जमुई कांड में पीड़िता की फोटो जारी होने पर बवाल, 120 पर FIR पर नया विवाद, अगर उन पर कार्रवाई…तो CM पर क्यों नहीं?
जमुई कांड में पीड़िता की फोटो पर सवाल, 120 अकाउंट पर FIR
निष्कर्ष भारत, संवाददाता (पटना)। जमुई कांड को लेकर पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हुए प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई भी हुई आरोपी का एनकाउंटर भी हुआ लेकिन गुरुवार देर रात को मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया अकाउंट से जारी एक फोटो ने बिहार की राजनीति में नया बवाल खड़ा कर दिया है। बता दे कि गुरुवार को सम्राट चौधरी ने जमुई कांड की पीड़िता और उनके परिवार से मुलाकात की और उन्हें कार्रवाई का आश्वासन दिलाया। उसके बाद मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल से एक तस्वीर जारी की गई।
तस्वीर में जमुई कांड की पीड़िता और उनके परिजनों के साथ मुलाकात की गई हालांकि इस तस्वीर के जारी होने के बाद 15 मिनट में इस तस्वीर को हटा दिया गया। तो आखिर माजरा क्या है दरअसल, बिहार पुलिस ने 120 सोशल मीडिया अकाउंट्स पर प्राथमिक दर्ज की है जिन्होंने जमुई कांड की वीडियो और फोटो को अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया।
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बिहार पुलिस के द्वारा जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि जमुई कांड को लेकर तस्वीर और वीडियो को जारी न किया जाए यह भारतीय दंड संहिता के अनुसार एक एक दंडनीय अपराध है और इसमें 2 साल तक की सजा का प्रावधान है लेकिन अब सवाल उठता है कि सम्राट चौधरी पर कार्रवाई कौन करेगा।
जमुई कांड में 120 सोशल मीडिया अकाउंट पर FIR
जमुई मामले में वायरल वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मुख्य घटना में आरोपियों की तलाश के साथ सोशल मीडिया पर वीडियो प्रसारित करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की। पुलिस के अनुसार करीब 120 सोशल मीडिया अकाउंट संचालकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। आरोप है कि इन अकाउंट्स से ऐसी सामग्री प्रसारित की गई, जिससे नाबालिग पीड़िता की पहचान सामने आ सकती थी।
पुलिस ने लोगों से अपील की है कि नाबालिग पीड़ितों से संबंधित वीडियो, फोटो या ऐसी कोई सामग्री डाउनलोड करके दोबारा शेयर या पोस्ट न करें, जिससे उनकी पहचान सामने आए। इस कार्रवाई का आधार पीड़िता की निजता और कानूनी रूप से संरक्षित पहचान को लेकर है।
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जमुई मामले में अब फोटो को लेकर क्यों उठा सवाल?
विवाद उस समय बढ़ा जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की पीड़ित परिवार से मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर सामने आई और बाद में हटा दी गई। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी पीड़ित परिवार से मुख्यमंत्री का मिलना या परिवार के सदस्यों के साथ तस्वीर खिंचवाना अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है।
असल सवाल तस्वीर के प्रकाशन के प्रभाव को लेकर है। यदि तस्वीर में पीड़िता स्वयं दिखाई देती है, या तस्वीर और पोस्ट में दी गई जानकारी को जोड़कर उसकी पहचान आसानी से स्थापित की जा सकती है, तो कानूनी स्थिति अलग हो सकती है। वहीं यदि तस्वीर में केवल परिजन हैं और उससे नाबालिग की पहचान स्थापित नहीं होती, तो केवल तस्वीर के आधार पर अपराध तय नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि इस मामले में अंतिम कानूनी निष्कर्ष जांच करने वाली एजेंसी या सक्षम अदालत के स्तर पर ही निकाला जा सकता है।
BNS धारा 72 में पहचान उजागर करने पर क्या प्रावधान है?
भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 72 यौन अपराधों के कुछ मामलों में पीड़ित की पहचान प्रकाशित करने से संबंधित है। प्रावधान के तहत ऐसी जानकारी प्रकाशित करना अपराध हो सकता है, जिससे संबंधित पीड़ित की पहचान सामने आती हो। इसके लिए दो वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। कानून में जांच के उद्देश्य से अधिकृत पुलिस प्रकाशन तथा कुछ निर्धारित परिस्थितियों में लिखित अनुमति जैसे अपवाद भी मौजूद हैं।
इसलिए किसी तस्वीर को देखकर सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कानून का उल्लंघन हुआ है। यह देखना जरूरी होगा कि तस्वीर में क्या दिखाई दे रहा था, पोस्ट के साथ क्या जानकारी दी गई थी और उससे पीड़िता की पहचान कितनी आसानी से स्थापित हो सकती थी।
POCSO धारा 23 में नाबालिग की पहचान की सुरक्षा
जमुई मामले में पीड़िता नाबालिग होने के कारण POCSO Act की धारा 23 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस धारा में मीडिया रिपोर्ट के माध्यम से बच्चे की पहचान उजागर करने पर रोक है। इसमें नाम, पता, फोटो, परिवार की जानकारी, स्कूल, पड़ोस या ऐसी कोई अन्य जानकारी शामिल है, जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती है।
POCSO कानून में सीमित अपवाद भी है। विशेष अदालत लिखित कारण दर्ज करते हुए, यदि बच्चे के हित में आवश्यक समझे, तो पहचान से संबंधित जानकारी के प्रकटीकरण की अनुमति दे सकती है। सामान्य तौर पर बच्चे की पहचान की सुरक्षा को कानून में विशेष महत्व दिया गया है।
जमुई मामले में पुलिस की कार्रवाई का आधार क्या है?
