तन के साथ ही नीतीश कुमार के लगभग दो दशक लंबे राजनीतिक वर्चस्व का अंत हो गया। नीतीश कुमार ने 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। वे 2005 से लेकर अब तक कई बार मुख्यमंत्री रहे और राज्य की राजनीति के केंद्र में बने रहे।

“सुशासन बाबू” के नाम से मशहूर नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में कानून-व्यवस्था सुधार, बुनियादी ढांचे के विकास और सामाजिक योजनाओं के जरिए खास पहचान बनाई। हालांकि, उनके लगातार बदलते राजनीतिक गठबंधन को लेकर उन्हें आलोचना का भी सामना करना पड़ा।

सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर

57 वर्षीय सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने 2017 में बीजेपी जॉइन की थी और उसके बाद तेजी से पार्टी में उभरे। वे राज्य अध्यक्ष से लेकर उपमुख्यमंत्री तक का सफर तय कर चुके हैं।

मुख्यमंत्री बनने से पहले वे बिहार के उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं, जिससे प्रशासनिक अनुभव में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।

उनका राजनीतिक करियर 1999 में शुरू हुआ था, जब उन्हें राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बनाया गया था। हालांकि, उम्र संबंधी विवाद के कारण उनका कार्यकाल जल्द ही समाप्त हो गया। इसके बाद उन्होंने 2000 में चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की और आगे चलकर आरजेडी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जातीय समीकरण में बड़ा संदेश

सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बिहार की जातीय राजनीति के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है। वे कोइरी (कुशवाहा) समुदाय से आते हैं और इस समुदाय से मुख्यमंत्री बनने वाले दूसरे नेता हैं। इससे पहले सतीश प्रसाद सिंह 1968 में कुछ दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला राज्य के ओबीसी वोट बैंक को साधने की रणनीति का हिस्सा है।

बीजेपी के लिए ऐतिहासिक क्षण

बिहार में 243 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी 89 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बावजूद अब तक पार्टी सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पद पर काबिज नहीं हो पाई थी। सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री बनना बीजेपी के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का समर्थन भी चौधरी के राजनीतिक कद को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता रहा है।

NDA में बदली समीकरण

दिलचस्प बात यह है कि सम्राट चौधरी कभी नीतीश कुमार के मुखर आलोचक रहे, लेकिन बाद में वे एनडीए में उनके करीबी सहयोगी बन गए। उन्होंने एक समय यह संकल्प लिया था कि वे अपनी पगड़ी तब तक नहीं उतारेंगे जब तक नीतीश कुमार को सत्ता से बाहर नहीं कर देते—अब उनका यह संकल्प राजनीतिक रूप से पूरा होता नजर आ रहा है।

आगे की चुनौतियां

मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी—जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था को बेहतर बनाना। साथ ही, उन्हें गठबंधन की राजनीति को संतुलित रखते हुए विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाना होगा।

बिहार में यह सत्ता परिवर्तन सिर्फ नेतृत्व का बदलाव नहीं, बल्कि एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत है। जहां एक ओर नीतीश कुमार का लंबा युग समाप्त हुआ है, वहीं दूसरी ओर सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी के लिए नई संभावनाओं का द्वार खुल गया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बदलाव राज्य की राजनीति और विकास पर कितना असर डालता है।

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