21 साल जेल में बिताने के बाद बाइज्जत बरी हुआ शख्स, पटना हाईकोर्ट ने पुलिस और सिस्टम की लापरवाही पर उठाए सवाल
21 साल जेल में रहने के बाद पटना हाईकोर्ट ने रंजीत कुमार झा को बाइज्जत बरी किया, पुलिस जांच और सिस्टम की लापरवाही पर उठे गंभीर सवाल।
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। हत्या के एक मामले में करीब 21 वर्षों तक जेल में रहने के बाद रंजीत कुमार झा को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस जांच, कानूनी सहायता व्यवस्था और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले में सामने आई कई खामियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया में गंभीर कमियां रहीं। अदालत ने जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कर कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही रंजीत कुमार झा के इलाज और पुनर्वास को लेकर बिहार सरकार को आवश्यक व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है।
क्या है 26 साल पुराना हत्या का मामला?
मामला समस्तीपुर जिले के मुसरीघरारी थाना क्षेत्र का है। 5 अक्टूबर 2000 को पवन कुमार झा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रंजीत कुमार झा पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने करीब 3,300 रुपये की चोरी से जुड़े विवाद को लेकर अपने साथियों के साथ मिलकर हत्या की वारदात को अंजाम दिया।
पुलिस जांच के बाद मामले में रंजीत कुमार झा को आरोपी बनाया गया और लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद वर्ष 2009 में समस्तीपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी।

इसके बाद रंजीत कुमार झा लंबे समय तक जेल में रहे। आर्थिक परेशानियों और कानूनी सहायता के अभाव के कारण वह समय पर हाईकोर्ट में अपनी अपील भी दाखिल नहीं कर सके। आखिरकार मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा, जहां सुनवाई के बाद उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया गया।
टॉर्च की रोशनी में पहचान पर कोर्ट ने उठाए सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जांच में कई गंभीर कमियों का उल्लेख किया। चश्मदीद गवाहों की ओर से आरोपी की पहचान टॉर्च की रोशनी में किए जाने का दावा किया गया था। लेकिन अदालत ने पाया कि पुलिस ने उस टॉर्च को जांच के दौरान जब्त तक नहीं किया।
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अदालत ने गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास का उल्लेख किया। सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि मुख्य गवाहों और आरोपी के बीच पहले से विवाद या आपसी रंजिश की स्थिति थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने साक्ष्यों और पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने माना कि मामले की जांच और सबूतों की पड़ताल में आवश्यक सावधानी नहीं बरती गई।
FIR की प्रति भेजने में हुई देरी
मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद उसकी प्रति संबंधित अदालत तक पहुंचाने में भी देरी का मुद्दा सुनवाई के दौरान सामने आया। जानकारी के अनुसार, एफआईआर की प्रति कोर्ट भेजने में करीब चार दिनों की देरी हुई थी।
हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया में इस देरी और अन्य खामियों को भी गंभीरता से लिया। अदालत ने पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी आपराधिक मामले की जांच में प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन बेहद जरूरी है।
एक व्यक्ति के खिलाफ गंभीर अपराध का मामला दर्ज होने के बाद निष्पक्ष जांच और ठोस साक्ष्य न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। ऐसे मामलों में जांच की खामियां किसी व्यक्ति के जीवन पर लंबे समय तक असर डाल सकती हैं।
16.5 साल तक नहीं कर सके अपील
रंजीत कुमार झा के मामले में कानूनी सहायता व्यवस्था पर भी सवाल उठे। बताया गया कि आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वह करीब 16.5 वर्षों तक हाईकोर्ट में अपनी अपील दाखिल नहीं कर सके।
हाईकोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और जेल प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि जेल में बंद ऐसे कैदियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था प्रभावी तरीके से काम करनी चाहिए।
किसी कैदी की आर्थिक स्थिति उसके न्याय पाने के अधिकार में बाधा नहीं बननी चाहिए। इस मामले में लंबे समय तक अपील दाखिल नहीं हो पाना भी व्यवस्था की गंभीर कमी के रूप में सामने आया।
लंबे कारावास के दौरान मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा असर
करीब दो दशक तक जेल में रहने के दौरान रंजीत कुमार झा के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि लंबे कारावास के कारण वह मानसिक रूप से बीमार हो गए।
हाईकोर्ट ने बिहार सरकार को उनके मानसिक स्वास्थ्य के इलाज की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है। अदालत ने सरकारी खर्च पर उचित इलाज कराने और उनके पुनर्वास के लिए भी योजना तैयार करने को कहा।
कोर्ट ने कहा कि जेल से रिहा होने के बाद लंबे समय तक कारावास झेल चुके व्यक्ति को सामान्य जीवन में वापस आने के लिए आवश्यक सहायता मिलनी चाहिए।
रिमिशन बोर्ड की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
मामले में रंजीत कुमार झा की समय से पहले रिहाई से जुड़ा मुद्दा भी सामने आया। जानकारी के अनुसार, 14 साल की वास्तविक सजा और छूट की अवधि मिलाकर करीब 20 साल की अवधि पूरी होने के बाद भी उनके मामले में रिमिशन बोर्ड का फैसला लंबे समय तक लंबित रहा।
हाईकोर्ट ने इस देरी को भी गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के तहत समय पर निर्णय होना जरूरी है।
लंबे समय तक किसी कैदी के रिहाई प्रस्ताव को लंबित रखने से उसके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। अदालत की टिप्पणियों के बाद अब संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
DGP को जांच और कार्रवाई का निर्देश
पटना हाईकोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक को मामले में जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई करने और निर्धारित समय के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।
अदालत ने मामले में पुलिस जांच की खामियों को गंभीरता से लेते हुए जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में किस स्तर पर लापरवाही हुई और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
वकील को 25 हजार रुपये मानदेय देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने मामले की पैरवी करने वाले अधिवक्ता अनिल सिंह को भी 25 हजार रुपये मानदेय देने का निर्देश दिया है। यह राशि पटना हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के माध्यम से दिए जाने की बात कही गई है।
अदालत ने मामले में कानूनी सहायता की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना और लंबे समय तक न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े रहे इस मामले में आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।
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21 साल बाद मिली आजादी, सिस्टम पर खड़े हुए सवाल
रंजीत कुमार झा की रिहाई का मामला केवल एक व्यक्ति के बाइज्जत बरी होने तक सीमित नहीं है। इस फैसले ने पुलिस जांच, गवाहों के बयानों की विश्वसनीयता, कानूनी सहायता, जेल प्रशासन और रिमिशन प्रक्रिया जैसे कई मुद्दों पर सवाल खड़े किए हैं।

करीब 21 वर्षों तक जेल में रहने के बाद बरी हुए रंजीत कुमार झा के मामले में अब जिम्मेदार अधिकारियों की जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया पर नजर रहेगी। वहीं, हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार उनके इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था भी की जानी है।
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि जांच और कानूनी सहायता व्यवस्था में गंभीर लापरवाही हो, तो उसकी कीमत किसी व्यक्ति को अपने जीवन के कई साल गंवाकर चुकानी पड़ सकती है।
पटना से कीमती कुमारी का रिपोर्ट