पुलिस की कार्रवाई केवल वीडियो वायरल होने तक सीमित नहीं रही। मुख्य घटना में शामिल लोगों की पहचान और गिरफ्तारी के साथ-साथ उन सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी जांच शुरू की गई, जिन्होंने कथित तौर पर पीड़िता की पहचान सामने लाने वाली सामग्री प्रसारित की।
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रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस ने अलग से साइबर स्तर पर भी कार्रवाई की और सोशल मीडिया प्रोफाइल की जांच की। कुछ रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि कई अकाउंट्स से संबंधित सामग्री हटाई गई।
पुलिस की इस कार्रवाई के बाद अब बहस यह है कि सोशल मीडिया पर पहचान छिपाने की जिम्मेदारी केवल आम यूजर की है या सार्वजनिक संस्थानों और राजनीतिक पदों से जुड़े सोशल मीडिया हैंडल भी उसी कानूनी सावधानी के दायरे में आते हैं।
क्या मुख्यमंत्री की तस्वीर पर FIR होगी?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि मुख्यमंत्री की तस्वीर कानून का उल्लंघन है या उनके खिलाफ FIR होनी चाहिए। इसके लिए यह स्थापित करना जरूरी होगा कि पोस्ट में दिखाई गई सामग्री से नाबालिग की पहचान वास्तव में उजागर हुई या नहीं और यदि हुई तो क्या कानून में उपलब्ध कोई अपवाद लागू था।
कानून में किसी व्यक्ति की राजनीतिक या संवैधानिक स्थिति के आधार पर अलग पहचान-सुरक्षा नियम नहीं लिखे गए हैं। लेकिन किसी विशेष पोस्ट के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का सवाल तथ्यों, सामग्री और लागू कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करता है।

यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है। 120 अकाउंट्स के खिलाफ दर्ज मामलों और मुख्यमंत्री से जुड़ी तस्वीर को एक ही नजर से देखने के बजाय दोनों मामलों में प्रकाशित सामग्री और उससे होने वाले पहचान-प्रकटीकरण की स्थिति की जांच जरूरी होगी।
जमुई कांड में कार्रवाई और राजनीति दोनों जारी
जमुई की मूल घटना में नाबालिग छात्रा और उसके साथ मौजूद एक नाबालिग छात्र के साथ कथित बदसलूकी का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने केस दर्ज किया था। पुलिस ने वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान की और गिरफ्तारियां कीं। मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस कार्रवाई के दौरान पैर में गोली लगने से घायल हुआ था। मामले की जांच आगे भी जारी है।
घटना के बाद राजनीतिक दलों की ओर से भी सरकार और कानून-व्यवस्था को लेकर बयान सामने आए हैं। वहीं सरकार की ओर से पुलिस कार्रवाई और आरोपियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही गई है। इस बीच सोशल मीडिया पर पीड़िता की पहचान को लेकर हुई कार्रवाई ने मामले को एक अलग कानूनी बहस से जोड़ दिया है।
अब तस्वीर से आगे बड़ा सवाल निजता का???
जमुई कांड में पीड़िता की फोटो को लेकर उठे सवाल का मूल मुद्दा किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। मामला नाबालिग पीड़िता की पहचान और उसकी निजता की कानूनी सुरक्षा से जुड़ा है।
यदि किसी पोस्ट से पहचान उजागर होती है, तो उसके लिए कानून में प्रावधान मौजूद हैं। वहीं किसी पोस्ट में परिवार की तस्वीर दिखाई देने मात्र से कानून का उल्लंघन तय नहीं हो जाता। इसलिए इस विवाद में अंतिम निष्कर्ष से पहले तस्वीर, पोस्ट की सामग्री और उससे पहचान स्थापित होने की वास्तविक स्थिति को देखना जरूरी है।
जमुई मामले में पुलिस पहले ही सोशल मीडिया यूजर्स को चेतावनी दे चुकी है कि नाबालिग पीड़ित की पहचान उजागर करने वाली सामग्री साझा न करें। अब मुख्यमंत्री के सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर उठे सवालों पर भी स्थिति तभी स्पष्ट होगी, जब संबंधित अधिकारी यह बताएंगे कि तस्वीर में पीड़िता की पहचान किस तरह सुरक्षित रखी गई और पोस्ट हटाने की वजह क्या थी।
कानून की विश्वसनीयता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि नाबालिग पीड़िता की निजता की रक्षा हो और किसी भी मामले में कानूनी कार्रवाई तथ्य और लागू कानून के आधार पर हो।
राज कुमार की रिपोर्ट
