सुप्रीम कोर्ट ने SIR को ठहराया वैध, कहा- निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी; चुनाव आयोग को दिए अहम निर्देश
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया।
देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। चीफ जस्टिस Surya Kant की अगुआई वाली बेंच ने SIR प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार देते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि SIR कोई मनमाना कदम नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराना है। कोर्ट ने यह भी माना कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी दायरे में है और इसे सिर्फ इसलिए अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सामान्य पुनरीक्षण प्रक्रिया से अलग है।
हालांकि अदालत ने चुनाव आयोग को यह निर्देश भी दिया कि जिन लोगों के नाम संदिग्ध नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार हफ्ते के भीतर संबंधित सरकारी एजेंसियों को भेजा जाए ताकि उनकी नागरिकता पर उचित फैसला लिया जा सके।
बिहार से शुरू हुई थी SIR प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने जून 2025 में सबसे पहले बिहार में SIR प्रक्रिया शुरू की थी। उस समय बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक थे और आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट और शुद्ध करने के उद्देश्य से यह अभियान चलाया था।
बिहार के बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में भी SIR लागू किया गया। वहीं असम में स्पेशल रिवीजन (SR) प्रक्रिया अपनाई गई थी।

इन राज्यों में करोड़ों मतदाताओं के नामों की जांच हुई और बड़ी संख्या में नाम मतदाता सूची से हटाए गए। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अब तक 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR या इसी तरह की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया लागू की जा चुकी है और लगभग 7.41 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
दिल्ली में भी 30 जून से SIR प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, जिसके चलते इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में 10 महीने चली सुनवाई
SIR प्रक्रिया के खिलाफ कई राज्यों से सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। सबसे पहले बिहार SIR को चुनौती दी गई थी। इसके बाद अन्य राज्यों से भी याचिकाएं पहुंचीं।
करीब 10 महीने तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पांच अहम सवाल तय किए और उन्हीं के आधार पर अपना फैसला सुनाया।
सवाल 1: क्या चुनाव आयोग के पास SIR करने की शक्ति है?
इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम नहीं किया है। अदालत ने माना कि संविधान और चुनावी कानून आयोग को मतदाता सूची को सही रखने के लिए विशेष कदम उठाने का अधिकार देते हैं।
कोर्ट ने कहा कि SIR का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को कमजोर करना नहीं बल्कि उसे अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना है।
सवाल 2: क्या SIR का उद्देश्य वैध है?
अदालत ने कहा कि SIR की प्रक्रिया संतुलित और उचित है। इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं दिखाई देती।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मतदाता सूची को शुद्ध और अपडेट रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग द्वारा उठाए गए कदम जरूरत से ज्यादा सख्त नहीं हैं और इन्हें अवैध नहीं कहा जा सकता।
सवाल 3: क्या SIR जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ है?
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि SIR प्रक्रिया ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (Representation of the People Act) और उससे जुड़े नियमों के खिलाफ है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि SIR कानूनी और संवैधानिक रूप से वैध है, इसलिए इसे RP Act का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने का अधिकार है।
सवाल 4: क्या चुनाव आयोग दस्तावेज मांग सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर भी चुनाव आयोग के अधिकार को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेजों को मनमाना नहीं कहा जा सकता।
आधार कार्ड समेत 11 प्रकार के दस्तावेजों को मान्य माना गया है। अदालत ने यह भी कहा कि बिना किसी तय प्रक्रिया या नियम के दस्तावेजों की जांच करना गलत होगा, इसलिए दिशा-निर्देशों के तहत दस्तावेज मांगना उचित है।
सवाल 5: जिनके नाम कटे, उनका क्या होगा?
यह इस मामले का सबसे संवेदनशील सवाल माना जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनके मामलों को चुनाव आयोग चार हफ्ते के भीतर संबंधित सरकारी एजेंसियों को भेजे।
संबंधित एजेंसी को उन लोगों को नोटिस देना होगा, उन्हें अपनी बात रखने का अवसर देना होगा और चुनाव से पहले अंतिम फैसला लेना होगा।
इस निर्देश को उन लोगों के लिए राहत माना जा रहा है जिनके नाम सूची से हट गए थे और जो खुद को भारतीय नागरिक बताते हैं।
विपक्ष ने उठाए गंभीर सवाल
SIR प्रक्रिया को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए लाखों लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है।
विपक्ष का कहना है कि बिहार में 2003 के बाद कई चुनाव हो चुके हैं। अगर अब मतदाता सूची पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो क्या पिछले सभी चुनाव गलत थे?
विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि अगर चुनाव आयोग को SIR कराना ही था तो इसे बिहार चुनाव से ठीक पहले जल्दबाजी में क्यों लागू किया गया। उनका तर्क है कि यह प्रक्रिया चुनाव के बाद भी कराई जा सकती थी।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग लगातार यह कहता रहा है कि SIR का मकसद फर्जी वोटिंग रोकना और मतदाता सूची को अपडेट रखना है। आयोग का दावा है कि बड़ी संख्या में मृत, स्थानांतरित या संदिग्ध नाम वोटर लिस्ट में बने रहते हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होती है।
आयोग का कहना है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि मतदाता सूची पूरी तरह शुद्ध और प्रमाणिक हो।
फैसले के राजनीतिक मायने
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी कानूनी जीत माना जा रहा है। आने वाले समय में कई राज्यों में चुनाव होने हैं और ऐसे में SIR प्रक्रिया को संवैधानिक मान्यता मिलने से आयोग को आगे भी इस तरह के विशेष पुनरीक्षण अभियान चलाने में मजबूती मिलेगी।
वहीं विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर जनता के बीच उठाने की तैयारी में है। दिल्ली समेत जिन राज्यों में आने वाले महीनों में SIR लागू होना है, वहां इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
पटना से भूमि आर्या की रिपोर्ट
