नवंबर में बढ़ सकते हैं पेट्रोल-डीजल के दाम, रिपोर्ट में दावा, जानें वजह
पेट्रोल-डीजल के दाम नवंबर में बढ़ने की आशंका, जानें रिपोर्ट में क्या कहा गया
निष्कर्ष भारत, संवाददाता ( नई दिल्ली)। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता बढ़ सकती है। नवंबर 2026 में देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना जताई गई है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शोध संस्था ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के एक अनुमान के मुताबिक, केंद्र सरकार अगले महीने ईंधन की कीमतों में सीमित बढ़ोतरी कर सकती है। हालांकि, अभी तक कीमतें बढ़ाने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल इसे संभावित बढ़ोतरी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, इस साल मई में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कुल मिलाकर करीब 7.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। अब नवंबर में संभावित बढ़ोतरी इसका लगभग आधा, यानी करीब 3.5 से 4 प्रतिशत तक हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो इसका असर आम लोगों के मासिक बजट के साथ-साथ माल ढुलाई, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल के दाम नवंबर में क्यों बढ़ सकते हैं?
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की प्रमुख अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद के बयान के हवाले से ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नवंबर ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए एक अहम समय हो सकता है। इसकी एक वजह अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम भी बताया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2027 में गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात समेत सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें से पांच राज्यों में मार्च से मई के बीच मतदान होने की संभावना बताई गई है। ऐसे में चुनाव प्रचार तेज होने से पहले नवंबर को कीमतों में बदलाव के लिए एक संभावित समय माना जा रहा है।
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हालांकि, चुनावों को कीमतों में बढ़ोतरी का आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है। यह ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का आकलन है। अंतिम फैसला सरकार और संबंधित तेल कंपनियों के निर्णय पर निर्भर करेगा।
पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर कितना पड़ेगा असर?
यदि पेट्रोल और डीजल के दामों में 3.5 से 4 प्रतिशत तक बढ़ोतरी होती है, तो वाहन चालकों को ईंधन पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होती है और अलग-अलग शहरों में मौजूदा दरें क्या हैं।
पेट्रोल महंगा होने से निजी वाहन चलाने वाले लोगों का मासिक खर्च बढ़ सकता है। वहीं, डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर ट्रक, बस और मालवाहक वाहनों के परिचालन खर्च पर पड़ सकता है। परिवहन लागत बढ़ने की स्थिति में खाद्य सामग्री, किराना और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है।
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फिलहाल किसी शहर के लिए नई कीमत या प्रति लीटर बढ़ोतरी का निश्चित आंकड़ा सामने नहीं आया है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि पेट्रोल-डीजल खरीदने के लिए लोगों को कितना अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।
महंगाई दर 6.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स का अनुमान है कि यदि ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी होती है, तो चालू वित्त वर्ष की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 6.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। जनवरी-मार्च 2027 की तिमाही में इसके 6.5 प्रतिशत तक जाने की आशंका जताई गई है।
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यह अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के महंगाई संबंधी लक्ष्य की ऊपरी सीमा 6 प्रतिशत से अधिक है। महंगाई बढ़ने का अर्थ है कि आम लोगों को वस्तुओं और सेवाओं के लिए पहले की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
हालांकि, ये आंकड़े ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के अनुमान हैं, न कि भविष्य की महंगाई के निश्चित आंकड़े। वास्तविक स्थिति ईंधन की कीमतों, खाद्य वस्तुओं के दाम और अन्य आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत हुई
देश में महंगाई का दबाव पहले से बढ़ता दिखाई दे रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। इसी अवधि में खाद्य महंगाई दर भी बढ़कर 7.74 प्रतिशत पर पहुंच गई।
खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। ऐसे में यदि पेट्रोल-डीजल के दाम भी बढ़ते हैं, तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ईंधन की लागत बढ़ने से परिवहन और उत्पादन खर्च प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर कुछ वस्तुओं की खुदरा कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
क्या आरबीआई बढ़ा सकता है रेपो रेट?
महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी नजर रहेगी। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के आकलन में संकेत दिया गया है कि यदि ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं और महंगाई का दबाव बना रहता है, तो आरबीआई ब्याज दरों में कुल 50 बेसिस पॉइंट तक बढ़ोतरी कर सकता है।

रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालीन कर्ज देता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इसका असर होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर भी पड़ सकता है, हालांकि वास्तविक असर बैंकों की नीतियों और लोन की शर्तों पर निर्भर करता है।
यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि रेपो रेट में दोबारा बढ़ोतरी अभी एक अनुमान है। आरबीआई का अंतिम फैसला महंगाई, आर्थिक विकास और अन्य परिस्थितियों की समीक्षा के बाद होगा।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अब किसकी नजर?
नवंबर में ईंधन की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी को लेकर फिलहाल कोई आधिकारिक दर जारी नहीं हुई है। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट ने एक संभावित स्थिति की ओर संकेत किया है, लेकिन इसे कीमतें बढ़ने की पक्की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।
आम उपभोक्ताओं के लिए आने वाले दिनों में तेल कंपनियों की ओर से जारी कीमतें और सरकार के फैसले महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि ईंधन महंगा होता है, तो इसका असर केवल वाहन चलाने के खर्च तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि परिवहन और महंगाई के जरिए घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
इसलिए फिलहाल सबसे जरूरी बात यह है कि नवंबर में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने की आशंका रिपोर्ट पर आधारित है। वास्तविक बढ़ोतरी होगी या नहीं और कितनी होगी, इसकी पुष्टि आधिकारिक घोषणा के बाद ही हो सकेगी।
राजकुमार सिंह की रिपोर्ट
